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‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ रिव्यू: संजय मिश्रा की सादगी में छुपी गहराई, हल्की मुस्कान और गहरे जज्बातों को पेश करती है कहानी

‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ बनारस की पृष्ठभूमि में बनी एक सादगीभरी पारिवारिक फिल्म है। संजय मिश्रा और महिमा चौधरी के प्रभावशाली अभिनय के साथ यह फिल्म रिश्तों, दूसरे मौकों और सामाजिक सोच को हल्के हास्य व भावनाओं के जरिए सामने रखती है। फिल्म का विस्त

Photo: PRESS KIT महिमा चौधरी और संजय मिश्रा।
मूवी रिव्यू:: ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’
Critics Rating: 3 / 5
पर्दे पर: 19/12/2025
कलाकार:
डायरेक्टर: सिद्धांत राज सिंह
शैली: फैमिली ड्रामा, हास्य नाटक
संगीत: ................

बनारस की मिट्टी, वहां की गलियां, घाटों की शांति और लोगों की सादगी, इन सबको अपने भीतर समेटे ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ एक ऐसी पारिवारिक फिल्म है, जो शोर-शराबे और भारी-भरकम ड्रामे से दूर रहते हुए आम लोगों की जिंदगी की छोटी-छोटी उलझनों को बड़े दिल से पेश करती है। यह फिल्म उस तरह की है, जिसे देखते हुए दर्शक अपने आसपास के किरदारों को पहचान सकते हैं, पड़ोसी, रिश्तेदार या फिर अपने ही परिवार का कोई सदस्य। इमोशन और हल्की-फुल्की कॉमेडी के संतुलन के साथ यह फिल्म दर्शकों को मुस्कुराने और सोचने, दोनों का मौका देती है।

कहानी

कहानी बनारस में रहने वाले दुर्लभ प्रसाद के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पेशे से एक साधारण सैलून चलाते हैं। वे एक सीधी-सादी जिंदगी जीते हैं और अपने बेटे मुरली के लिए ही अपना पूरा संसार देखते हैं। उनके साथ घर में उनका साला राम मंच प्रसाद भी रहता है, जो हर स्थिति में चुटकी लेने से बाज नहीं आता। मुरली की जिंदगी तब रंगीन हो जाती है जब उसकी मुलाकात महक से होती है और दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। सब कुछ ठीक चल रहा होता है, लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब इस रिश्ते की भनक महक के पिता ब्रज नारायण भारती तक पहुंचती है।

ब्रज नारायण शहर के जाने-माने व्यापारी हैं और सामाजिक मान-मर्यादाओं को लेकर बेहद सख्त सोच रखते हैं। वे इस रिश्ते को सीधे तौर पर नकार देते हैं और शादी के लिए एक अजीब-सी शर्त रख देते हैं। उनका कहना है कि वे तभी इस रिश्ते के लिए राज़ी होंगे, जब मुरली के पिता दुर्लभ प्रसाद दोबारा शादी करेंगे और घर में एक औरत आएगी। 55 साल की उम्र में, वह भी एक साधारण सैलून चलाने वाले व्यक्ति के लिए दोबारा शादी करना आसान नहीं होता। यहीं से कहानी हास्य और भावनाओं के बीच झूलने लगती है। अपने प्यार को पाने के लिए मुरली खुद अपने पिता की शादी कराने की मुहिम में लग जाता है। इसी दौरान कहानी में बबीता की एंट्री होती है, जो अपनी ज़िंदगी के अलग अनुभवों के साथ आती हैं। अब सवाल यह नहीं रह जाता कि शादी होगी या नहीं, बल्कि यह बन जाता है कि क्या हर रिश्ते को समाज के तय किए गए ढांचे में ही फिट होना चाहिए। फिल्म इसी सवाल को हल्के-फुल्के अंदाज़ में, लेकिन गहराई के साथ सामने रखती है।

अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है। संजय मिश्रा एक बार फिर यह साबित करते हैं कि वे साधारण किरदारों में असाधारण जान डालने की क्षमता रखते हैं। दुर्लभ प्रसाद के रूप में वे न तो जरूरत से ज्यादा भावुक होते हैं और न ही बनावटी। एक ऐसे पिता की भूमिका में वे पूरी तरह विश्वसनीय लगते हैं, जो बेटे की खुशी के लिए अपनी झिझक और उम्र दोनों को पीछे छोड़ने को तैयार है। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी किरदार को बेहद मानवीय बना देते हैं। महिमा चौधरी बबीता के किरदार में सधी हुई और प्रभावशाली नजर आती हैं। लंबे समय बाद इस तरह के शांत और गंभीर रोल में उन्हें देखना सुखद अनुभव है। संजय मिश्रा जैसे अनुभवी कलाकार के साथ उनका तालमेल फिल्म को संतुलन देता है। उनका किरदार न तो ज्यादा बोलता है और न ही खुद को थोपता है, लेकिन कहानी में उसकी मौजूदगी अहम बन जाती है।

व्योम यादव मुरली के रूप में नेचुरल लगते हैं। उनके अभिनय में एक देसी मासूमियत है, जो किरदार को पसंद करने लायक बनाती है। पलक लालवानी महक के रोल में सादगी और सहजता के साथ सामने आती हैं। दोनों की केमिस्ट्री भरोसेमंद है और कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करती है। श्रीकांत वर्मा साले राम मंच प्रसाद के किरदार में खूब हँसाते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग और संजय मिश्रा के साथ नोक-झोंक फिल्म के हल्के पल रचती है। वहीं, प्रवीण सिंह सिसौदिया ब्रज नारायण भारती के सख्त लेकिन ज़मीनी किरदार में फिट बैठते हैं और कहानी को ज़रूरी टकराव देते हैं।

निर्देशन और प्रस्तुति

फिल्म का निर्देशन सादगी के साथ किया गया है। निर्देशक ने न तो कहानी को खींचने की कोशिश की है और न ही अनावश्यक ड्रामा जोड़ा है। बनारस सिर्फ एक लोकेशन नहीं, बल्कि फिल्म का अहम हिस्सा बनकर उभरता है। घाटों की तस्वीरें, तंग गलियां, ठेठ बनारसी बोली और स्थानीय रंग-ढंग कहानी को और ज़्यादा वास्तविक बनाते हैं। हां, कुछ जगहों पर कहानी में बिखराव नजर आता है तो जो थोड़ा ध्यान जरूर भटकाता है, कहानी की लय बिगड़ती है और लगता है कि इन सीन्स को टाला जा सकता था, लेकिन इसे अगर नजरअंदाज करें और कमाल के अभिनय ने कहानी को सहारा दिया है।

फाइनल टेक

‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ एक ऐसी पारिवारिक फिल्म है, जो बड़े संदेश को छोटी कहानी में कहने की कोशिश करती है। यह फिल्म जिंदगी को दूसरा मौका देने, रिश्तों को नए नज़रिए से देखने और समाज के बनाए नियमों पर सवाल उठाने की बात करती है, वो भी बिना भाषण दिए। अभिनय इसकी सबसे बड़ी ताकत है, खासकर संजय मिश्रा और महिमा चौधरी की जोड़ी फिल्म को एक अलग पहचान देती है। कुछ जगहों पर रफ्तार थोड़ी धीमी लग सकती है, लेकिन कुल मिलाकर यह एक साफ-सुथरी, दिल को छू लेने वाली फिल्म है, जिसे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता है।