इस कारण से जैन साधु-साध्वी कभी नहीं करते स्नान

इस कारण से जैन साधु-साध्वी कभी नहीं करते स्नान

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जैन धर्म के साधु-साध्वी दीक्षा लेने के बाद स्नान नहीं करते हैं क्योंकि ये उनकी अनुशासित जीवनशैली का ही एक हिस्सा है।

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ऐसी मान्यताएं हैं स्नान करने पर पानी में रहने वाले सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। यही कारण है कि जैन धर्म के साधु-संत मुंह पर भी एक सफेद कपड़ा रखते हैं, जिसे मुख पत्ती कहा जाता है ताकि सूक्ष्म जीवों को कोई हानि न हो।

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जैन साधु-साध्वियां शरीर की सफाई से ज्यादा आत्मा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

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जैन साधु-साधवी जब ध्यान में बैठते हैं और मन को शांत रखते हैं, तो वही उनका असली आंतरिक स्नान होता है। इस दौरान वे अपने मन को शुद्ध कर लेते हैं, जिससे उनका पूरा शरीर स्वच्छ हो जाता है।

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जैन साधु-साध्वियां शरीर की सफाई के लिए कुछ दिनों के अंतराल में गीले कपड़े से अपने शरीर को पोंछते हैं।

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दीक्षा लेने के बाद जैन साधु-साध्वी हर तरह की सुविधा का त्याग कर देते हैं। स्नान भी उनके लिए एक तरह के शारीरिक सुख में आता है इसलिए वे इसे भी छोड़ देते हैं।

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यह त्याग उनके लिए साधना का ही एक हिस्सा होता है।

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जैन साधु-साध्वी का पूरा जीवन सादगी से भरा होता है। ये स्नान के अलावा बिस्तर, पंखा, जूते-चप्पल आदि सभी सुखों का त्याग कर देते हैं।

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यहां तक कि विदेशों में रहने वाले जैन साधु और साध्वियां भी इसी तरह से कठिन जीवन बिताते हैं।

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