एक हिम्मत भरी कोशिश है 'मी नो पॉज मी', मेनोपॉज की अनकही सच्चाइयों को आवाज देती है ये फिल्म

मी नो पॉज़ मी प्ले’ एक संवेदनशील फिल्म है जो मेनोपॉज़ की अनकही भावनाओं, रिश्तों में आने वाले बदलावों और महिला की मानसिक यात्रा को सच्चाई से दर्शाती है। काम्या पंजाबी और मनोज कुमार शर्मा के सशक्त अभिनय के साथ, यह फिल्म जागरूकता, सहानुभूति और समर्थन की

Photo: INSTAGRAM फिल्म रिव्यू
मूवी रिव्यू:: 'मी नो पॉज मी'
Critics Rating: 3 / 5
पर्दे पर: 28 Nov 2025
कलाकार:
डायरेक्टर: Samar K. Mukherjee
शैली: Social Awareness
संगीत: Samar K. Mukherjee

भारतीय सिनेमा में महिलाओं की भावनात्मक और मानसिक दुनिया को अक्सर सतही तौर पर दिखाया जाता है, खासकर वह दौर जब ज़िंदगी एक नए मोड़ पर पहुंचती है, औरत का शरीर बदलता है, मन डगमगाता है, और रिश्तों पर अनकही चुनौतियाँ उतर आती हैं। मेनोपॉज़ ऐसा ही एक चरण है, जो लाखों महिलाओं को प्रभावित करता है, मगर हमारे समाज और सिनेमा में आज भी चुप्पी और शर्म के पीछे दबा पड़ा है। इन अनदेखे अनुभवों पर रोशनी डालने का साहसी काम करती है ये मी नो पॉज मी प्ले, जो मेनोपॉज की जटिल परतों को बेहद संवेदनशीलता और ईमानदारी से सामने रखती है।

फिल्म की कहानी के केंद्र में हैं डॉली खन्ना, एक साधारण लेकिन गहराई से जुड़ी हुई महिला, जिसे काम्या पंजाबी ने बेहतरीन भावनाओं के साथ निभाया है। डॉली की ज़िंदगी अचानक उथल-पुथल से घिर जाती है। कभी बेक़ाबू मूड स्विंग्स, कभी भीतर जमा दर्द, कभी रिश्तों में आई दूरी, मेनोपॉज की वजह से उनकी दुनिया जैसे धीरे-धीरे बिखरती नज़र आती है। यह फ़िल्म दिखाती है कि मेनोपॉज सिर्फ शारीरिक बदलाव नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा भी है, जिसे ज़्यादातर महिलाएं अकेले झेलती हैं।

डॉली की इस भावनात्मक आँधी में सबसे मजबूत सहारा बनकर सामने आते हैं उनके पति रजत खन्ना, जिन्हें मनोज कुमार शर्मा ने शांत गंभीरता और असाधारण सहजता के साथ निभाया है। रजत का किरदार दर्शाता है कि जीवनसाथी का सहयोग, धैर्य और समझ किसी भी कठिन दौर को संभाल सकता है। शर्मा, इस फ़िल्म के निर्माता भी हैं, अपने सहज अभिनय से बताते हैं कि सपोर्टिव रिश्ते मेनोपॉज़ जैसी चुनौतियों को बोझ नहीं, बल्कि साझा अनुभव बना सकते हैं। उनका किरदार हमें यह एहसास कराता है कि परिवार और साथी का साथ किसी महिला के जीवन में कितनी बड़ी भूमिका निभाता है।

कहानी तब और गहराती है जब डॉली की ज़िंदगी में आती हैं डॉ. जसमोना-दीपशिखा नागपाल द्वारा निभाया गया बेहद संवेदनशील किरदार। डॉक्टर जसमोना न केवल चिकित्सा सलाह देती हैं, बल्कि डॉली की भावनात्मक साथी भी बन जाती हैं। डॉली, रजत और जसमोना के बीच उभरता यह रिश्ता फिल्म को एक अलग ही गर्माहट और सच्चाई प्रदान करता है। यह त्रिकोण दर्शकों को वह भावनात्मक संसार दिखाता है, जहाँ दर्द, समझ और भरोसा, तीनों साथ मौजूद रहते हैं।

निर्देशक समर के मुखर्जी इस संवेदनशील विषय को जिस संयम और सादगी से पेश करते हैं, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। उन्होंने कहानी को ओवरड्रामैटिक बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसे ज़मीन से जुड़ा रखा। उनकी निर्देशन शैली इंसानी भावनाओं को केंद्रीय जगह देती है, जहाँ छोटे-छोटे पलों में बड़ी बातें कही जाती हैं। मेनोपॉज़ जैसे विषय को बिना शोर, बिना अतिशयोक्ति, सिर्फ़ सच्चाई के साथ दिखाने का साहस कम ही निर्देशक कर पाते हैं।

संगीतकार संतोष पुरी, शिवांग माथुर और अमृतांशु दत्ता का संगीत भी फ़िल्म की भावनाओं को बख़ूबी संभालता है। बैकग्राउंड स्कोर हल्का, प्रभावी और पूरी तरह संतुलित है, जो न तो कहानी से ध्यान हटाता है, न ही भावनाओं को दबाता है। यह संगीत एक ऐसे माहौल का निर्माण करता है, जिससे दर्शक डॉली की दुनिया में सहजता से उतर जाते हैं।

अभिनय की बात करें तो पूरी स्टारकास्ट चमकती है। काम्या पंजाबी डॉली के रूप में दर्द, उलझन, गुस्सा, डर और हिम्मत सभी को बड़े सहज अंदाज में सामने लाती हैं। दीपशिखा नागपाल का शांत और समझदार अंदाज़ प्रभाव छोड़ता है। अमन वर्मा भी अपने हिस्से में पूरी ईमानदारी दिखाते हैं। परंतु मनोज कुमार शर्मा का अभिनय सबसे ज़्यादा दिल जीतता है। रजत के रूप में उनका संयमित लेकिन गहरा प्रदर्शन बताता है कि कभी-कभी सबसे ताक़तवर भावनाएँ चुपचाप दिखाई जाती हैं।

लेकिन इस फ़िल्म की असल अहमियत उसके विषय में है। मी नो पॉज़ मी प्ले सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक बातचीत की शुरुआत है, एक ऐसी बातचीत जिसकी कमी हमारे समाज में बरसों से महसूस की जा रही है। मेनोपॉज़, महिलाओं की सेहत, उम्र, सम्मान, मानसिक मज़बूती, इन सभी मुद्दों को मुख्यधारा में लाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

यह फ़िल्म हमें यह समझने पर मजबूर करती है कि मेनोपॉज़ कोई अंत नहीं, बल्कि जीवन का एक नया अध्याय है, एक ऐसा अध्याय जिसे समझने, स्वीकार करने और सहज बनाने की आवश्यकता है। यह फ़िल्म याद दिलाती है कि हर महिला इस दौर से गुज़रती है, लेकिन हर महिला को समर्थन, सम्मान और संवेदनशीलता मिलना चाहिए।

आखोर में 'मी नो पॉज़ मी प्ले' एक ऐसी फ़िल्म है जिसे सिर्फ़ देखा नहीं, महसूस किया जाता है। जिन दर्शकों को उद्देश्यपूर्ण, वास्तविक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण सिनेमा पसंद है, उनके लिए यह फ़िल्म एक अनिवार्य अनुभव है। यह हमें यह सिखाती है कि जिन कहानियों पर सबसे कम बात होती है, वही अक्सर सबसे ज़्यादा जरूरी होती हैं।