

जैन धर्म के साधु-साध्वी दीक्षा लेने के बाद स्नान नहीं करते हैं क्योंकि ये उनकी अनुशासित जीवनशैली का ही एक हिस्सा है।
Image Source : PTIऐसी मान्यताएं हैं स्नान करने पर पानी में रहने वाले सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। यही कारण है कि जैन धर्म के साधु-संत मुंह पर भी एक सफेद कपड़ा रखते हैं, जिसे मुख पत्ती कहा जाता है ताकि सूक्ष्म जीवों को कोई हानि न हो।
Image Source : canvaजैन साधु-साध्वियां शरीर की सफाई से ज्यादा आत्मा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
Image Source : PTIजैन साधु-साधवी जब ध्यान में बैठते हैं और मन को शांत रखते हैं, तो वही उनका असली आंतरिक स्नान होता है। इस दौरान वे अपने मन को शुद्ध कर लेते हैं, जिससे उनका पूरा शरीर स्वच्छ हो जाता है।
Image Source : freepikजैन साधु-साध्वियां शरीर की सफाई के लिए कुछ दिनों के अंतराल में गीले कपड़े से अपने शरीर को पोंछते हैं।
Image Source : freepikदीक्षा लेने के बाद जैन साधु-साध्वी हर तरह की सुविधा का त्याग कर देते हैं। स्नान भी उनके लिए एक तरह के शारीरिक सुख में आता है इसलिए वे इसे भी छोड़ देते हैं।
Image Source : freepikयह त्याग उनके लिए साधना का ही एक हिस्सा होता है।
Image Source : canvaजैन साधु-साध्वी का पूरा जीवन सादगी से भरा होता है। ये स्नान के अलावा बिस्तर, पंखा, जूते-चप्पल आदि सभी सुखों का त्याग कर देते हैं।
Image Source : facebookयहां तक कि विदेशों में रहने वाले जैन साधु और साध्वियां भी इसी तरह से कठिन जीवन बिताते हैं।
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