40 और 50 के दशक के रुपहले पर्दे पर एक चेहरा उभरा, जिसने अपनी अदाओं से दर्शकों को मोह लिया। नाम था मीनू मुमताज, लेकिन यह नाम अपनी कला से ज्यादा एक ऐसे बवाल के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जिसे सुन कर उस दौर का समाज सकते में आ गया था। आज भी इस बात को पचा पाना आसान नहीं है। फिल्माए गए एक सीन से पूरा बॉलीवुड हिल गया था और ये सीन था अपने सगे भाई महमूद के साथ ऑनस्क्रीन रोमांस का, जिसकी उस दौर में खूब आलोचना हुई।
एक सीन ने हिला दी जिंदगी
लीजेंड्री कॉमेडियन महमूद की छोटी बहन, मीनू मुमताज ने जब फिल्म 'हावड़ा ब्रिज' के गाने 'गोरा रंग चुनरिया काली' में अपने भाई के साथ 'इश्क' फरमाया तो आग लग गई। यह ऐसा अपराध माना गया कि समाज ने उनके बायकॉट की मांग उठा दी। इस एक सीन ने उनके जीवन में ऐसा तूफान ला दिया। कुछ सालों बाद एक समय ऐसा आया जब वो देश छोड़कर विदेश में जा बसीं और दुख की बात तो यह है कि अपने अंतिम दिनों में उनकी याददाश्त भी चली गई, जिसके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं था।
क्यों रखा फिल्मों में कदम
मीनू मुमताज का असली नाम मलिकुन्निसा अली था। कला उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता मुमताज अली खुद एक मशहूर डांसर थे, पर शराब की लत ने उनका करियर डुबो दिया। अचानक सात भाई-बहनों का बोझ मीनू के कंधों पर आ गया। परिवार की आर्थिक तंगी ने 13 साल की मीनू को मजबूर कर दिया कि वह फिल्मों में काम करें। उन्होंने 'तवायफ' से पर्दे पर कदम रखे, जबकि उनकी मां इस फैसले के सख्त खिलाफ थीं। काम की तलाश में जब वह स्टूडियो के चक्कर काटती थीं तो फिल्ममेकर नानूभाई वकील की नजर उन पर पड़ी और उन्हें फिल्म 'सखी हकीम' मिली।
Image Source : yeh hai meri mumbai/FBमीनू और मुमताज।
विवाद के बाद की वापसी
मीनू सिर्फ महमूद की बहन नहीं थीं। वह मीना कुमारी की भी रिश्तेदार थीं (महमूद की शादी मीना कुमारी की बहन से हुई थी) और मशहूर गायक लकी अली की बुआ थीं। उनके रग-रग में 'नृत्य' था और उनकी बोल्डनेस उस जमाने के लिए नई थी। मजबूरी में मिली 'हावड़ा ब्रिज' की वह भूमिका, जहां उन्हें अपने भाई महमूद के साथ 'गोरा रंग चुनरिया काली' गाने पर नजदीकी दिखानी पड़ी, उनकी जिंदगी का सबसे विवादास्पद मोड़ बन गया। लोगों ने भाई-बहन के इस ऑनस्क्रीन 'रोमांस' को अस्वीकार कर दिया और उनके बहिष्कार की मांग की। हालांकि मीनू डटी रहीं। उन्होंने 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962), 'कागज के फूल' (1959) और 'चौदहवीं का चांद' (1960) जैसी फिल्मों में अहम किरदार निभाए और धीरे-धीरे विवाद की आग शांत हुई।
पर्दे से दूर, एक नई जिंदगी
जब उनका करियर उफान पर था, तब 1963 में परिवार के कहने पर मीनू मुमताज ने फिल्म डायरेक्टर एस. अली अकबर से शादी कर ली। वादे के मुताबिक उन्होंने 'जहां आरा' और 'पालकी' जैसी फिल्में पूरी कीं और हमेशा के लिए अभिनय को अलविदा कह दिया। दिलचस्प बात यह है कि 'जहां आरा' और 'पालकी' की शूटिंग के दौरान वह गर्भवती थीं। 'पालकी' को बनने में चार साल लग गए (1967 में रिलीज हुई)। डायरेक्टर ने जान-बूझकर ऐसे सीन फिल्माए ताकि उनकी गर्भावस्था को पर्दे पर भी दिखाया जा सके। मीनू और अली अकबर के चार बच्चे हुए। शादी के बाद मीनू मुमताज ने देश छोड़कर विदेश में अपना नया आशियाना बसाया।
ऐसे हुआ मीनू का अंत
2003 में उनकी जिंदगी में एक और भयानक मोड़ आया, उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया। इस बीमारी ने उनकी याददाश्त छीन ली, वह अपनों को भी भूल गईं। हालांकि एक सफल ऑपरेशन के बाद उनकी याददाश्त वापस आ गई, पर यह त्रासदी उनके अंतिम दिनों तक उनका पीछा करती रही। 23 अक्टूबर 2021 को मीनू मुमताज ने 79 साल की उम्र में टोरंटो, कनाडा में अंतिम सांस ली और बॉलीवुड के इतिहास का एक असाधारण मगर विवादास्पद अध्याय समाप्त हो गया।
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