A
  1. Hindi News
  2. एजुकेशन
  3. पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी में क्या अंतर होता है? यहां दूर करें कंफ्यूजन

पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी में क्या अंतर होता है? यहां दूर करें कंफ्यूजन

पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी में क्या अंतर होता है? आइए इस खबर के माध्यम से इस विवरण से भिज्ञ होते हैं।

सांकेतिक फोटो- India TV Hindi
Image Source : PEXELS सांकेतिक फोटो

पुलिस हिरासत और ज्यूडिशियल कस्टडी, अक्सर यह हम सभी लोगों के सामने किसी न किसी माध्यम(बातचीत, टीवी, अखबार आदि) से आते रहते हैं। लेकिन क्या आप सभी इन दोनों के बीच के अंतर को जानते हैं। अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, आज इस खबर के जरिए हम इस विवरण से ही अवगत होंगे। पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी, अधिकतर लोगों को यह दोनों एक ही लगते हैं। लेकिन ऐसा है नहीं, पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी दोनों बिलकुल अलग हैं। यह दोनों अल-अलग प्रकार की हिरासत हैं। आज इस खबर के जरिए हम इनके बारे में ही जानेंगे और साथ ही इनके बीचे के अंतर से भी अवगत होंगे।  

पुलिस हिरासत क्या है?

  • पुलिस हिरासत वास्तव में किसी संदिग्ध व्यक्ति को पुलिस थाने के लॉकअप में पुलिस द्वारा हिरासत में रखना है, ताकि संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में रखा जा सके। हालांकि, कानून के अनुसार 24 घंटे से ज्यादा समय के लिए संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। संदिग्ध को 24 घंटे के भीतर उपयुक्त न्यायाधीश (मजिस्ट्रेट) के समक्ष पेश करना आवश्यक होता है (इन 24 घंटों में पुलिस स्टेशन से अदालत तक की आवश्यक यात्रा का समय शामिल नहीं है)। 
  • इस हिरासत के दौरान, मामले का प्रभारी पुलिस अधिकारी संदिग्ध से पूछताछ कर सकता है। 
  • पुलिस हिरासत की अवधि हिरासत शुरू होने की तारीख से केवल 15 दिनों की अवधि तक ही बढ़ाई जा सकती है।

ज्यूडिशियल कस्टडी क्या है?

  • ज्यूडिशियल कस्टडी का अर्थ है कि अभियुक्त संबंधित मजिस्ट्रेट की हिरासत में है। इस हिरासत के दौरान अभियुक्त को जेल में रखा जाता है। सरल भाषा में कहें तो ज्यूडिशियल कस्टडी में संदिग्ध व्यक्ति को जेल में रखते हैं।
  • न्यायिक हिरासत के दौरान, मामले के प्रभारी पुलिस अधिकारी को संदिग्ध से पूछताछ करने की अनुमति नहीं होती है। हालांकि, अदालत पूछताछ की अनुमति दे सकती है यदि उसे लगता है कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर पूछताछ आवश्यक है। 
  • इसकी अवधि ऐसे अपराध के लिए 90 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है, जिसमें मृत्युदंड, आजीवन कारावास या अन्य सभी अपराधों के लिए 10 वर्ष और 60 दिन से अधिक कारावास की सजा हो, यदि मजिस्ट्रेट को विश्वास हो कि इसके लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं, जिसके बाद अभियुक्त या संदिग्ध को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

ये भी पढ़ें- CSIR UGC NET 2025 के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख करीब, इच्छुक फौरन करें अप्लाई

Latest Education News