Brown Review: करिश्मा का हुनर जबरदस्त, लेकिन प्रेडिक्टेबल क्लाइमेक्स और धीमी रफ्तार ने किया पस्त

करिश्मा कपूर 'मर्डर मुबारक' के बाद एक बार फिर ओटीटी पर वापसी करी हैं, वो भी बतौर लीड एक्ट्रेस, उनकी हालिया रिलीज 'ब्राउन' कैसी है, उनका किरदार कैसा है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

Photo: ZEE 5 करिश्मा कपूर।
मूवी रिव्यू:: ब्राउन
Critics Rating: 2.5 / 5
पर्दे पर: 05.06.2026
कलाकार:
डायरेक्टर: अभिनय देव
शैली: साइकोलॉजिकल थ्रिलर
संगीत: ...................

कोलकाता शहर को हमने अक्सर फिल्मों में पीले रंग की टैक्सियों, विक्टोरिया मेमोरियल के खूबसूरत ढलते सूरज, दुर्गा पूजा की रौनक और चाय की दुकानों पर होने वाली मीठी बहसों के साथ देखा है। लेकिन डायरेक्टर अभिनय देव की ZEE5 पर आई सात एपिसोड की नई वेब सीरीज 'ब्राउन' आपको एक अलग ही कोलकाता में ले जाती है। यह कोलकाता बेहद ठंडा, उदास, लगातार होती बारिश से भीगा हुआ और एक अजीब से सन्नाटे में डूबा है, एक ऐसा सन्नाटा जो आपको सुकून नहीं बल्कि खौफ देता है। अभीक बरुआ के मशहूर उपन्यास 'सिटी ऑफ डेथ' पर आधारित यह सीरीज एक रोंगटे खड़े कर देने वाले कत्ल से शुरू होती है। गहरे ट्रॉमा और टूटे हुए किरदार आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि अंदर से टूट चुका इंसान खुद को कैसे संभालता है।

कत्ल, सस्पेंस और अतीत का साया

कहानी की शुरुआत शहर के एक बेहद अमीर और रसूखदार बिजनेसमैन (अजिंक्य देव) की बेटी अहाना जायसवाल की बेरहमी से की गई हत्या से होती है। अहाना की लाश उसके अपने आलीशान घर में बिना धड़ के मिलती है। इस खौफनाक मर्डर से पूरे शहर के हाई-प्रोफाइल समाज में हड़कंप मच जाता है। रसूखदार पिता के दबाव और मीडिया ट्रायल के बीच पुलिस महकमे को जल्द से जल्द कातिल को पकड़ना है। यह हाई-प्रोफाइल केस सौंपा जाता है डीसीपी रीता ब्राउन (करिश्मा कपूर) को। रीता एक बेहद काबिल ऑफिसर रही हैं, लेकिन अपने पति की मौत के गहरे सदमे के कारण वह सालों से सस्पेंड चल रही हैं और शराब के नशे में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रही हैं। उनका नाश्ता कॉफी और सिगरेट से शुरू होता है। सिस्टम उन्हें यह केस सिर्फ इसलिए देता है ताकि वह फेल हो जाएं और मामले को रफा-दफा किया जा सके।

इस जांच में रीता के पार्टनर बनते हैं इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा (सूर्या शर्मा), जो खुद अपने अतीत के एक हादसे और पत्नी को खोने के गम (सर्वाइवर गिल्ट) से जूझ रहे हैं। जब ये दो अंदर से पूरी तरह टूटे हुए पुलिसवाले इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने निकलते हैं, तो वे कोलकाता की अंधेरी गलियों और रसूखदार लोगों के गंदे राज के बीच फंसते चले जाते हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब ठीक इसी अंदाज में एक और कत्ल होता है और दोनों को समझ आता है कि वे किसी आम मुजरिम का नहीं, बल्कि एक बेहद शातिर साइको किलर का पीछा कर रहे हैं जो खुद को भगवान का बंदा समझकर कत्ल कर रहा है। क्या रीता अपनी शराब की लत और भ्रष्ट सिस्टम से लड़ते हुए कातिल तक पहुंच पाएगी? यही इस सीरीज का मुख्य ताना-बाना है।

एक्टिंग

इस सीरीज की सबसे बड़ी और इकलौती सबसे मजबूत कड़ी है कलाकारों का अभिनय, खासकर करिश्मा कपूर। 90 के दशक में 'कुली नंबर 1' और 'राजा हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में चटक रंग के कपड़े पहनने वाली और गोविंदा के साथ डांस करने वाली ग्लैमरस करिश्मा को इस रूप में देखना दर्शकों के लिए एक बड़ा शॉक है। बिना मेकअप के, चेहरे पर झुर्रियां और उदासी लिए, हर समय सिगरेट फूंकती और शराब में डूबी रीता ब्राउन के किरदार में करिश्मा ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन और रोंगटे खड़े कर देने वाली परफॉर्मेंस दी है। उन्होंने इस किरदार की कमियों और उसके रूखेपन को इतनी ईमानदारी से जिया है कि आपको पर्दे पर कोई स्टार नहीं बल्कि एक मजबूर और हारी हुई औरत दिखाई देती है।

सूर्या शर्मा ने इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा के रूप में करिश्मा का बखूबी साथ दिया है। उनका गुस्सा, उनका दुख और अंदरूनी छटपटाहट बहुत ही शांत और सधे हुए तरीके से बाहर आती है। रीता की फिक्रमंद मां के रोल में सोनी राजदान और एक बेहद चतुर बिजनेसमैन के पिता के रूप में अजिंक्य देव ने बेहतरीन काम किया है। सबसे अनोखा और मजेदार कैमियो दिग्गज अभिनेत्री हेलन खान का है, जो रीता की मौसी 'बर्था' के रोल में हैं। उनका इंट्रो सीन ही इतना कमाल का है जहां वह अपने ही एक पैर (जो डायबिटीज के कारण काटना पड़ा था) के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही होती हैं। अहाना के संगीतकार बॉयफ्रेंड के रूप में आर्यन भौमिक का किरदार भी सस्पेंस को बढ़ाने में मदद करता है। बंगाली संस्कृति को दर्शाते हुए फॉरेंसिक हेड और अन्य सह-कलाकारों ने भी कहानी में जरूरी इंसानी रंग भरे हैं।

डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष

अभिनय देव का निर्देशन तारीफ के काबिल है, खासकर जिस तरह उन्होंने इस थ्रिलर को एक नियो-नॉर यानी बेहद डार्क और गंभीर लुक दिया है। अमोघ देशपांडे की सिनेमैटोग्राफी इस सीरीज की जान है। उन्होंने कोलकाता को ग्रे, ब्लैक और नीले रंगों के शेड्स में दिखाया है। लगातार गिरती बारिश, गीली सड़कें, कम रोशनी वाले कमरे और दीवारों की सीलन को देखकर आपको खुद घुटन का अहसास होने लगता है। बैकग्राउंड म्यूजिक और सन्नाटे का इस्तेमाल करके डायरेक्टर ने पहले ही फ्रेम से एक डर का माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन तकनीकी रूप से जो चीज इस सीरीज को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है, वह है इसका बेहद धीमा स्क्रीनप्ले (पटकथा)। 

मेकर्स ने सस्पेंस और मिस्ट्री से ज्यादा ध्यान किरदारों के दुख और उनके डिप्रेशन को दिखाने में लगा दिया। जब सीरीज के सारे ही किरदार टूटे हुए, दुखी और मानसिक तनाव में दिखाई देते हैं तो दर्शकों के लिए हर किसी के साथ इमोशनली जुड़ पाना मुश्किल हो जाता है। कहानी की रफ्तार इतनी धीमी है कि जो बात एक 2 घंटे की कड़क फिल्म में कही जा सकती थी, उसे जबरदस्ती खींचकर 7 एपिसोड की सीरीज बना दिया गया। बीच के एपिसोड्स में कहानी एक ही जगह पर घूमती रहती है, जिससे दर्शक बोर होने लगते हैं। इसके अलावा, सोनी राजदान और हेलन जैसी बेहतरीन अभिनेत्रियों को बहुत कम स्क्रीन टाइम दिया गया, जो खटकता है। सबसे बड़ी निराशा इसका क्लाइमेक्स है, जो बहुत ही प्रेडिक्टेबल (जिसका अंदाजा पहले ही लग जाए) है और कोई बड़ा शॉक नहीं दे पाता।

वर्डिक्ट

'ब्राउन' एक ऐसी सीरीज है जो बाहर से देखने में बेहद खूबसूरत, डार्क और प्रॉमिसिंग लगती है, लेकिन अंदर से उसकी कहानी उतनी ही घिसी-पिटी और कमजोर है। अगर आप करिश्मा कपूर के एक बिल्कुल नए, बिना किसी ग्लैमर वाले और झकझोर देने वाले अभिनय को देखना चाहते हैं तो यह सीरीज आपके लिए ही है। कोलकाता का यह नया डार्क रूप और बेहतरीन कैमरा वर्क आपको पसंद आएगा, लेकिन अगर आप एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री की उम्मीद कर रहे हैं जो हर मोड़ पर आपके होश उड़ा दे और तेज रफ्तार से चले तो 'ब्राउन' का यह सुस्त सफर आपको थका सकता है।

रेटिंग: 3 / 5 स्टार