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Adarsh Baal Vidyalaya Review: के के मेनन की एक्टिंग है प्लस पॉइंट, कमजोर कहानी बनी सबसे बड़ी कमी
के के मेनन की 'आदर्श बाल विद्यालय' प्राइम वीडियो पर रिलीज हो गई है। हिमांक गौर के निर्देशन में बनी यह सीरीज एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल की कहानी है, जो अपने स्कूल के बोर्ड रिजल्ट को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
हाल के सालों में कई सिटकॉम ने हल्के-फुल्के अंदाज में गंभीर और असल जिंदगी के मुद्दों को दिखाया है। 'पंचायत' और 'ग्राम चिकित्सालय' जैसे शो ने मजाक-मजाक में सामाजिक मुद्दों को उठाया है। प्राइम वीडियो का 'आदर्श बाल विद्यालय' भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश करता है। यह दिल्ली के टिंकी टोली इलाके के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल (के के मेनन) की कहानी है, जो बहुत आराम से काम करते हैं। उनकी जिंदगी में तब अचानक बदलाव आता है, जब एक सरकारी स्कीम के तहत उन्हें अपने स्कूल के बोर्ड रिजल्ट को बेहतर बनाने के लिए कहा जाता है, लेकिन क्या यह शो उम्मीदों पर खरा उतरता है? आइए जानते हैं।
आदर्श बाल विद्यालय की कहानी
'आदर्श बाल विद्यालय' दिल्ली के टिंकी टोली इलाके के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (के के मेनन) की कहानी है, जो बहुत आराम-पसंद इंसान हैं। वे स्कूल की खराब सुविधाओं और सीमित संसाधनों के साथ काम करने के आदी हो चुके हैं, लेकिन एक सरकारी स्कीम सब कुछ बदल देती है। इस स्कीम के तहत दिल्ली के टॉप 10 सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल्स को, जिनके स्कूल 10वीं क्लास के बोर्ड एग्जाम में शानदार रिजल्ट लाते हैं। अपने जीवनसाथी के साथ कैम्ब्रिज जाने का मौका मिलता है।
इनाम के लालच में ज्ञानेश्वर अपनी टीचरों की टीम के साथ मिलकर शहर के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले स्कूलों में से एक 'आदर्श बाल विद्यालय' को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। साथ ही सरकारी स्कूल की रोजमर्रा की चुनौतियों का भी सामना करते हैं।
सीरीज की शुरुआत शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों के 'आदर्श बाल विद्यालय' पहुंचने और हेडमास्टर से मिलने से होती है। हालांकि, वे स्कूल का रास्ता पूछने के लिए सड़क किनारे चाय बेच रहे एक छात्र से पूछते हैं। छात्र बताता है कि पिछले कुछ दिनों से कोई क्लास नहीं हुई है, क्योंकि दो क्लासरूम और एक लैब का इस्तेमाल स्थानीय विधायक गोल्डी (देवेन भोजानी) की बेटी की शादी में आए मेहमानों को ठहराने के लिए किया जा रहा है। सीरीज की शुरुआत सरकारी स्कूल के संघर्षों को दिखाकर होती है, जो आगे की कहानी का माहौल बनाती है।
जब ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (के के मेनन) 'आदर्श बाल विद्यालय' को दिल्ली के टॉप 10 सरकारी स्कूलों में शामिल करने के लिए स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) बनाते हैं तो टीम को जल्द ही एहसास हो जाता है कि यह काम आसान नहीं है। एक्स्ट्रा क्लास चलाने के लिए फंड की जरूरत होती है, जबकि कम अटेंडेंस एक और चुनौती बनी रहती है। एक सीन में छात्र मानते हैं कि वे ज्यादातर मंगलवार को स्कूल इसलिए आते हैं, क्योंकि उस दिन मिड-डे मील स्कीम के तहत खीर मिलती है। क्या ज्ञानेश्वर स्कूल की किस्मत बदलने और कैम्ब्रिज की अपनी सपनों की यात्रा पर जाने में सफल हो पाते हैं, यही कहानी का मुख्य हिस्सा है।
आदर्श बाल विद्यालय का लेखन और निर्देशन
लेखक बिस्वपति सरकार, अक्षय नूपुर पाई, तत्सत पांडे और मेघना श्रीवास्तव ने ह्यूमर और सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणी का अच्छा तालमेल बिठाया है। मजेदार डायलॉग और टीचर-स्टूडेंट के बीच बातचीत के जरिए कहानी की शुरुआत में सरकारी स्कूलों के संघर्ष और पढ़ाई में छात्रों की कम दिलचस्पी को दिलचस्प ढंग से दिखाया गया है।
अर्चना पूरन सिंह का किरदार उर्मिला देवी, जो MLA गोल्डी (देवेन भोजानी) की करीबी सहयोगी हैं। वह फंड पाने के लिए प्रिंसिपल की एकमात्र उम्मीद बन जाती हैं। इसके जरिए सीरीज यह भी दिखाती है कि स्कूलों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी अक्सर राजनीतिक प्रभाव की जरूरत क्यों पड़ती है।
सीरीज में संवेदनशील विषयों को पढ़ाने, छात्रों को अनुशासन में रखने पर लगी पाबंदियों और बदलते क्लासरूम नियमों के हिसाब से खुद को ढालने में शिक्षकों के संघर्ष जैसे मुद्दों को भी दिखाया गया है।
निर्देशक हेमांक गौर ज्यादातर समय सीरीज को दिलचस्प बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। हालांकि, कुछ सब-प्लॉट असरदार नहीं रहे और पांचवें एपिसोड के बाद कहानी की रफ्तार धीमी पड़ गई। कुछ सब-प्लॉट बेवजह खींचे हुए लगे, जिससे कहानी की गति धीमी हो गई।
आदर्श बाल विद्यालय का तकनीकी पहलू
तकनीकी तौर पर यह सीरीज चीजों को सरल, लेकिन असरदार रखती है। इसकी एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफी सरकारी स्कूल के माहौल को जीवंत बनाती है, जो पुरानी यादों और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर की कड़वी सच्चाइयों के बीच संतुलन बनाए रखती है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाता है और बिना किसी रुकावट के माहौल को और बेहतर बनाता है।
आदर्श बाल विद्यालय की एक्टिंग और खूबियां
के के मेनन ने आदर्श बाल विद्यालय के हेडमास्टर ज्ञानेश्वर त्रिपाठी के तौर पर बेहतरीन एक्टिंग की है। शुरुआत में अपनी पत्नी (प्राची शाह) के साथ कैम्ब्रिज जाने के सपने से प्रेरित होने के बावजूद, उन्हें धीरे-धीरे छात्रों का भविष्य बेहतर बनाने की अहमियत समझ आती है। मेनन ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। हालांकि, उनकी भूमिका को और गहराई से दिखाया जा सकता था।
प्राची शाह का स्क्रीन टाइम कम है, लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदार एक्टिंग से उसका पूरा फायदा उठाया है। अर्चना पूरन सिंह MLA गोल्डी की करीबी सहयोगी उर्मिला देवी के किरदार में खूब जंची हैं। उनका प्रभावशाली अंदाज किरदार के हिसाब से ठीक है। सख्त हिंदी टीचर हंसराज मीणा के रोल में अभिमन्यु सिंह ने बेहतरीन काम किया है, जहां वे दर्शकों को स्कूल के उन टीचरों की याद दिलाते हैं, जिनसे वे डरते थे। वहीं सीरीज उनके निजी संघर्षों को भी दिखाती है। सिंह ने पूरी सीरीज में दमदार एक्टिंग की है।
देवेन भोजानी ने MLA गोल्डी के रोल में अच्छा काम किया है, लेकिन कमजोर राइटिंग की वजह से उनके किरदार पर असर पड़ा है। उनका सब-प्लॉट जबरदस्ती का लगता है और कोई खास छाप नहीं छोड़ पाता। प्रसन्ना बिष्ट ने कंचन के रोल में प्रभावित किया है। वह नई मैथ्स टीचर हैं, जिन्हें स्टाफ की कमी के कारण फिजिक्स भी पढ़ानी पड़ती है।
एतेश गुप्ता इंग्लिश टीचर के रोल में नैचुरल लगे हैं। डिस्लेक्सिया की वजह से वे अक्सर अजीब स्थितियों में फंस जाते हैं। वहीं अन्नपूर्णा सोनी शर्मा मैम के रोल में ठीक-ठाक रही हैं। हालांकि, उनके किरदार को और ज्यादा स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था। नवीन कस्तूरिया और अक्षरा पडवाल ने मुकुल और पलक के तौर पर पिता-बेटी का भरोसेमंद रिश्ता दिखाया है। मुकुल जहां स्टूडेंट्स की समस्याओं को सुलझाने में मदद करते हैं। वहीं अपनी बेटी को समझने में उन्हें मुश्किल होती है। पडवाल ने बागी टीनएजर के रोल में ईमानदारी से एक्टिंग की है।
कबीर साजिद, अश्वनाथ कुमार, वीरेंद्र पुंडियाल, किरण दीप शर्मा, आर्यन प्रजापति, यतेंद्र बहुगुणा और जेरेड अल्बर्ट सविले जैसे सपोर्टिंग कास्ट ने कम स्क्रीन टाइम मिलने के बावजूद अच्छा काम किया है। इनमें कबीर साजिद और आर्यन प्रजापति ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। बिस्वपति सरकार भी एक छोटे से कैमियो रोल में नजर आए हैं।
आदर्श बाल विद्यालय में कहां कमी रह गई?
कहानी का आइडिया अच्छा होने के बावजूद, आदर्श बाल विद्यालय अपने सात एपिसोड के दौरान एक जैसा नहीं रहता। जहां पहला हिस्सा दर्शकों को बांधे रखता है तो वहीं पांचवें एपिसोड के बाद कहानी की रफ्तार धीमी पड़ने लगती है। कुछ सब-प्लॉट खासकर MLA गोल्डी वाला हिस्सा कहानी के अनुसार जरूरी नहीं लगता है और इसे देखने में कोई खास मजा भी नहीं आता है।
सीरीज के दूसरे हिस्से में रफ्तार को लेकर भी दिक्कतें हैं और कुछ हिस्से बहुत खिंचे हुए लगते हैं। अगर इन सब-प्लॉट की राइटिंग बेहतर होती और उन्हें अच्छे से दिखाया जाता तो सीरीज कहीं ज्यादा असरदार हो सकती थी।
आदर्श बाल विद्यालय कैसी है?
आदर्श बाल विद्यालय में भले ही इसमें TVF के कुछ बेहतरीन शो जैसी इमोशनल गहराई या एक जैसी क्वालिटी न हो, फिर भी यह देखने लायक है। यह आज के समय के हिसाब से जरूरी शो है, जो सरकारी स्कूलों की हालत पर रोशनी डालता है। इसमें कलाकारों की सच्ची एक्टिंग और एक सार्थक कहानी है। हालांकि, अगर आप सोशल मैसेज वाला जमीन से जुड़ा ड्रामा देखना चाहते हैं तो यह सीरीज देख सकते हैं। भले ही यह उम्मीद पर खरी न उतरी हो।
आदर्श बाल विद्यालय के लिए 2.5/5
(इस सीरीज का रिव्यू ट्विंकल गुप्ता ने किया है। वह इंडिया टीवी इंग्लिश के लिए लिखती हैं। यहां उनकी प्रोफाइल है।)