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Hunkkaar: The Roar Review: धर्मगुरु के साम्राज्य से टकराती एक लड़की की कहानी, अनीत पड्डा ने जीता दिल
‘हुंकार: द रोअर’ ताकतवर धर्मगुरु के खिलाफ न्याय की लड़ाई को दिखाती थ्रिलर है। अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख और रघुबीर यादव का दमदार अभिनय कहानी को गति देता है, हालांकि कुछ हिस्से जल्दबाजी भरे लगते हैं।
‘हुंकार: द रोअर’ का पहला लुक सामने आते ही इस सीरीज ने लोगों का ध्यान खींच लिया था। इसकी एक बड़ी वजह इसकी कास्ट है। ‘सैयारा’ से अपनी पहचान बनाने वाली अनीत पड्डा और अपनी शानदार अदाकारी के लिए जानी जाने वाली फातिमा सना शेख एक साथ नजर आती हैं। इसके अलावा करण कपाड़िया और नित्या मेहरा जैसे क्रिएटर्स का नाम भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ा है। विषय को देखें तो सीरीज में शुरुआत से ही काफी संभावनाएं नजर आती हैं। लेकिन सवाल यही था कि धर्मगुरु, धोखाधड़ी, यौन शोषण और ताकतवर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई जैसी कहानियां पहले भी पर्दे पर दिखाई जा चुकी हैं, तो ‘हुंकार’ इसमें नया क्या लेकर आती है? सीरीज इस सवाल का पूरी तरह नया जवाब तो नहीं देती, लेकिन अपनी गति, कलाकारों और रिसर्च के दम पर दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहती है। कुछ हिस्सों में कहानी को ज्यादा विस्तार की जरूरत महसूस होती है, लेकिन कुल मिलाकर यह एक ऐसी थ्रिलर है जो आपको अगला एपिसोड देखने के लिए उत्सुक रखती है।
क्या है ‘हुंकार: द रोअर’ की कहानी?
कहानी की केंद्र में है मीनू रावत, जिसका किरदार अनीत पड्डा ने निभाया है। मीनू एक नाबालिग लड़की है, जो बेहद प्रभावशाली धर्मगुरु सुनील ‘बापजी’ चकोसी पर यौन शोषण का आरोप लगाती है। बापजी के हजारों अनुयायी हैं और उसके प्रभाव का दायरा सिर्फ धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। मीनू के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसके खिलाफ माहौल तैयार होने के बावजूद वह पीछे हटने को तैयार नहीं है। उसके आसपास मौजूद हर व्यक्ति इस मामले को लेकर अपनी राय रखता है, लेकिन मीनू को सिर्फ न्याय चाहिए। मामले की जांच एसीपी जसलीन सिंह सोइन को सौंपी जाती है। फातिमा सना शेख का किरदार निभा रहीं जसलीन के लिए भी यह पहला बड़ा केस है। वह मामले की तह तक जाने की कोशिश करती हैं, लेकिन बापजी के खिलाफ कार्रवाई करना आसान नहीं है। उसके अनुयायी उसे भगवान का दर्जा देते हैं और जैसे ही उसकी गिरफ्तारी की खबर फैलती है, माहौल तनावपूर्ण हो जाता है।
बापजी ने वर्षों में एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया है, जिसकी कथित कीमत करीब 10 हजार करोड़ रुपये बताई जाती है। उसके प्रभावशाली नेटवर्क में ऐसे लोग भी हैं, जो उसकी ताकत और प्रतिष्ठा बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इसी बीच पत्रकार अमिताभ सिन्हा की एंट्री होती है। अर्जुन माथुर द्वारा निभाया गया यह किरदार अपनी रिपोर्टिंग के जरिए मामले को लोगों के सामने लाने की कोशिश करता है। वह बापजी के साम्राज्य से जुड़े कई पहलुओं को सामने लाता है। मीनू की तरफ से केस लड़ने के लिए भालेराव सामने आते हैं। मोहम्मद जीशान अय्यूब का यह किरदार मीनू के पक्ष में मजबूती से खड़ा दिखाई देता है। इसके बाद कहानी एक ऐसी लड़की और ताकतवर व्यवस्था के बीच संघर्ष में बदल जाती है, जहां एक तरफ न्याय की मांग है और दूसरी ओर प्रभाव, पैसा और समर्थकों का विशाल नेटवर्क।
कलाकारों ने संभाली कहानी
‘हुंकार: द रोअर’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट है। अनीत पड्डा ने मीनू के किरदार में शानदार काम किया है। वह किरदार की कमजोरी और मजबूती दोनों को बेहद सहज तरीके से सामने लाती हैं। मीनू जिस डर, दबाव और मानसिक संघर्ष से गुजरती है, उसमें अनीत का अभिनय बनावटी नहीं लगता। ‘सैयारा’ के बाद यह सीरीज अनीत पड्डा को खुद को साबित करने का एक और मजबूत मौका देती है। खास बात यह है कि वह मीनू को सिर्फ पीड़ित के रूप में पेश नहीं करतीं। उनके किरदार में अपने फैसले पर कायम रहने की एक शांत ताकत दिखाई देती है। मीनू के पिता के किरदार में राजेश शर्मा भी प्रभावित करते हैं। बेटी के साथ हुई घटना के बाद एक पिता किस तरह के भावनात्मक संघर्ष से गुजरता है, अभिनेता उसे काफी प्रभावी ढंग से दिखाते हैं। खासतौर पर पार्क में भालेराव से उनकी पहली मुलाकात वाला दृश्य भावुक कर देता है।
मीनू की मां के किरदार में चारु शंकर भी अच्छा काम करती हैं। वह अपनी बेटी के साथ मजबूती से खड़ी रहती हैं और चाहती हैं कि इस घटना के बावजूद मीनू सामान्य जिंदगी की ओर लौट सके। फातिमा सना शेख ने एसीपी जसलीन के किरदार में संयमित अभिनय किया है। वह किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय नहीं बनातीं। जांच के दौरान जसलीन धीरे-धीरे मामले की गंभीरता को समझती हैं और मीनू का साथ देती हैं। रघुबीर यादव के लिए यह किरदार खास है। आमतौर पर उन्हें हल्के-फुल्के और हास्य भूमिकाओं में ज्यादा देखा गया है, लेकिन बापजी के रूप में वह एक अलग अंदाज में नजर आते हैं। उनके हाव-भाव और मौजूदगी किरदार को असहज और डरावना बनाती है। उन्हें हर समय गुस्सा करने या ऊंची आवाज में बोलने की जरूरत नहीं पड़ती, उनका व्यक्तित्व ही बापजी की ताकत दिखाने के लिए काफी है।
मोहम्मद जीशान अय्यूब ने भालेराव के रूप में अपनी छाप छोड़ी है। वह सिर्फ एक वकील की भूमिका नहीं निभाते, बल्कि अपने किरदार में केस के प्रति विश्वास और जुनून भी लेकर आते हैं। खासकर कानूनी बहस वाले दृश्यों में उनका आत्मविश्वास नजर आता है। अर्जुन माथुर भी पत्रकार अमिताभ सिन्हा के रूप में प्रभावी हैं। सच्चाई सामने लाने की कोशिश कर रहे पत्रकार के किरदार में वह स्वाभाविक लगते हैं। राम कपूर का कैमियो भी ध्यान खींचता है। मीनू के साथ उनके संवाद और ‘फेक’ तथा ‘फोर्जरी’ को लेकर हुई बातचीत वाला हिस्सा खास तौर पर प्रभाव छोड़ता है।
मेकर्स ने संवेदनशील मुद्दे को कैसे संभाला?
करण कपाड़िया और नित्या मेहरा ने कहानी को सनसनीखेज बनाने के बजाय जांच और किरदारों पर ज्यादा ध्यान दिया है। मामला नाबालिग लड़की, यौन शोषण, प्रभावशाली धर्मगुरु और ताकतवर सिस्टम से जुड़ा है, इसलिए विषय अपने आप में संवेदनशील है। सीरीज की रिसर्च भी दिखाई देती है। बापजी के अनुयायियों से लेकर उसके प्रभाव और उसके आसपास काम करने वाली पूरी व्यवस्था तक, मेकर्स ने इस दुनिया को स्थापित करने में पर्याप्त मेहनत की है। यही वजह है कि कहानी सिर्फ मुख्य किरदारों तक सीमित नहीं रहती।
क्या काम करता है?
सीरीज की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ्तार है। कहानी बेवजह किसी एक जगह अटकती नहीं है और हर एपिसोड में कोई न कोई नया घटनाक्रम सामने आता रहता है। यही वजह है कि दर्शक अगले एपिसोड की तरफ बढ़ता रहता है। यह एक थ्रिलर है, लेकिन हर दृश्य में जबरदस्ती रोमांच पैदा करने की कोशिश नहीं की गई है। कहानी को अपनी गति से आगे बढ़ने दिया गया है। कलाकारों का मजबूत अभिनय भी इसका असर बढ़ाता है। सीरीज की रिसर्च एक और मजबूत पक्ष है। बापजी के प्रभाव, उसके समर्थकों और उसके साम्राज्य को जिस तरह दिखाया गया है, उससे कहानी की दुनिया विश्वसनीय लगती है। साथ ही, मेकर्स एक ही बात को बार-बार दोहराने से भी बचते हैं।
कहां रह जाती है कमी?
‘हुंकार’ पूरी तरह बेदाग सीरीज नहीं है। कुछ घटनाक्रम ऐसे हैं, जिन्हें ज्यादा विस्तार से समझाया जाता तो कहानी और मजबूत हो सकती थी। बापजी की पहली गिरफ्तारी वाला हिस्सा कुछ ज्यादा जल्दी आगे बढ़ता हुआ महसूस होता है। दर्शक को यह समझने का पर्याप्त समय नहीं मिलता कि घटनाएं आखिर इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं। इसी तरह एसीपी जसलीन का केस में अचानक गहराई से शामिल होना और कानूनी प्रक्रिया का तेजी से आगे बढ़ना भी कुछ जगहों पर थोड़ा जल्दबाजी भरा लगता है। कुछ घटनाओं को दर्शकों के सामने स्थापित करने के बजाय सीधे आगे बढ़ा दिया जाता है। हालांकि सीरीज की तेज रफ्तार इन कमियों पर ज्यादा देर तक सोचने का मौका भी नहीं देती। एक घटना के तुरंत बाद दूसरी घटना कहानी को आगे धकेल देती है।
अंतिम फैसला
‘हुंकार: द रोअर’ का विषय बिल्कुल नया नहीं है। ताकतवर धर्मगुरु, न्याय के लिए लड़ती पीड़िता, सच्चाई सामने लाने वाला पत्रकार और उसके पक्ष में खड़ा वकील जैसे किरदार पहले भी कई कहानियों में नजर आ चुके हैं। लेकिन सीरीज की असली ताकत इसके ट्रीटमेंट, रफ्तार और कलाकारों के प्रदर्शन में है। अनीत पड्डा मीनू के रूप में सीरीज की जान हैं। फातिमा सना शेख जांच अधिकारी के किरदार में विश्वसनीय लगती हैं। रघुबीर यादव बापजी के रूप में अपने पुराने अंदाज से बिल्कुल अलग नजर आते हैं। मोहम्मद जीशान अय्यूब और अर्जुन माथुर कहानी को और मजबूती देते हैं। कुछ कानूनी और जांच से जुड़े हिस्से थोड़े सुविधाजनक लगते हैं और कुछ घटनाओं को ज्यादा विस्तार की जरूरत थी। इसके बावजूद सीरीज दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने में सफल रहती है। अगर किसी थ्रिलर की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि क्या दर्शक अगला एपिसोड तुरंत देखना चाहता है, तो ‘हुंकार: द रोअर’ इस कसौटी पर काफी हद तक खरी उतरती है।