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दिल्ली विधानसभा चुनाव: अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली सीट कैसे हार गए? बीजेपी की इस रणनीति ने किया कमाल

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा है। अरविंद केजरीवाल खुद अपनी नई दिल्ली सीट से हार गए हैं।

Arvind Kejriwal- India TV Hindi
Image Source : FILE अरविंद केजरीवाल

नई दिल्ली: आज पूरे देश में दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार से भी ज्यादा चर्चा अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत हार की है। एक समय में केजरीवाल ये दावा करते थे कि पीएम मोदी को दिल्ली में AAP को हराने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ेगा। लेकिन आज केजरीवाल नई दिल्ली की अपनी विधानसभा सीट भी नहीं बचा पाए।

क्यों अपनी सीट पर हार गए केजरीवाल? 

2022 के चुनावों में गुजरात आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ललकारने वाले केजरीवाल ये भूल गए कि मोदी और शाह की जोड़ी चुनावी राजनीति में किसी का बकाया नहीं रखती। वो ये भी भूल गए कि 2025 में विधानसभा से पहले अमित शाह उनकी सीट के एक-एक वोट का आंकलन कर लेंगे।

शीशमहल और शराब घोटाले के विवाद के बावजूद केजरीवाल को ये अहसास नहीं हुआ कि उनकी विश्वसनीयता को जबरदस्त झटका लगा है। उधर केजरीवाल फिर भी हवा में उड़ते रहे और इधर अमित शाह पूरे राज्य के साथ-साथ नई दिल्ली की सीट पर भी केजरीवाल की जमीन साफ करते रहे। जिस तरह से केजरीवाल अपनी खुद की सीट हारे हैं, ये बीजेपी और अमित शाह की एक-एक बूथ जीतने की माइक्रो प्लानिंग की वजह से ही संभव हो पाया है।

इसी के तहत उन्होंने करीब 8-9 महीने पहले ही प्रवेश वर्मा को नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ने के लिए काम पर लगा दिया था। इस काम को वो खुद मॉनिटर करते रहे। उस वजह से जो भी फीडबैक और डेटा उनके पास आया, उसके बाद उन्होंने चुनाव से ठीक पहले गुजरात के 8-10 स्थानीय नेताओं की एक टीम को काम पर लगाया।

इनके संकलन की जिम्मेदारी गुजरात के एक राज्यसभा सांसद को सौंपी गई। इस सांसद और उनकी इस टीम को सिर्फ उन्हीं बूथों पर फोकस करना था, जहां बीजेपी पिछले चुनावों में माइनस में रही है या जो कभी जीत नहीं पायी है। ये वो बूथ थे जो 2015 से लेकर 2025 से पहले तक बीजेपी किसी भी चुनाव में नहीं जीती थी।

इस टीम ने गुजरात से करीब 80-90 कार्यकर्ताओं की टीम को साथ में लिया और उन बूथों पर एक-एक मतदाता से संपर्क किया और केजरीवाल का पूरा चुनावी गणित बिगाड़ कर रख दिया। क्योंकि इस बार मौका अच्छा था और परिस्थिति अनुकूल थी। 10 साल की विरोधी लहर, केजरीवाल की क्रेडिबिलिटी एक दम निचले स्तर पर थी। जरुरत सिर्फ लोगों को समझाने की थी। इसीलिए अमित शाह द्वारा गुजरात से ऐसी टीम को चुना गया जो दिन रात एक कर दे और परिणाम स्वरुप केजरीवाल अपनी सीट भी हार गए। केजरीवाल को ये हार लम्बे समय तक याद रहेगी। शायद इसीलिए पीएम मोदी अपनी सभाओं में काफी कॉन्फिडेंट दिख रहे थे और अरविंद केजरीवाल ओवर कॉन्फिडेंट।