Don't Be Shy Movie Review: प्यार की तलाश में निकली ग्लॉसी कहानी, लेकिन खुद अपनी कमजोरियों में उलझ गई फिल्म

प्राइम वीडियो की ‘डोंट बी शाय’ युवा रिश्तों, दोस्ती और कॉलेज लाइफ की कहानी है। शानदार विजुअल्स और कलाकारों की कोशिश के बावजूद कमजोर लेखन, धीमी रफ्तार और पूर्वानुमानित कहानी फिल्म को औसत बनाती है।

Photo: PRIME VIDEO डोंट बी शाय
मूवी रिव्यू:: डोंट बी शाई
Critics Rating: 2.5 / 5
पर्दे पर: 25/09/2026
कलाकार:
डायरेक्टर: श्रीति मुखर्जी
शैली: रोमांटिक ड्रामा
संगीत: ....................

कॉलेज की जिंदगी, दोस्ती, प्यार और भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने... इन सबको लेकर बनने वाली कहानियां अक्सर इसलिए पसंद आती हैं क्योंकि इनमें दर्शकों को अपनी जिंदगी का कोई न कोई हिस्सा नजर आ जाता है। ‘डोंट बी शाय’ भी इसी दुनिया में ले जाने की कोशिश करती है। फिल्म की शुरुआत एक ऐसी युवा लड़की से होती है, जिसे लगता है कि उसने अपनी जिंदगी का हर अगला पड़ाव पहले ही तय कर लिया है। लेकिन जिंदगी जब उसकी बनाई योजना के मुताबिक आगे नहीं बढ़ती तो उसके सामने खुद को समझने और अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करने की चुनौती आती है। सुनने में यह एक दिलचस्प और रिलेटेबल कहानी लगती है, लेकिन करीब ढाई घंटे की फिल्म में यह विचार उतनी गहराई नहीं हासिल कर पाता, जितनी इसकी जरूरत थी। फिल्म में रंग है, युवा ऊर्जा है और कुछ अच्छे पल भी हैं, लेकिन कहानी बार-बार सतह पर लौट आती है।

कहानी और प्लॉट

फिल्म की कहानी 20 साल की श्यामिली दास उर्फ शाय (आरुषि बजाज) के इर्द-गिर्द घूमती है। शाय उन युवाओं में से है, जो अपनी जिंदगी को लेकर काफी स्पष्ट नजर आती है। पढ़ाई से लेकर करियर, रिलेशनशिप और आगे की जिंदगी तक उसने मन में एक पूरा खाका तैयार कर रखा है। उसके लिए जिंदगी अचानक घटने वाली घटनाओं का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी योजना है जिसे सही तरीके से फॉलो किया जाना चाहिए। शाय की इस सोच में उसका रिश्ता मयंक झुनझुनवाला (पियूष खाटी) भी अहम जगह रखता है। मयंक कॉलेज का लोकप्रिय और संपन्न लड़का है और शाय को लगता है कि उसके साथ उसका रिश्ता उसकी परफेक्ट जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन जब उसकी बनाई हुई तस्वीर में दरार पड़ती है तो शाय का आत्मविश्वास भी धीरे-धीरे डगमगाने लगता है।

इसी दौरान कहानी में तारा वर्मा (बियांका अरोड़ा) की एंट्री होती है। तारा का किरदार फिल्म के रिश्तों को एक अलग दिशा देता है। यहां फिल्म सिर्फ एक सामान्य लव ट्राएंगल बनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शाय और तारा के बीच विकसित होने वाले रिश्ते को भी जगह देती है। बचपन के दोस्त ध्रुव कुमार (अंश दुग्गल) की मौजूदगी कहानी को एक और भावनात्मक परत देती है। शाय अपने बिगड़ते हालात को संभालने और अपनी पुरानी जिंदगी को वापस पटरी पर लाने की कोशिश करती है। इसी कोशिश में वह कई ऐसे फैसले लेती है, जिनसे हालात सुधरने के बजाय और उलझते जाते हैं। फिल्म का असली फोकस यहीं है कि जब जिंदगी आपकी योजना के हिसाब से न चले, तो क्या आप परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करते रहेंगे या खुद को बदलने के लिए तैयार होंगे? विचार अच्छा है, लेकिन स्क्रीनप्ले कई जगह इस विचार को मजबूती से पकड़ नहीं पाता। घटनाएं आती हैं, किरदार प्रतिक्रिया देते हैं और फिर कहानी अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाती है। कई भावनात्मक स्थितियों को पर्याप्त समय नहीं मिलता, जिसके कारण दर्शक किरदारों के साथ उतना गहराई से जुड़ नहीं पाता।

निर्देशन कैसा है?

निर्देशक श्रीति मुखर्जी ने फिल्म को एक चमकदार और मॉडर्न यंग-एडल्ट ड्रामा के रूप में पेश करने की कोशिश की है। फिल्म का ट्रीटमेंट जानबूझकर थोड़ा चुलबुला, रंगीन और स्टाइलिश रखा गया है। कॉलेज कैंपस, पार्टियां, फैशन, सोशल मीडिया वाली भाषा और युवाओं के बीच होने वाली बातचीत फिल्म को समकालीन बनाने की कोशिश करती है। फिल्म में शाय का सीधे कैमरे से बात करना भी दिलचस्प प्रयोग है। इससे दर्शक उसके विचारों और उसकी मानसिक स्थिति के करीब पहुंच सकता है। कुछ दृश्यों में यह तकनीक प्रभावी लगती है, खासकर तब जब शाय अपने आत्मविश्वास के पीछे छिपी असुरक्षा को सामने आने देती है, लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म अपनी शैली और कहानी के बीच संतुलन हमेशा कायम नहीं रख पाती। कई बार ऐसा लगता है कि दृश्य को ज्यादा कूल या यूथफुल दिखाने की कोशिश कहानी की भावनात्मक जरूरत पर भारी पड़ रही है। फिल्म जिन मुद्दों को छूती है, उन्हें पूरी तरह एक्सप्लोर करने के बजाय जल्दी से आगे बढ़ जाती है। करीब ढाई घंटे की लंबाई भी यहां परेशानी पैदा करती है। कहानी को और कसकर पेश किया जाता तो फिल्म ज्यादा प्रभावी हो सकती थी।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी स्तर पर ‘डोंट बी शाय’ कमजोर फिल्म नहीं है। इसका विजुअल ट्रीटमेंट चमकदार है और पूरी फिल्म में एक पॉलिश्ड लुक नजर आता है। रंगों, कपड़ों, लोकेशंस और कॉलेज लाइफ की प्रस्तुति से फिल्म एक खास यूथफुल माहौल तैयार करती है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के हल्के-फुल्के मूड को सपोर्ट करती है। स्क्रीन पर सबकुछ काफी व्यवस्थित और आकर्षक दिखाई देता है। हालांकि यही खूबसूरती कई बार कहानी की कृत्रिमता को भी उजागर कर देती है। कॉलेज की दुनिया वास्तविक जिंदगी से कुछ ज्यादा ही परफेक्ट और स्टाइलाइज्ड लगती है, जिससे किरदारों के अनुभवों से जुड़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। एडिटिंग में सबसे ज्यादा सुधार की गुंजाइश नजर आती है। कई हिस्सों में कहानी जरूरत से ज्यादा खिंचती महसूस होती है। कुछ सीक्वेंस को छोटा किया जाता तो नैरेटिव ज्यादा तेज और असरदार हो सकता था। खासकर दूसरे हिस्से में फिल्म की गति कुछ जगह धीमी पड़ती है।

राम संपत का संगीत फिल्म के मूड के अनुरूप है और कहानी की युवा ऊर्जा को बनाए रखने में मदद करता है। हालांकि गाने या बैकग्राउंड म्यूजिक ऐसा प्रभाव नहीं छोड़ते कि फिल्म खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक याद रहें। इस तरह की कहानी में संगीत रिश्तों और भावनाओं को मजबूत करने का काम कर सकता था, लेकिन यहां उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से माहौल बनाने तक सीमित रह जाता है।

आरुषि बजाज की परफॉर्मेंस

आरुषि बजाज फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा हैं और शाय के किरदार को निभाने में वह ईमानदार नजर आती हैं। शाय हमेशा पसंद आने वाली लड़की नहीं है। वह जिद्दी है, कई बार स्वार्थी भी नजर आती है और अपनी बनाई हुई दुनिया को बचाने के लिए ऐसे फैसले लेती है, जिनसे परेशानी बढ़ती है। आरुषि इन खामियों को पर्दे पर लाने की कोशिश करती हैं। खासकर वे दृश्य बेहतर हैं, जहां शाय के आत्मविश्वास की परत धीरे-धीरे हटती है और उसकी असुरक्षा सामने आती है। हालांकि कमजोर लेखन की वजह से उनके किरदार को वह गहराई नहीं मिल पाती, जिसकी वजह से उनका प्रदर्शन यादगार बन सके।

पियूष खाटी और बियांका अरोड़ा

पियूष खाटी ने मयंक के किरदार में जरूरी चार्म दिखाया है। वह एक अमीर और लोकप्रिय कॉलेज स्टूडेंट के रूप में सहज लगते हैं। हालांकि उनका किरदार काफी हद तक उस परिचित रोमांटिक हीरो की श्रेणी में रहता है, जिसे ऐसी कहानियों में पहले भी देखा जा चुका है। स्क्रीनप्ले उन्हें इससे आगे निकलने का पर्याप्त मौका नहीं देता। बियांका अरोड़ा फिल्म में ताजगी लेकर आती हैं। तारा का किरदार कहानी के लिए इसलिए अहम है क्योंकि उसे सिर्फ शाय की प्रतिद्वंद्वी बनाकर नहीं छोड़ा गया। शाय और तारा के बीच बनने वाली दोस्ती फिल्म के बेहतर हिस्सों में से एक है। बियांका इस भूमिका में सहज और ऊर्जावान नजर आती हैं। उनके और आरुषि के साथ वाले दृश्यों में फिल्म को वह स्वाभाविकता मिलती है, जो बाकी हिस्सों में कई बार गायब रहती है।

अंश दुग्गल बने मजबूत कड़ी

अंश दुग्गल का ध्रुव उन किरदारों में है, जिनमें फिल्म की भावनात्मक जमीन सबसे ज्यादा मजबूत नजर आती है। ध्रुव और शाय के बीच पुराना रिश्ता है और अंश ने इस जटिलता को बिना जरूरत ज्यादा दिखावे के निभाया है। उनके अभिनय में एक संयम है, जो किरदार को विश्वसनीय बनाता है। खासकर शाय के साथ उनके दृश्यों में भावनात्मक वजन महसूस होता है। अगर स्क्रीनप्ले ने ध्रुव के किरदार को और विकसित किया होता तो यह फिल्म के सबसे यादगार किरदारों में शामिल हो सकता था।

सपोर्टिंग कास्ट का इस्तेमाल सीमित

कुणाल रॉय कपूर, अनुराग बसु, नेहा धूपिया और अंजू अल्वा नाइक जैसे कलाकार फिल्म में मौजूद हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर को उनकी क्षमता के हिसाब से पर्याप्त जगह नहीं मिलती। कुणाल रॉय कपूर अपने कॉमिक अंदाज से कई दृश्यों में जान डालते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस स्वाभाविक है और उन्हें देखने में मजा आता है। अनुराग बसु और अंजू अल्वा नाइक शाय के माता-पिता के रूप में गर्मजोशी लेकर आते हैं। वहीं नेहा धूपिया का किरदार कहानी में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता था, लेकिन पटकथा उन्हें उस स्तर तक नहीं ले जाती।

क्या नहीं किया काम?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लेखन शैली है। कहानी में कई ऐसे विचार हैं जिनमें दम है—युवा उम्र की असुरक्षा, भविष्य को लेकर दबाव, रिश्तों की उलझन, बॉडी इमेज, महत्वाकांक्षा और सामाजिक हैसियत की चाह। समस्या यह है कि फिल्म इनमें से किसी एक विषय को भी पर्याप्त गहराई से नहीं पकड़ती। शाय का किरदार भी कई बार दोहराव का शिकार होता है। शुरुआत में उसकी महत्वाकांक्षा और अपने भविष्य को लेकर जुनून दिलचस्प लगता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वही व्यवहार परेशान करने लगता है। फिल्म उसके व्यवहार की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कम करती है। रिश्तों में भी कई घटनाएं स्वाभाविक विकास के बजाय कहानी को आगे बढ़ाने के लिए जोड़ी गई महसूस होती हैं। कुछ ड्रामेटिक मोमेंट्स से भावनात्मक असर पैदा करने की कोशिश की गई है, लेकिन दर्शक उन किरदारों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाता कि उनका दर्द पूरी तरह महसूस कर सके। सबसे बड़ी बात, फिल्म खुद को जितना फ्रेश और नई पीढ़ी की कहानी बताना चाहती है, उतनी नई यह महसूस नहीं होती। सोशल मीडिया रेफरेंस, चमकदार विजुअल्स और मॉडर्न डायलॉग्स जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे की कहानी कई जगह काफी जानी-पहचानी लगती है।

फाइनल वर्डिक्ट

‘डोंट बी शाय’ में एक अच्छी यंग-एडल्ट फिल्म बनने की पर्याप्त संभावनाएं थीं। इसकी कहानी का मूल विचार रिलेटेबल है, कलाकारों ने ईमानदार कोशिश की है और फिल्म देखने में भी आकर्षक लगती है। शाय और तारा की दोस्ती तथा ध्रुव का किरदार कुछ ऐसे हिस्से देते हैं जहां फिल्म अपने फॉर्मूले से थोड़ा ऊपर उठती है, लेकिन कमजोर और असमान स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा लंबी कहानी और भावनात्मक गहराई की कमी फिल्म को उसकी क्षमता तक नहीं पहुंचने देती। फिल्म महत्वाकांक्षा, प्यार, दोस्ती और खुद को स्वीकार करने जैसे विषयों को छूती जरूर है, लेकिन उन्हें पूरी तरह महसूस कराने का मौका नहीं देती। अगर आप हल्की-फुल्की कॉलेज लाइफ, युवा कलाकारों और रिलेशनशिप ड्रामा वाली फिल्म देखना चाहते हैं तो ‘डोंट बी शाय’ एक बार देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप ऐसी कहानी की उम्मीद कर रहे हैं जो खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ रहे तो यह फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंचती। कुल मिलाकर ‘डोंट बी शाय’ चमकदार पैकेज में पेश की गई एक औसत यंग-एडल्ट कहानी है, जिसमें अच्छे कलाकार और कुछ अच्छे पल तो हैं, लेकिन मजबूत लेखन और भावनात्मक पकड़ की कमी इसे यादगार बनने से रोक देती है।