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Gullak Season 5 Review: चेहरे बदलने से नहीं बदलते घर के रिश्ते, नए 'अन्नू भैया' के साथ कम नहीं हुई मिश्रा परिवार की मिठास
गुल्लक सीजन 5 रिव्यू: बदलते वक्त के बीच वही पुरानी यादों की सौंधी खुशबू, जो सीधे दिल को छूती है एक बार फिर ओटीटी के पर्दे पर लौट आई है। गुल्लक सीजन 5 दस्तक दे चुका है, कुछ पुराने कुछ नए चेहरे के साथ ये शो अब कैसा है जानें।
आज के दौर पर अगर गौर करें तो एक ओर लोग बड़े पर्दे से लेकर ओटीटी पर सस्पेंस, मर्डर मिस्ट्री, बोल्ड फिल्में देखना पसंद कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर घरेलू, गांव की लुभावनी कहानियों को भी सराह रहे हैं। इसी दौर में 'पंचायत', 'ये मेरी फैमिली', 'ग्राम चिकित्सालय' और 'दोपहिया' जैसे कई शोज ने जन्म लिया। इसी में से एक है TVF की सीरीज, जो अलग लेवल का कंफर्ट देती थीं, लोगों के दिलों में उतर जाती है, इसका नाम है 'गुल्लक'। अब इसका पांचवा सीजन रिलीज हो चुता है और सोनी लिव पर स्ट्रीम हो रहा है। इस सीरीज के पहले 4 भाग काफी सफल रहे, ऐसे में लोगों की उम्मीदें 5वें सीजन से भी खास तौर पर जुड़ी रहीं। कई लोगों के लिए 'गुल्लक' का आना चिलचिलाती धूप में नीम की ठंडी छांव जैसा ही है। यह शो कोई बड़ी-बड़ी गाड़ियां, आलीशान बंगले या चौंकाने वाले क्लाइमेक्स नहीं दिखाता, ये बस आपके बगल में आकर ठहर जाता है और फिर धीरे-धीरे जेहन में घुलता है, ठीक वैसे ही जैसे शुक्रवार की ढलती दोपहर में चाय का एक कुल्हड़ रखा हो और धीरे-धीरे बिस्किट उसमें घुल जाए। पिछले सीजम की तरह ही ये जिंदगी की उन छोटी-छोटी खुशियों की याद दिलाएगा जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में पीछे छोड़ देते हैं। लगभग दो साल के लंबे इंतजार के बाद मिश्रा परिवार अपने पांचवें सीजन के साथ वापस लौट आया है। TVF की खूबी रही है कि वे इंसानी रिश्तों को बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारते हैं और ये सीजन भी पूरी तरह से एक ह्यूमन स्टोरी है, जिसे देखकर लगता है कि यह हमारे अपने घर का किस्सा है, किसी मशीन या कंप्यूटर से लिखी गई स्क्रिप्ट नहीं है।
क्या है गुल्लक सीजन 5 का प्लॉट?
इस बार मिश्रा निवास 534 में बदलाव की बयार बह रही है, लेकिन इसकी रफ्तार किसी बुलेट ट्रेन की तरह नहीं बल्कि लखनऊ मेल की तरह है, जो कि बहुत ही धीमी है। सीजन की शुरुआत एक ऐसे नजारे से होती है जिससे हर मिडिल क्लास परिवार पहले ही वाकिफ है, पहले ही शॉट में आपको घर के एक कोने में रखे पेंट के डिब्बे, रोलर, पुट्टी और ब्रश दिखाई देंगे। जी हां, मिश्रा जी के घर में सालों बाद पोताई हो रही है। एक और बड़ा बदलाव भी हो रहा है, अब मिश्रा जी के घर में वाई-फाई राउटर भी आ गया है, क्योंकि बड़े बेटे अन्नू को अपनी ऑफिस की मीटिंग्स के लिए बिना रुकावट वाला इंटरनेट चाहिए। मजेदार बात ये है-
इस बार भी घर की रीति नहीं बदली है, इस बार भी गुल्लक ही काम आया है, लेकिन कुछ अलग तरह से। राउटर को जगह देने के लिए हमारे प्यारे मिट्टी के गुल्लक को अपनी पुरानी जगह छोड़नी पड़ती है। ये गुल्लक ही इस कहानी का सूत्रधार है। यह छोटा सा बदलाव ही इस सीजन के पूरे माहौल को बदल रहा है।
पूरी कहानी छोटे-छोटे रोजमर्रा के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। पिता संतोष मिश्रा रेनोवेशन के लिए लोन लेने की जद्दोजहद में हैं, लेकिन स्वाभिमान के कारण अपने कमाऊ बेटे से पैसे नहीं मांग रहे। मां शांति मिश्रा अपने वजूद और पहचान को लेकर थोड़ी ज्यादा परेशान हैं। इस बार भी पड़ोस की बिट्टू की मम्मी किसी भी मामले में तड़का लगाने से पीछे नहीं हैं, वो शांति मिश्रा की परेशानी को और हवा दे रही हैं। इस वो अपने नए महिला मंडल की कामयाबी के तौर पर देख रही है। छोटा बेटा अमन हॉस्टल से लौट आया है, उसके पास अपने कुछ नए अनभव हैं और एक छोटा सा राज भी है जिसे वो अपने परिवार से छिपा रहा है। वहीं बड़ा बेटा अन्नू अपनी नौकरी के तनाव, बॉस की बदतमीजी और अपने करियर के असमंजस के बीच झूल रहा है। इसके साथ ही अन्नू का डॉक्टर प्रीति के लिए हिडेन लव अब धीरे-धीरे बाहर आने लगा है। कहानी में इस बार भी कोई बड़ा धमाका और सस्पेंस नहीं है, बल्कि पनीर के टुकड़े गायब होने से लेकर दांत के दर्द जैसी छोटी-छोटी बातें है बेचैनी और ड्रामा पैदा कर रही हैं। यही इस शो की असली जान है, कुछ भी जबरन नहीं जोड़ा गया है।
गुल्लक सीजन 5 कलाकारों की एक्टिंग
इस शो की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से इसके कलाकारों की परफॉर्मेंस रही है। जमील खान (संतोष मिश्रा) और गीतांजलि कुलकर्णी (शांति मिश्रा) ने इन किरदारों को जिया नहीं है, बल्कि वे सचमुच इस देश के हर माता-पिता की सोच, उनके संघर्ष और हर रोज की जद्दोजहद का चेहरा बन चुके हैं। जमील खान ने एक ऐसे पिता के दर्द और मर्यादा को बखूबी पर्दे पर उतारा है जो आर्थिक तंगी में भी झुकना में भी खड़ा है और हार नहीं मानना चाहता। वहीं गीतांजलि कुलकर्णी ने जिस तरह से मां के किरदार में ममता, हल्की सी चिड़चिड़ाहट और अपनी पहचान खोने का डर दिखाया है, वह आपकी आंखों में आंसू ला सकता है। छोटे बेटे के रोल में हर्ष मयार ने अपनी पुरानी मासूमियत और थोड़ी सी नादानी को बरकरार रखा है, हालांकि कुछ जगहों पर उनका बचपना उनकी उम्र के हिसाब से थोड़ा ज्यादा लगता है, फिर भी उनकी कमाल की एक्टिंग के चलते उन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता।
इस सीजन की सबसे बड़ी चुनौती थी वैभव राज गुप्ता की जगह नए एक्टर अनंतविजय जोशी को अपनाना, जिन्होंने सबसे चहेता अन्नू भैया का रोल अदा किया है। शुरुआत में दर्शकों के लिए एक नया चेहरा देखना थोड़ा अजीब लगता है, क्योंकि 4 सीजन की पुरानी यादें जुड़ी हुई थीं। लोगों ने अन्नू भैया को दिल और दिमाग दोनों में बसा लिया था, वैभव ने अपने काम से ऐसी छाप छोड़ी थी कि उन्हें एक झटके में भुलाकर किसी नए अन्नू भैया को दिल में दोबारा बसा पाना इतना आसान नहीं था, लेकिन अनंतविजय जोशी ने अपनी सादगी और बेहतरीन अदाकारी से इस मुश्किल काम को थोड़ा आसान कर दिया है।
हां, वो पहले वाले अन्नू भैया की तरह कड़क नहीं लग रहे हैं, क्योंकि उन्होंने उसी जामे में खुद को ढालने की कोशिश नहीं की, वो एक नया फ्लेवर और नया अंदाज लेकर आए, जिसे देखने के बाद आपको पुराने अन्नू भैया की कमी भी नहीं खलेगी और कुछ नयापन भी देखने को मिलेगा। उन्होंने एक मध्यमवर्गीय कामकाजी लड़के के तनाव, अपनी इच्छाओं और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को बहुत ही ईमानदारी से निभाया है और आखिरी एपिसोड आते-आते ये लगने लगा कि अब वो धीरे-धीरे अन्नू के किरदार में पूरी तरह रम चुके हैं।
पड़ोसन बिट्टू की मम्मी के रूप में सुनीता रजवार ने हमेशा की तरह अपनी लाउड और हर बात में टांग अड़ाने वाली आदत से मनोरंजन डबल कर दिया है, हालांकि इस बार उनके किरदार को थोड़ा ज्यादा ही निगेटिव दिखा दिया गया है जो कभी-कभी खटकता है। आपके मन में ये फीलिंग आएगी कि बिट्टू की मम्मी इतनी भी बुरी नहीं हैं, नए किरदारों में गोपाल दत्त 'पिंकी मामा' के रूप में नजर आ रहे हैं, जिनकी टी-शर्ट पर कलेशी आदमी लिखा है। वह शो में थोड़ी हलचल और कॉमेडी लेकर आते हैं, लेकिन कहानी में पूरी तरह ढले नहीं लगते, कुछ सीन में उनका अंदाज थोड़ा लाउड लगता है। डॉक्टर प्रीति के रूप में हेली शाह के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था, लेकिन अन्नू के साथ उनके सीन एक दिलचस्पी पैदा करते हैं कि अब आगे क्या होगा, ठीक वैसे ही जैसे 'पंचायत' में सचिव और रिंकी के किरदार के साथ किया गया था।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
श्रेयांश पांडे और अभय राउत के निर्देशन में बनी 'गुल्लक 5' ठीक उसी रफ्तार से चलती है जिसके लिए यह जानी जाती है। निर्देशकों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि सोशल मीडिया पर रील्स बनाने के चक्कर में शो के असली जज्बात न खो जाएं। उन्होंने किसी भी सीन को जबरदस्ती रोने-धोने वाला या जबरन की हंसी नहीं जोड़ी है। कैमरा वर्क बहुत ही साधारण और घरेलू है, जो आपको सीधे मिश्रा जी के आंगन और रसोई में ले जाता है। घर के अंदर बिखरा हुआ सामान, दीवारों की सीलन और पेंट की गंध को आप स्क्रीन पर महसूस कर सकते हैं। विदित त्रिपाठी का लेखन इस शो की रीढ़ की हड्डी है। मिट्टी के गुल्लक के रूप में शिवंकित सिंह परिहार की आवाज में जो डायलॉग्स कहे गए हैं, वे केवल संवाद नहीं हैं, बल्कि जीवन के सबक हैं जो हमें हमारे बड़े बुजुर्ग अक्सर चाय की चुस्कियों के बीच बताया करते थे। यादें, पुरानी बातें, माता-पिता के अधूरे सपने और भाई-बहन का प्यार, इन सब बातों को बहुत ही सरल और सीधे शब्दों में लिखा गया है जो सीधे दिल में उतर जाते हैं। हालांकि तकनीकी रूप से कहानी का अंत थोड़ा कमजोर लगता है। पूरी कहानी जिस धीमी गति से आगे बढ़ती है, आखिरी एपिसोड में सारी समस्याओं का हल इतनी जल्दी और आसानी से निकल आता है जो थोड़ा फिल्मी और हड़बड़ी में किया गया लगता है। इसे थोड़ा और समय दिया जा सकता था।
वर्डिक्ट
'गुल्लक सीजन 5' कोई नया प्रयोग नहीं करता और अच्छी बात यह है कि इसे ऐसा करने की जरूरत भी नहीं थी। यह शो आज के दौर में उस वसीयत की तरह है जिसे संभालकर रखना जरूरी है। यह हमें सिखाता है कि जिंदगी सिर्फ बड़ी सफलताओं, प्रमोशन या महंगे दौरों का नाम नहीं है। जिंदगी तो उन छोटे-छोटे पलों का नाम है जो हम अपने परिवार के साथ बिताते हैं, जैसे मिलकर घर की पुट्टी साफ करना, वाई-फाई का पासवर्ड शेयर करना या मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का हाथ थाम लेना। भले ही इसका अंत थोड़ा जल्दबाजी में लगता है और कहानी में बहुत बड़े बदलाव देखने को नहीं मिलते, लेकिन फिर भी मिश्रा परिवार का यह सफर आपको एक दिली सुकून और चेहरे पर मुस्कान दे जाता है। अगर आप अपने परिवार के साथ बैठकर कुछ बेहद साफ-सुथरा, सच्चा और इमोशनल देखना चाहते हैं तो इस वीकेंड अपनी 'गुल्लक 5' को एक बार फिर खंगाल डालिए।
रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार