रुपए की गिरावट का सीधा फायदा एक्सपोर्ट बेस्ड कंपनियों को होगा। मसलन फार्मा, सॉफ्टवेयर और सीफूड कारोबार से जुड़ी कंपनियां। हालांकि कैपिटल गुड्स और जैम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर्स के एक्सपोर्ट आधारित होने के बाद भी रुपए की गिरावट का इनको कोई फायदा नहीं मिलेगा। इसकी मुख्य वजह इन सेक्टर्स के लिए कच्चे माल का विदेश से आयात होना है। जब रुपए में गिरावट देखने को मिलती है तो निर्यातकों को भुगतान में मिलने वाली राशि ज्यादा हो जाती है।
डॉलर के मुकाबले रुपया 64 के स्तर को पार कर चुका है। मेरे हिसाब से आने वाले दिनों में रुपया 65 के स्तर को भी पार कर सकता है। आने वाले दिनों में रुपए में गिरावट जारी रह सकती है। जब तक अर्थव्यवस्था में रिकवरी के पुख्ता संकेत नहीं मिलते रुपए में मजबूती दिखना मुश्किल है।
आइए अब नजर डालते हैं कि रुपए की गिरावट क्यों असर डालती है एक्सपोर्ट बेस्ड कंपनियों पर...
आईटी सेक्टर – डॉलर में मजबूती से आईटी सेक्टर के मार्जिन्स सुधरते नजर आएगें। मेरे हिसाब से रुपए में छोटी अवधि में गिरावट जारी रह सकती है जिसके चलते आईटी सेक्टर के शेयरों में आने वाले दिनों में अच्छी तेजी देखने को मिल सकती है।
सीफूड सेक्टर – 2013 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत से हर वर्ष 3.5 लाख टन का सीफूड एक्सपोर्ट होता है। इसकी वैल्यु कुल 8779 करोड़ रुपए है। ऐसे में अगर रुपए में गिरावट देखने को मिलती है तो इस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों को फायदा होगा। इनमें अवंती फीड और वाटरबेस प्रमुख हैं। वित्त वर्ष 2015 के पहले 9 महीनों में इन शेयरों में 250 फीसदी तक की उछाल देखने को मिली है।
फार्मा सेक्टर – भारतीय फार्मा इंडस्ट्री का आकार एक लाख करोड़ रुपए का है। जिसमें 45000 करोड़ रुपए के निर्यात शामिल हैं। डॉ रेड्डी, ल्युपिन, सन फार्मा ऐसी भारतीय कंपनियां हैं जिनका पश्चिमी देशों में बड़ा कारोबार है। फार्मा सेक्टर पर गिरते रुपए का मिलाजुला असर देखने को मिलेगा। मेरे हिसाब से गिरते रुपए का फायदा डिवीज लैब, ग्लेनमार्क फार्मा और डॉ रेड्डीज को होगा।
ऑयल मार्केटिंग कंपनिया – डीजल, एलपीजी और केरोसिन की कीमतों में अंडररिकवरी के चलते ऑयल मार्केटिंग कंपनियां दिक्कत में हैं। हालांकि कच्चे तेल की गिरती कीमतों से गिरते रुपए के बावजूद इन कंपनियों पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। रुपए की गिरावट इन कंपनियों के लिए दिक्कत की बात है। रुपए की गिरती कीमतों से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को दो तरह से नुकसान होता है। पहला, यह कंपनियां पूरी तरह आयात पर आधारित होती हैं। दूसरा इनका लोन विदेशी बैंकों से डॉलर के रुप में होता है।