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Haiwaan Review: सैफ हैं 'असली खिलाड़ी', अक्षय की खलनायकी में दम, पर फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी
‘हैवान’ एक क्राइम थ्रिलर है, जिसमें सैफ अली खान और अक्षय कुमार की दमदार भिड़ंत देखने को मिलती है। प्रियदर्शन का निर्देशन अच्छा है, लेकिन लंबा रनटाइम और धीमी रफ्तार कमजोरियां हैं।
जब कोई निर्देशक अपनी ही सफल फिल्म को दूसरी भाषा में दोबारा बनाता है, तो उम्मीद सिर्फ कहानी दोहराने की नहीं होती, बल्कि उसे नए दर्शकों के हिसाब से बेहतर अनुभव देने की भी होती है। 'हैवान' के साथ भी कुछ ऐसा ही है। प्रियदर्शन ने अपनी 2016 की मलयालम फिल्म 'ओपम' को हिंदी दर्शकों के लिए नए कलाकारों के साथ पेश किया है। इस बार सामने सैफ अली खान और अक्षय कुमार जैसे दो बड़े कलाकार हैं, जिनकी भिड़ंत फिल्म को शुरुआत से ही खास बनाती है। 'हैवान' पूरी तरह परफेक्ट थ्रिलर नहीं है, लेकिन इसमें इतना मसाला जरूर है कि फिल्म आपको कई जगह बांधे रखती है। कहानी का बेस मजबूत है, दूसरे हाफ में रोमांच बेहतर होता है और कलाकारों का प्रदर्शन फिल्म को संभालता है। हां, समस्या इसकी लंबाई और कुछ ऐसे हिस्सों से है जो कहानी की रफ्तार को बेवजह धीमा कर देते हैं। करीब पौने तीन घंटे की फिल्म अगर थोड़ी ज्यादा टाइट होती तो इसका असर कहीं बेहतर हो सकता था। विस्तार से पूरा रिव्यू पढ़ने के लिए नीचे स्क्रोल करें-
एक आम आदमी जो असाधारण चुनौती में फंस जाता है
फिल्म की कहानी श्याम राणे यानी सैफ अली खान के इर्द-गिर्द घूमती है। श्याम देखने में असमर्थ है, लेकिन उसकी बाकी इंद्रियां बेहद तेज हैं। आवाज, गंध और स्पर्श के जरिए वह अपने आसपास की दुनिया को समझता है। परिवार की जिम्मेदारियां उठाने वाला श्याम मुंबई की एक ऊंची इमारत में मेंटेनेंस मैनेजर का काम करता है और वहां के लोगों के बीच उसकी अच्छी पकड़ है। श्याम की जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही होती है, लेकिन हालात उसे एक बेहद खतरनाक परिस्थिति में पहुंचा देते हैं। इसी बीच कहानी में प्रवेश होता है परशुराम गोखले का, जिसे अक्षय कुमार ने निभाया है। परशुराम का अतीत दर्द और बदले की भावना से भरा है। उसके साथ हुई घटनाओं ने उसे एक ऐसे रास्ते पर पहुंचा दिया है जहां कानून और इंसाफ के बीच की सीमा उसके लिए खत्म हो चुकी है।
इसके बाद फिल्म श्याम और परशुराम के बीच संघर्ष की कहानी बन जाती है। श्याम के सामने चुनौती सिर्फ खुद को बचाने की नहीं है, बल्कि उन लोगों की सुरक्षा की भी है जो इस पूरे मामले में उसके साथ जुड़ जाते हैं। उसकी दृष्टिहीनता जहां उसकी कमजोरी दिखाई देती है, वहीं उसकी विकसित इंद्रियां उसे इस खतरनाक खेल में एक अलग तरह की बढ़त भी देती हैं।
शुरुआत धीमी, लेकिन बाद में पकड़ बनाती है
'हैवान' की सबसे बड़ी शिकायत इसकी शुरुआत को लेकर है। फिल्म अपने किरदारों और उनके बैकग्राउंड को स्थापित करने में काफी समय लेती है। कहानी आगे बढ़ती जरूर है, लेकिन थ्रिलर का असली रोमांच आने में समय लगता है। कुछ गाने और सेलिब्रेशन वाले हिस्से भी नैरेटिव की गति को प्रभावित करते हैं। इन दृश्यों को छोटा किया जाता तो फिल्म कहीं ज्यादा चुस्त महसूस होती। हालांकि जैसे-जैसे कहानी अपने मुख्य संघर्ष की तरफ बढ़ती है, फिल्म बेहतर होने लगती है। इंटरवल के आसपास तनाव बढ़ता है और दूसरे हाफ में थ्रिलर वाला हिस्सा ज्यादा प्रभावी नजर आता है। कुछ सीक्वेंस वास्तव में उत्सुकता पैदा करते हैं और दर्शक यह जानने के लिए कहानी के साथ बना रहता है कि श्याम इस खतरे से कैसे निपटेगा। यही वजह है कि लंबाई के बावजूद फिल्म पूरी तरह बिखरती नहीं है।
प्रियदर्शन का अनुभव कई जगह नजर आता है
प्रियदर्शन इस तरह की कहानी को अच्छी तरह समझते हैं। उन्होंने मूल फिल्म का निर्देशन किया था, इसलिए उन्हें पता है कि श्याम के किरदार की कमजोरियों को किस तरह उसकी ताकत में बदला जा सकता है। फिल्म में कुछ ऐसे सस्पेंस सीक्वेंस हैं जहां निर्देशक का अनुभव साफ दिखाई देता है। कैमरा, बैकग्राउंड साउंड और किरदारों की गतिविधियों के जरिए तनाव बनाने की कोशिश प्रभावी है। साथ ही प्रियदर्शन अपनी कॉमेडी वाली पहचान को भी पूरी तरह नहीं छोड़ते। फिल्म में हल्के-फुल्के पल आते रहते हैं और शरिब हाशमी इन दृश्यों में काफी मनोरंजन करते हैं। हालांकि कॉमेडी और थ्रिलर का संतुलन हर जगह एक जैसा नहीं बैठता। कुछ मौकों पर हंसी ऐसे समय आती है, जब कहानी को और गंभीर होना चाहिए था। फिर भी निर्देशन में फिल्म को संभालने की क्षमता दिखाई देती है, खासकर दूसरे हिस्से में।
सैफ अली खान ने निभाया दमदार किरदार
सैफ अली खान फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में हैं। श्याम का किरदार भावनात्मक रूप से काफी जिम्मेदार है और सैफ ने उसे जरूरत से ज्यादा ड्रामेटिक बनाने के बजाय संयम के साथ निभाया है। दृष्टिहीन व्यक्ति के तौर पर उनकी बॉडी लैंग्वेज, आवाज पर निर्भरता और आसपास की चीजों को महसूस करने का तरीका काफी स्वाभाविक लगता है। वह श्याम को सिर्फ मजबूर इंसान नहीं बनाते, बल्कि उसके भीतर आत्मविश्वास और समझदारी भी दिखाते हैं। हालांकि फिल्म के कुछ एक्शन और फिजिकल हिस्सों में किरदार की शारीरिक क्षमता को लेकर थोड़ी असहजता महसूस होती है। इसके बावजूद सैफ का अभिनय कहानी को भावनात्मक आधार देता है और वह दर्शकों को श्याम के साथ जोड़ने में सफल रहते हैं।
अक्षय कुमार ने किया अलग अंदाज में काम
अक्षय कुमार के लिए परशुराम एक अलग तरह का किरदार है। वह इस भूमिका में अपने सामान्य हीरो वाले अंदाज से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। किरदार के भीतर गुस्सा, हिंसा और मानसिक अस्थिरता है, जिसे अक्षय कई दृश्यों में प्रभावी तरीके से सामने लाते हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत है और कुछ दृश्यों में वह वास्तव में खतरनाक नजर आते हैं। हालांकि, फिल्म के कुछ हिस्सों में उनका प्रदर्शन जरूरत से ज्यादा ओवर-द-टॉप हो जाता है। ऐसे मौकों पर किरदार से डर लगने के बजाय उसका असर थोड़ा कम हो जाता है। फिर भी अक्षय को इस तरह के निगेटिव शेड में देखना दिलचस्प है और वह फिल्म में जरूरी टकराव पैदा करते हैं।
सपोर्टिंग कास्ट ने बढ़ाई फिल्म की ताकत
फिल्म की सहायक कास्ट भी अच्छी है। शरिब हाशमी पुलिस अधिकारी के किरदार में लगातार मनोरंजन करते हैं। उनका किरदार भले ही कई बार परेशान करने वाला लगे, लेकिन अभिनेता उसे यादगार बना देते हैं। बोमन ईरानी अपने अनुभव के साथ किरदार में विश्वसनीयता लाते हैं। श्रीया पिलगांवकर और सैयामी खेर को ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिला है, लेकिन दोनों अपने हिस्से को ठीक तरह से निभाती हैं। सैयामी खेर की डायलॉग डिलीवरी कहीं-कहीं बहुत पोयेटिक लगती है। राजपाल यादव, राजेश शर्मा और बाकी कलाकार भी कहानी में अपना योगदान देते हैं। वहीं असरानी की मौजूदगी फिल्म के कुछ हिस्सों में खास गर्माहट और हास्य लेकर आती है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस पुराने दौर की याद दिलाती है। मूल 'ओपम' के अभिनेता मोहनलाल का कैमियो भी फैंस के लिए एक खास पल है।
तकनीकी पक्ष है फिल्म की बड़ी ताकत
तकनीकी रूप से 'हैवान' अच्छी तरह तैयार की गई है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की खास खूबियों में शामिल है। विजुअल्स में एक डार्क और सस्पेंस भरा माहौल बनाने की कोशिश की गई है, जो थ्रिलर की जरूरत के मुताबिक काम करता है। साउंड डिजाइन भी कहानी के लिए महत्वपूर्ण है। चूंकि श्याम अपने आसपास की दुनिया को आवाज और दूसरी इंद्रियों के जरिए समझता है, इसलिए ध्वनि का इस्तेमाल कहानी में मायने रखता है। बैकग्राउंड स्कोर कई तनावपूर्ण दृश्यों को और प्रभावी बनाता है। संगीत हालांकि बहुत ज्यादा यादगार नहीं है और कुछ गाने कहानी की गति को जरूर प्रभावित करते हैं। सबसे बड़ी तकनीकी कमी एडिटिंग में दिखाई देती है। फिल्म की लंबाई कम की जा सकती थी और कई दृश्यों को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता था।
क्या नहीं कर पाया फिल्म?
सबसे पहले बात लंबाई की। करीब 164 मिनट यानी 2 घंटे 44 मिनट की अवधि इस तरह की कहानी के लिए ज्यादा महसूस होती है। फिल्म में अच्छे थ्रिलर मोमेंट्स हैं, लेकिन उन तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा समय लगता है। दूसरी समस्या यह है कि कई घटनाओं का अनुमान पहले ही लगाया जा सकता है। मूल 'ओपम' देख चुके दर्शकों के लिए तो सरप्राइज और भी कम रह जाते हैं। हालांकि, जिन लोगों ने मूल फिल्म नहीं देखी है, उनके लिए कहानी में कुछ अच्छे सस्पेंस मोमेंट्स जरूर हैं। कॉमेडी और थ्रिलर के बीच संतुलन भी पूरी तरह सही नहीं है। कुछ हल्के-फुल्के दृश्य माहौल को सहज बनाते हैं, लेकिन कुछ जगह वे कहानी के तनाव को तोड़ देते हैं। इसके अलावा परशुराम का किरदार जितना खतरनाक होना चाहिए था, वह हर सीन में उतना डर पैदा नहीं कर पाता। अगर उसके किरदार में ज्यादा ठंडा और लगातार बना रहने वाला खौफ होता, तो क्लाइमैक्स का असर भी ज्यादा मजबूत होता।
फाइनल वर्डिक्ट
'हैवान' ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर लगे कि सब कुछ गलत हो गया। इसके उलट, फिल्म में कई अच्छी चीजें हैं। सैफ अली खान का अभिनय, अक्षय कुमार का अलग अंदाज, प्रियदर्शन की कहानी पर पकड़, शानदार सिनेमैटोग्राफी और दूसरे हाफ के कुछ प्रभावी थ्रिलर सीक्वेंस फिल्म को एक ठीक-ठाक सिनेमाई अनुभव बनाते हैं। कमियां भी स्पष्ट हैं। कहानी की शुरुआत धीमी है, रनटाइम जरूरत से ज्यादा है, एडिटिंग ज्यादा चुस्त हो सकती थी और विलेन का खौफ हर जगह उम्मीद के मुताबिक नहीं बन पाता। गाने भी कई जगह रफ्तार रोकते हैं, लेकिन इन कमियों के बावजूद 'हैवान' में इतना कंटेंट है कि थ्रिलर पसंद करने वाले दर्शक इसे एक बार देख सकते हैं। खासकर अगर आपने 'ओपम' नहीं देखी है तो फिल्म अपने सस्पेंस और कलाकारों के दम पर आपको बांधे रखने की क्षमता रखती है। कुल मिलाकर 'हैवान' एक ऐसी क्राइम थ्रिलर है जिसमें कहानी और कलाकार दोनों मजबूत हैं, लेकिन बेहतर एडिटिंग और थोड़ी ज्यादा कसावट इसे एक शानदार फिल्म बना सकती थी। फिलहाल यह एक अच्छी वन-टाइम वॉच बनकर रह जाती है।