Cocktail 2 Movie Review: स्टाइल तो मिला पर खो गया पुरानी फिल्म का नशा, इस 'कॉकटेल' के लिए थी एक नए बारटेंडर की जरूरत

Cocktail 2 Movie Review: शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना स्टारर फिल्म 'कॉकटेल 2' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। क्या इस फिल्म में पहली वाली 'कॉकटेल' जितना नशा है, जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू।

Photo: STILL FROM TRAILER रश्मिका, शाहिद और कृति सेनन।
मूवी रिव्यू:: कॉकटेल 2
Critics Rating: 2 / 5
पर्दे पर: 19/06/2025
कलाकार: शाहिद कपूर, कृति सेनन
डायरेक्टर: होमी अदजानिया
शैली: रोमांटिक ड्रामा
संगीत: ...................

साल 2012 में जब होमी अदजानिया की 'कॉकटेल' आई थी, तो उसने हिंदी सिनेमा में मॉडर्न रिश्तों की एक बिल्कुल नई और बेबाक परिभाषा लिखी थी। सैफ अली खान का बेफिक्रा अंदाज, डायना पेंटी की सादगी और सबसे बढ़कर दीपिका पादुकोण का वो 'वेरोनिका' वाला किरदार, जिसने आज के दौर के अकेलेपन, दिल टूटने के दर्द और अर्बन लाइफस्टाइल को पर्दे पर अमर कर दिया। वह एक ऐसा सिनेमाई ड्रिंक था, जिसका स्वाद आज भी दर्शकों की जुबान पर है। अब पूरे चौदह साल बाद, बॉलीवुड ने उसी पुरानी बोतल में एक नया मिश्रण परोसने की हिम्मत की है। 'कॉकटेल 2' के जरिए मेकर्स एक बार फिर उसी जॉनर में हाथ आजमाने लौटे हैं, जहाँ दो औरतें हैं, एक मर्द है और भावनाओं का वही पुराना उथल-पुथल है। जब शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना जैसे बड़े चेहरे इस सफर का हिस्सा बनते हैं, तो उम्मीदें आसमान छूने लगती हैं। लेकिन क्या यह नया सीक्वल पुरानी फिल्म जैसा नशा छोड़ पाता है, या सिर्फ एक कमज़ोर रीमेक बनकर रह जाता है? आइए इस ताजा कॉकटेल की घूंट-दर-घूंट दास्तां पेश करते हैं।

कहानी

फिल्म की कहानी हमें ले जाती है कुणाल (शाहिद कपूर) और दिया (रश्मिका मंदाना) की दुनिया में। दोनों कोई नए नवेले प्रेमी नहीं हैं, बल्कि पिछले 16 सालों से एक-दूसरे के साथ एक बेहद खूबसूरत और लंबे रिश्ते में बंधे हैं। अपने इसी पुराने प्यार को एक नया मोड़ देने और जिंदगी को थोड़ा और एक्सप्लोर करने के लिए यह कपल इटली के सिसिली में छुट्टियां मनाने का फैसला करता है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब सिसिली में उनकी मुलाकात दिया की एक पुरानी दोस्त एली (कृति सेनन) से होती है। दोनों सहेलियां पूरे एक दशक यानी 10 साल बाद मिल रही हैं। अब यहाँ से कहानी एक अजीब और थोड़े अवास्तविक मोड़ पर मुड़ जाती है। दिया को अचानक अपने इतने लंबे और सुरक्षित रिश्ते पर शक होने लगता है। वह एक अजीब सा खेल खेलने की सोचती है और अपनी बेहद ग्लैमरस और हॉट दोस्त एली को काम सौंपती है कि वह कुणाल को लुभाए, ताकि वह कुणाल की वफादारी को परख सके।

एली शुरुआत में दिया को समझाने की कोशिश करती है, लेकिन दिया अपनी जिद पर अड़ी रहती है। दिया का यह अजीब रवैया कुणाल को उससे दूर धकेल देता है और जाने-अनजाने में एली के लिए कुणाल के करीब आने का रास्ता साफ हो जाता है। इसके बाद वही होता है जिसकी उम्मीद हर दर्शक को पहले से होती है, एली को सच में कुणाल से प्यार हो जाता है। अब सहेली की शादी बचाने की कोशिश, एक तरफा जलन और अपने प्यार को पाने की जिद के बीच रिश्तों का एक अजीब सा कुरुक्षेत्र शुरू हो जाता है, जहाँ कुणाल महज एक ट्रॉफी की तरह बीच में खड़ा रह जाता है।

अभिनय

अभिनय के मोर्चे पर बात करें तो यह फिल्म पूरी तरह से कृति सेनन के कंधों पर टिकी हुई है। कृति स्क्रीन पर आते ही छा जाती हैं; उनके लुक्स, कपड़े, हेयरस्टाइल और स्क्रीन प्रेजेंस को बहुत ही बारीकी से और बेहद खूबसूरत तरीके से डिजाइन किया गया है। एली के रूप में वे एक 'गोल्डन गर्ल' की तरह चमकती हैं। हालांकि स्क्रिप्ट की कमजोरी की वजह से उनका किरदार थोड़ा सतही लगता है, लेकिन कृति ने अपनी हॉटनेस और ईमानदारी से उसकी भरपाई करने की पूरी कोशिश की है। यह कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म में सबसे ज्यादा स्क्रीन्स और फुटेज उन्हीं के हिस्से आया है।

शाहिद कपूर जैसे मंझे हुए अभिनेता के लिए इस फिल्म में करने को बहुत कम गुंजाइश थी। पूरी फिल्म में उनका किरदार कुणाल, दोनों अभिनेत्रियों के बीच एक इनाम या ट्रॉफी की तरह घूमता रहता है। एक तरफ उनकी मंगेतर उन पर शक कर रही है, तो दूसरी तरफ उनकी दोस्त उन्हें हासिल करना चाहती है। शाहिद को अपने अभिनय की गहराई दिखाने का मौका सिर्फ फिल्म के आखिरी 10-15 मिनट में मिलता है, जहाँ क्लाइमेक्स के दौरान वे एक बेहतरीन एक्टर होने के नाते बाजी मार ले जाते हैं और अपने किरदार को एक ठहराव देते हैं।

रश्मिका मंदाना के मामले में फिल्म निराश करती है। उन्हें इस पूरी कहानी में बहुत कम इस्तेमाल किया गया है। उनके हिस्से न तो अच्छे कपड़े आए और न ही उनके किरदार को कोई मजबूती दी गई। रश्मिका का हिंदी बोलने का लहजा (डिक्शन) कई जगह खटकता है और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस भी फीकी लगती है। उनका किरदार एक ऐसी इनसिक्योर लड़की का बनकर रह गया है जो अपनी सहेली से अपना मर्द बचाने की जद्दोजहद में लगी है, जबकि असल में उसे उस टॉक्सिक दोस्त को अपनी जिंदगी से बहुत पहले ही बाहर कर देना चाहिए था।

निर्देशन, संगीत और संवाद

होमी अदजानिया, जिन्होंने पहली 'कॉकटेल' को एक कल्ट क्लासिक बनाया था, वही इस सीक्वल के भी कैप्टन हैं। होमी का फिल्म बनाने का अंदाज हमेशा से बहुत अर्बन, मॉडर्न और आज की पीढ़ी से जुड़ा हुआ रहा है। इस फिल्म में भी उन्होंने विजुअल्स और सिसिली की वादियों को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। संवादों को बहुत ही सिंपल, आधुनिक और आज के युवाओं की बोलचाल जैसा रखा गया है। फिल्म का एक संवाद, जहाँ कुणाल कहता है कि 'प्यार फटी हुई टी-शर्ट की तरह होता है जिसमें हम आराम से सोते हैं', काफी सहज और प्यारा लगता है, भले ही इसके तुरंत बाद वो अपनी मंगेतर के सामने दूसरी लड़की को 'आंखों की चमक' कह देता है। फिल्म का संगीत इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है। 'माशूका', 'वल्लाह' और 'तुझको' जैसे गाने बेहद सुरीले हैं और फिल्म के मूड को बनाए रखते हैं। मेकर्स की सबसे ज्यादा तारीफ इस बात के लिए होनी चाहिए कि उन्होंने पहली फिल्म के आइकॉनिक गाने 'तुम ही हो बंधु' को रीमिक्स के नाम पर बर्बाद नहीं किया। उन्होंने ओरिजिनल 2.0 ट्रैक को बहुत कम समय के लिए बैकग्राउंड में रखा और उसके साथ कोई फालतू छेड़छाड़ नहीं की, जो कानों को सुकून देता है।

कहां चूक गई फिल्म?

'कॉकटेल 2' की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी का खोखलापन है। पहली फिल्म में वेरोनिका, मीरा और गौतम के बीच का जुड़ाव और उनका दर्द बहुत वास्तविक और रूहानी लगता था। यहां कहानी की बुनियाद ही बहुत कमजोर और अतार्किक है। कोई भी लड़की 16 साल के रिश्ते के बाद अपनी 10 साल बाद मिली दोस्त को अपने मंगेतर को रिझाने के काम पर नहीं लगाएगी। यह पूरा ड्रामा जबरदस्ती बुना हुआ लगता है। फिल्म की स्क्रिप्ट आज के दौर के 'सिस्टर्स बिफोर मिस्टर्स' के नारे को पूरी तरह से नकारती है, जो आज की मॉडर्न और समझदार पीढ़ी के गले आसानी से नहीं उतरेगी। किरदार अधूरे और कच्चे लगते हैं। ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी अच्छी ड्रिंक में मेकर्स ने सब कुछ सही डाला, लेकिन अंत में एक चम्मच नमक डालकर उसका पूरा स्वाद बिगाड़ दिया। किरदारों के बीच वह गहरा इमोशनल कनेक्ट गायब है जो दर्शक को उनके दुख में रोने पर मजबूर कर सके।

वर्डिक्ट

'कॉकटेल 2' एक ऐसी ड्रिंक है जो दिखने में बहुत आलीशान, रंगीन और आकर्षक है, लेकिन जब आप इसकी घूंट लेते हैं, तो वह पुरानी 'कॉकटेल' जैसा नशा और स्वाद नहीं दे पाती। यह फिल्म कृति सेनन के बेहतरीन ग्लैमरस अवतार, शाहिद कपूर के आखिरी मिनटों के अभिनय और कुछ बेहद शानदार गानों के लिए एक बार देखी जा सकती है। यदि आप पहली फिल्म की यादों को जेहन में रखकर थियेटर जा रहे हैं, तो शायद आपको निराशा हाथ लगे। लेकिन अगर आप बिना ज्यादा दिमाग लगाए, सिर्फ खूबसूरत लोकेशंस, शानदार म्यूजिक और एक हल्का-फुल्का टाइम-पास लव ट्रायंगल देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके वीकेंड का एक औसत मनोरंजन बन सकती है। हमारी तरफ से इस फिल्म को 2 स्टार।