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Haunted 3D Review: पुरानी हवेली और अतीत का साया, विक्रम भट्ट की फिल्म डराने में कितनी कामयाब? जानें

'हॉन्टेड 3D: इकोज ऑफ द पास्ट' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। विक्रम भट्ट अपने पुराने अंदाज में वापसी किए हैं। उनकी फिल्म कैसी है जानें।

Photo: IMDB चेतना और मिमोह।
मूवी रिव्यू:: हॉन्टेड 3D: इकोज ऑफ द पास्ट
Critics Rating: 3 / 5
पर्दे पर: 12/06/2026
कलाकार:
डायरेक्टर: विक्रम भट्ट
शैली: हॉरर ड्रामा
संगीत: ...............

डायरेक्टर विक्रम भट्ट एक बार फिर सिनेमाघरों में डर का माहौल पैदा करने के लिए लौटे हैं। हॉरर जॉनर में महारथ हासिल करने वाले विक्रम भट्ट अपनी नई फिल्म 'हॉन्टेड 3D: इकोज ऑफ द पास्ट' के साथ दर्शकों के सामने हैं। जब भी विक्रम भट्ट की किसी हॉरर फिल्म का जिक्र होता है तो दर्शकों के जेहन में 'राज' या '1920' जैसी फिल्मों का संगीत और खौफनाक मंजर नजरों के सामने आ जाता है। इस नई फिल्म से भी दर्शकों को कुछ ऐसी ही उम्मीदें थीं। यह फिल्म सिर्फ भूतों की डरावनी चीखों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर प्यार, जुदाई और अतीत के कुछ अनसुलझे दर्द की एक लंबी दास्तान भी छिपी है। आइए जानते हैं कि इस बार विक्रम भट्ट दर्शकों को डराने और उनके दिलों को छूने में कितने कामयाब रहे हैं।

कहानी की शुरुआत और उसका ताना-बाना 

फिल्म की कहानी एक ऐसे मोड़ से शुरू होती है जहाँ सस्पेंस और सन्नाटा दोनों एक साथ महसूस होते हैं। कहानी के केंद्र में है देव जिसका किरदार महाक्षय यानी मिमोह चक्रवर्ती ने निभाया है। देव अपनी जिंदगी में कुछ ऐसे हादसों से गुजर चुका है, जिनके जख्म आज भी उसके दिमाग पर गहरे छपे हैं। अपने इसी दर्दनाक अतीत और मानसिक तनाव से पीछा छुड़ाने के लिए वह शहर की भागदौड़ से दूर एक बेहद शांत और पुरानी हवेली में रहने का फैसला करता है। उसे लगता है कि इस नए और शांत माहौल में उसकी जिंदगी पटरी पर लौट आएगी, लेकिन उसका यह फैसला ही उसके लिए एक नया इम्तिहान बन जाता है।

जैसे ही देव उस विशाल और सुनसान हवेली में कदम रखता है, उसे कुछ अजीबोगरीब और रहस्यमयी चीजों का अहसास होने लगता है। कभी दीवारों से आती आवाजें, तो कभी हवेली के सुनसान गलियारों में किसी की परछाई का दिखना, देव को बेचैन करने लगता है। शुरुआत में वह इसे अपना वहम समझकर नजरअंदाज करने की कोशिश करता है, लेकिन धीरे-धीरे ये घटनाएं इतनी बढ़ जाती हैं कि वह चाहकर भी इनसे मुंह नहीं मोड़ पाता। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हवेली के बंद कमरों के साथ-साथ अतीत के कई राज भी खुलने लगते हैं। यह रहस्य देव को उसकी खोई हुई प्रेमिका सुनहरी (चेतना पांडे) की यादों और उन परछाइयों के करीब ले जाता है, जिनसे वह भाग रहा था। क्या देव इस हवेली के खौफनाक सच का सामना कर पाएगा? या फिर वह खुद इसका हिस्सा बन जाएगा? यही फिल्म की मुख्य कहानी है।

निर्देशन और माहौल का जादू

विक्रम भट्ट को अच्छी तरह पता है कि हॉरर फिल्मों में सिर्फ भूत दिखा देना काफी नहीं होता, बल्कि उसके लिए एक ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है जिसे देखकर दर्शक थिएटर की कुर्सी से चिपक जाएं। इस फिल्म के निर्देशन में भी विक्रम भट्ट का वो पुराना तजुर्बा साफ नजर आता है। उन्होंने फिल्म के बैकग्राउंड, लोकेशंस और दृश्यों का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका डरावना और सस्पेंस से भरा वातावरण है। सुनसान पड़ी बड़ी सी हवेली, उसके डरावने गलियारे, पास में बनी एक रहस्यमयी झील और हर कोने में फैला सन्नाटा, दर्शकों के मन में एक अनजाना डर पैदा करने में कामयाब रहता है। विक्रम भट्ट ने हॉरर का इस्तेमाल सिर्फ लोगों को अचानक डराने या चौंकाने के लिए नहीं किया है, बल्कि उन्होंने डर को कहानी की रफ्तार के साथ आगे बढ़ाया है। कैमरे का मूवमेंट और लाइटिंग ऐसी है जो बिना किसी भूत के भी स्क्रीन पर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर देती है। इस मामले में डायरेक्टर की तारीफ होनी चाहिए।

एक्टिंग

अभिनय की बात करें तो महाक्षय चक्रवर्ती ने काफी लंबे समय बाद पर्दे पर वापसी की है और उन्होंने इस मौके का अच्छा इस्तेमाल किया है। देव के किरदार में उन्होंने पूरी ईमानदारी से काम किया है। एक ऐसा इंसान जो अंदर से टूटा हुआ है, जो अपने अतीत के बोझ से दबा हुआ है और जिसके मन में हर वक्त एक डर बना रहता है, इस जटिल मानसिक स्थिति को महाक्षय ने अपने चेहरे के भावों और बॉडी लैंग्वेज से बखूबी पेश किया है। कई दृश्यों में उनकी बेबसी और डर दर्शकों को सचमुच महसूस होता है।

दूसरी तरफ, चेतना पांडे ने सुनहरी के रूप में अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से प्रभावित किया है। भले ही उनके हिस्से के दृश्य महाक्षय से थोड़े कम हों, लेकिन जब भी वे स्क्रीन पर आती हैं, अपनी छाप छोड़ जाती हैं। महाक्षय और चेतना के बीच की केमिस्ट्री फिल्म के भावनात्मक (इमोशनल) पहलू को मजबूत बनाती है। उनका रोमांस और जुदाई का दर्द कहानी में एक ठहराव लाता है, जो सिर्फ डर के माहौल के बीच दर्शकों को राहत देता है। फिल्म के बाकी सहायक कलाकारों ने भी अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है और कहानी के सस्पेंस को अंत तक बनाए रखने में मदद की है।

कहां रह गई कमी?

इतनी खूबियों के बावजूद फिल्म में कुछ ऐसी कमियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। सबसे पहली और बड़ी कमी है फिल्म की रफ्तार। कुछ जगहों पर खासकर फिल्म के सेकेंड हाफ में कहानी बहुत धीमी हो जाती है। ऐसा लगता है कि कुछ दृश्यों को बेवजह लंबा खींचा गया है, जिससे जो डर और रोमांच पहले हिस्से में बना था, वह थोड़ा कम होने लगता है। एडिटिंग अगर थोड़ा और चुस्त होती तो फिल्म का असर और ज्यादा गहरा होता। दूसरी कमी इसकी कहानी का पुराना ढर्रा है। जो दर्शक नियमित रूप से हॉरर फिल्में देखते हैं, उन्हें कहानी के कई मोड़ और सस्पेंस पहले से ही अनुमानित लग सकते हैं। पुरानी हवेली, बीता हुआ कल, एक अधूरी प्रेम कहानी और आत्माओं का बदला, ये कुछ ऐसे फॉर्मूले हैं जो बॉलीवुड में सालों से इस्तेमाल हो रहे हैं। विक्रम भट्ट ने इस बार भी इसी सुरक्षित रास्ते को चुना है, जिसमें कुछ नयापन या चौंकाने वाले ट्विस्ट की कमी खलती है। संवाद भी कुछ जगहों पर बेहद साधारण हैं, जो किरदारों के जज्बातों को पूरी गहराई से दर्शकों तक नहीं पहुंचा पाते।

वर्डिक्ट

कुल मिलाकर 'हॉन्टेड 3D: इकोज ऑफ द पास्ट' एक ऐसी फिल्म है जो केवल डराने का दावा नहीं करती, बल्कि दर्शकों को एक भावुक कहानी से जोड़ने का प्रयास भी करती है। शानदार सिनेमैटोग्राफी, दमदार साउंड डिजाइन और हवेली का वो खौफनाक माहौल इस फिल्म को तकनीकी रूप से एक बेहतरीन हॉरर फिल्म बनाते हैं। महाक्षय चक्रवर्ती और चेतना पांडे का अभिनय भी सराहनीय है जो कहानी को बिखरने नहीं देता। हां यदि आप कुछ बिल्कुल नया, अनोखा या रोंगटे खड़े कर देने वाला बहुत ज्यादा खौफनाक सिनेमा देखने की उम्मीद कर रहे हैं तो शायद यह फिल्म आपको थोड़ी कमतर लग सकती है। लेकिन अगर आप विक्रम भट्ट के पुराने हॉरर स्टाइल के प्रशंसक हैं और आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं जिसमें डर के साथ-साथ एक इमोशनल लव स्टोरी और सस्पेंस का तड़का भी हो तो वीकेंड पर इस फिल्म को एक बार सिनेमाघरों में जाकर देखा जा सकता है