Daayra Movie Review: एनकाउंटर सही था या कहानी कुछ और? करीना-पृथ्वीराज की फिल्म हर कदम पर बदलती है आपका नजरिया

‘दायरा’ करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की दमदार अदाकारी वाली क्राइम ड्रामा है। मेघना गुलजार की फिल्म न्याय, कानून और पुलिस व्यवस्था के बीच टकराव दिखाते हुए दर्शकों को अपनी सोच पर सवाल करने पर मजबूर करती है।

Photo: PEN MOVIES YOUTUBE पृथ्वीराज और करीना।
मूवी रिव्यू:: दायरा
Critics Rating: 3 / 5
पर्दे पर: 18/09/2026
कलाकार: करीना कपूर खान
डायरेक्टर: मेघना गुलजार
शैली: क्राइम ड्रामा
संगीत: ...................

कुछ फिल्में आप कहानी के लिए देखते हैं। कुछ फिल्में कलाकारों की वजह से आपका ध्यान खींचती हैं। और फिर कुछ ऐसी फिल्में होती हैं, जिनके निर्देशक का नाम ही आपको सीट पर सीधा बैठने के लिए काफी होता है। मेघना गुलजार इसी आखिरी श्रेणी की फिल्मकार हैं। ‘राजी’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों के बाद मेघना गुलजार ने ऐसी कहानियां कहने वाली निर्देशक के तौर पर अपनी पहचान बनाई है, जो वास्तविकता से जुड़ी होती हैं, लेकिन दर्शकों को अपनी राय बनाने की पूरी जगह देती हैं। ‘दायरा’ भी इसी उम्मीद के साथ आती है। इसके साथ इसकी कास्टिंग भी तुरंत ध्यान खींचती है। अपने करियर के 25 साल पूरे कर चुकीं करीना कपूर खान इस बार एक चुनौतीपूर्ण भूमिका में नजर आती हैं। वहीं मलयालम सुपरस्टार पृथ्वीराज सुकुमारन एक ऐसे पुलिस अधिकारी का किरदार निभा रहे हैं, जो एक विवादित एनकाउंटर मामले के केंद्र में है तो क्या ‘दायरा’ अपने निर्देशक और कलाकारों से जुड़ी उम्मीदों पर खरी उतरती है? ज्यादातर हद तक, हां। पूरा रिव्यू पढ़ने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

कहानी

‘दायरा’ की शुरुआत डीसीपी रमन कुमार से होती है, जिसका किरदार पृथ्वीराज सुकुमारन ने निभाया है। रमन को एक हीरो के तौर पर पेश किया जा रहा है। उसकी टीम ने उन चार लोगों को मार गिराया है, जिन पर 24 साल की रागिनी पुजारी के साथ बेरहमी से मारपीट और दुष्कर्म करने, फिर उसे जलाकर दिल्ली हाईवे के पास उसके अवशेष छोड़ने का आरोप था। आम लोगों के लिए यह न्याय मिलने जैसा है। लेकिन इस एनकाउंटर को लेकर एक बड़ा सवाल सामने खड़ा है। क्या वास्तव में चारों आरोपियों को मुठभेड़ में मारा गया था या फिर पूरा ऑपरेशन पहले से रचा गया था?

यही सवाल डीसीपी अजूनी कोहली को कहानी के केंद्र में लेकर आता है। करीना कपूर खान ने अजूनी का किरदार निभाया है। वह इंटरनल विजिलेंस का हिस्सा हैं और उन्हें इस एनकाउंटर की जांच की जिम्मेदारी दी जाती है। अजूनी अपनी टीम के साथ सूर्यापुर पहुंचती हैं और उन घटनाओं को दोबारा खंगालना शुरू करती हैं, जो इन चारों की मौत तक पहुंची थीं। इसके बाद कहानी किसी सीधे और आसान जवाब की तलाश से ज्यादा मामले की परतें खोलने पर ध्यान देती है। जैसे-जैसे अजूनी जांच को आगे बढ़ाती हैं, फिल्म रागिनी के साथ क्या हुआ, एनकाउंटर की नौबत कैसे आई और इसमें शामिल पुलिस अधिकारियों की भूमिका क्या थी, इन सभी सवालों को सामने लाती है। कहानी 2019 में हैदराबाद में हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले और उसके बाद आरोपियों के एनकाउंटर की घटना से समानताएं दिखाती है।

कलाकारों की परफॉर्मेंस

करीना कपूर खान ‘दायरा’ की सबसे मजबूत कड़ियों में से एक हैं। अजूनी को किसी बड़ी या असाधारण पुलिस अधिकारी के तौर पर नहीं लिखा गया है। उनके हिस्से में न तो तालियां बटोरने वाले लंबे संवाद हैं और न ही कोई नाटकीय स्लो-मोशन एंट्री। वह शांत, सजग और अपने सामने मौजूद काम पर पूरी तरह केंद्रित हैं। करीना समझती हैं कि इस किरदार के लिए संयम कितना जरूरी है। वह अजूनी को जरूरत से ज्यादा हीरो बनाने की कोशिश नहीं करतीं। इसके बजाय उनकी मौजूदगी और चेहरे के भाव तनाव को बनाए रखते हैं। कुछ जगहों पर ऐसा लगता है कि इस किरदार को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था, लेकिन करीना को जितना मिला है, उसमें वह अपना पूरा असर छोड़ती हैं।

पृथ्वीराज सुकुमारन भी रमन कुमार के किरदार में उतने ही प्रभावी हैं। शुरुआत से ही यह साफ है कि रमन किस सोच के साथ खड़ा है। उसका मानना है कि सिस्टम रागिनी को न्याय नहीं दे पाया और अगर कुछ नहीं बदला तो किसी दूसरी महिला के साथ भी ऐसा ही हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म आपसे रमन से आंख बंद करके सहमत होने के लिए भी नहीं कहती। साथ ही, उसे एकतरफा खलनायक भी नहीं बनाया गया है। पृथ्वीराज रमन के किरदार को इतनी दृढ़ता के साथ निभाते हैं कि उसके नजरिए को समझना आसान हो जाता है, भले ही आप उसके तरीकों से सहमत न हों। किरदार में यही संतुलन अच्छा काम करता है। जितेंद्र जोशी हमेशा की तरह भरोसेमंद हैं और अपनी सहायक भूमिका को प्रभावी बनाते हैं। रमन के वरिष्ठ अधिकारी के किरदार में बिस्वपति सरकार का स्क्रीन टाइम सीमित है, लेकिन जब भी वह पर्दे पर आते हैं, अपनी छाप छोड़ते हैं। कंवलजीत सिंह ने अजूनी के पिता का किरदार निभाया है, लेकिन उनके किरदार को इतना मौका नहीं मिलता कि वह कोई खास प्रभाव छोड़ सके। वहीं क्षिती जोग रागिनी की मां के रूप में अलग नजर आती हैं। उनके किरदार का दुख कहीं भी जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया गया है और शायद यही वजह है कि वह ज्यादा असर करता है।

मेघना गुलजार का निर्देशन

मेघना गुलजार उन फिल्मकारों में से नहीं हैं, जो दर्शकों को हर बात सीधे-सीधे समझा दें। ‘दायरा’ में भी उनका यही नजरिया दिखाई देता है। उनके निर्देशन की सबसे बड़ी ताकत अजूनी और रमन के बीच लगातार चलने वाली वैचारिक टकराहट है। उनकी बहसें सिर्फ हीरो और विलेन तय करने के लिए नहीं हैं। इसके बजाय फिल्म बार-बार दर्शक के पैरों के नीचे से जमीन खिसकाती रहती है। जब भी आपको लगता है कि आपने अपनी राय बना ली है, कहानी का एक और नजरिया सामने आ जाता है। और यहीं ‘दायरा’ सबसे ज्यादा प्रभावी लगती है। फिल्म आपको यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या न्याय और कानून को हमेशा एक ही नजरिए से देखा जा सकता है। क्या ‘दायरा’ मेघना गुलजार की सबसे बेहतरीन फिल्म है? नहीं। यह उनकी पिछली कुछ फिल्मों जैसा प्रभाव पैदा नहीं कर पाती। लेकिन इसके बावजूद यह एक मजबूत और सोचने पर मजबूर करने वाली क्राइम ड्रामा है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी आपके साथ बनी रहती है।

क्या काम करता है?

फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में इसकी परफॉर्मेंस शामिल है। करीना और पृथ्वीराज दो बिल्कुल अलग तरह की ऊर्जा लेकर आते हैं और दोनों का टकराव कहानी को आगे बढ़ाता रहता है। फिल्म की एक और खास बात यह है कि यह आसान जवाब देने से बचती है। यह सीधे-सीधे आपको नहीं बताती कि कौन सही है और कौन गलत। इसके बजाय यह न्याय, पुलिस व्यवस्था और सिस्टम को लेकर असहज करने वाले सवालों के सामने आपको खड़ा करती है। फिल्म का तनाव भी इसकी मजबूत कड़ी है। कुछ हिस्सों में कहानी धीमी जरूर पड़ती है, लेकिन इसके बावजूद लगातार यह एहसास बना रहता है कि कुछ ऐसा है जो कभी भी सामने आ सकता है और निश्चित तौर पर मेघना गुलजार का ट्रीटमेंट कहानी को वह गंभीरता देता है, जिसकी इसे जरूरत है, लेकिन फिल्म किसी लेक्चर में बदलती हुई महसूस नहीं होती। यहां सबसे अच्छी बात यह है कि ‘दायरा’ आपको यह बताने की जल्दबाजी नहीं करती कि आपको क्या सोचना चाहिए। वह दो बिल्कुल अलग नजरिए आपके सामने रखती है और उनके टकराव को कहानी को आगे बढ़ाने देती है।

कहां कमजोर पड़ती है?

फिल्म खामियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। कुछ किरदारों को पर्याप्त तरीके से विकसित नहीं किया गया है, खासकर तब जब उन भूमिकाओं को निभाने वाले कलाकारों की क्षमता को देखा जाए। फिल्म के कुछ हिस्सों में गति भी थोड़ी और बेहतर हो सकती थी। केंद्रीय जांच कहानी को बांधे रखने के लिए काफी मजबूत है, लेकिन कुछ मौकों पर अगले महत्वपूर्ण घटनाक्रम तक पहुंचने में फिल्म जरूरत से ज्यादा समय लेती हुई महसूस होती है। करीना का अजूनी वाला किरदार भी फिल्म के सबसे दिलचस्प पात्रों में से एक है, लेकिन उसे और गहराई दी जा सकती थी। ऐसा महसूस होता है कि अजूनी के किरदार में इससे कहीं ज्यादा कुछ तलाशा जा सकता था, जिसे फिल्म पूरी तरह सामने नहीं ला पाती।

फाइनल वर्डिक्ट

‘दायरा’ आसान फिल्म नहीं है और काफी हद तक यही इसका मकसद भी है। यह सिर्फ एक थ्रिलर नहीं, बल्कि एक क्राइम ड्रामा है, जो आपको न्याय की अवधारणा पर सवाल करने के लिए मजबूर करती है। यह कोई ऐसी पुलिस कहानी नहीं है, जिसे बस देखकर आगे बढ़ जाया जाए। करीना कपूर खान अपने किरदार में संयमित और प्रभावी हैं, जबकि पृथ्वीराज सुकुमारन एक नैतिक रूप से जटिल किरदार में जरूरी पेचीदगी लेकर आते हैं। मेघना गुलजार एक बार फिर ऐसी दुनिया तैयार करती हैं, जहां जवाब दर्शकों को परोसे नहीं जाते। यह मेघना गुलजार की सबसे बेहतरीन फिल्म भले ही न हो, लेकिन ‘दायरा’ उस असहज सच की वजह से देखने लायक है, जिसे यह फिल्म खत्म होने के बाद आपके मन में छोड़ जाती है।