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मिर्जापुर द मूवी रिव्यू: कालीन भैया के वर्चस्व पर भारी रवि किशन का पूर्वांचली स्वैग, लेकिन क्लाइमैक्स ने बिगाड़ दिया भौकाल
मिर्जापुर द मूवी पुराने भौकाल, दमदार अभिनय और बड़े पर्दे वाले एक्शन से मनोरंजन करती है, लेकिन लंबी कहानी, धीमी रफ्तार, कमजोर क्लाइमैक्स थोड़ा असर को कच्चा कर देते हैं, लेकिन ये फिल्म एक बार देखने लायक है, बोर हरगिज नहीं करेगी।
मिर्जापुर का नाम आते ही दिमाग में सबसे पहले बंदूकें, गालियां, खून, बदला, सत्ता और भौकाल घूमने लगता है। तीन सीजन तक ओटीटी पर इस दुनिया ने दर्शकों को अपने किरदारों और उनकी सनकी महत्वाकांक्षाओं से बांधे रखा। अब यही दुनिया बड़े पर्दे पर पहुंची है। जाहिर है, उम्मीदें भी बड़ी हैं और तुलना भी उसी दुनिया से होगी, जिसे दर्शक पहले से बेहद करीब से जानते हैं, लेकिन मिर्जापुर द मूवी को सिर्फ एक बड़े पर्दे पर बनाई गई वेब सीरीज की कड़ी मानकर देखना सही नहीं होगा। फिल्म अपनी कहानी और टाइमलाइन को लेकर एक अलग रास्ता चुनती है और पुराने किरदारों को एक नए सिनेमाई अनुभव में फिर से सामने लाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि फिल्म शुरुआत से ही अपने दर्शकों की नब्ज पहचानती है। उसे पता है कि लोग यहां किस तरह का मनोरंजन देखने आए हैं।
फिल्म में वही देसीपन है, वही किरदारों की खींचतान है और वही सत्ता के लिए लड़ने का जुनून है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब सब कुछ बड़े पर्दे पर ज्यादा बड़े पैमाने पर पेश किया गया है। कई जगह यह तरीका काम करता है और थिएटर में सीटियां भी निकलती हैं, लेकिन कई मौकों पर फिल्म यह भूल जाती है कि सिनेमाघर में तीन घंटे से ज्यादा समय तक दर्शक को बांधे रखना ओटीटी से बिल्कुल अलग चुनौती है।
कहानी और प्लॉट
फिल्म की कहानी के बारे में ज्यादा बताना इसके मजे को खराब कर सकता है, इसलिए इतना समझना काफी है कि मिर्जापुर की सत्ता और उसके आसपास घूमने वाले किरदार एक बार फिर आमने-सामने हैं। फिल्म पुराने रिश्तों, दुश्मनियों और महत्वाकांक्षाओं को एक नए घटनाक्रम के साथ जोड़ती है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिल्म सीधे तौर पर पिछली कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय एक ऐसी टाइमलाइन का इस्तेमाल करती है, जिसमें पुराने और नए घटनाक्रम को एक अलग तरीके से देखा गया है। इसी वजह से दर्शकों को कुछ ऐसे चेहरे भी दोबारा दिखाई देते हैं, जिन्हें वह पहले ही इस दुनिया से विदा कह चुके हैं। यह फैसला पुराने फैंस के लिए नॉस्टेलजिया पैदा करता है और फिल्म को अपनी अलग पहचान देने की कोशिश भी करता है।
मिर्जापुर द मूवी की कहानी मिर्जापुर की गद्दी और उस पर कब्जे की पुरानी लड़ाई को एक नए अंदाज में आगे बढ़ाती है। कहानी के केंद्र में एक बार फिर अखंडा त्रिपाठी यानी कालीन भैया हैं, जिनका वर्चस्व और सत्ता की भूख इस दुनिया को दिशा देती है। मुन्ना भैया अब भी अपने पिता की मंजूरी और गद्दी हासिल करने की कोशिश में लगे हैं, जबकि गुड्डू पंडित और बबलू पंडित की जिंदगी भी सत्ता, परिवार और पुरानी दुश्मनियों के बीच उलझी हुई है। इस बार कहानी में रवि किशन का बब्बन यादव नया खिलाड़ी बनकर आता है, जिसकी नजर मिर्जापुर की ताकत और सत्ता पर है। उसके आने से पहले से उलझे समीकरण और पेचीदा हो जाते हैं। कहानी में पुराने रिश्ते, वफादारी, धोखा, बदला और सत्ता की महत्वाकांक्षा साथ-साथ चलती है। बीना भाभी भी इस सत्ता संघर्ष में अपनी अलग चाल चलती हैं और कहानी को नया मोड़ देती हैं।
गुड्डू और मुन्ना की मौजूदगी कहानी के पुराने जख्मों को फिर से कुरेदती है। दूसरी तरफ बबलू की वापसी इस बार एक अलग अभिनेता के साथ होती है, जिससे किरदार को लेकर दर्शकों की तुलना होना स्वाभाविक है। कहानी में सत्ता की लड़ाई के साथ-साथ रिश्तों, वफादारी, प्यार और धोखे को भी जगह दी गई है। फिल्म का मकसद कोई बेहद जटिल या गहरी राजनीतिक कहानी कहना नहीं है। यह मूल रूप से एक मसाला एंटरटेनर है, जो मिर्जापुर की स्थापित दुनिया के जरिए दर्शकों को एक थिएटर एक्सपीरियंस देना चाहती है। जहां यह चीजें साफ तौर पर समझ आती हैं, वहां फिल्म मजेदार बन जाती है। परेशानी तब शुरू होती है जब यह एक साथ बहुत सारे किरदारों और ट्रैक को जगह देने लगती है। कहानी में कई ऐसे हिस्से हैं जो अलग से अच्छे लगते हैं, लेकिन सभी को एक साथ जोड़ने पर फिल्म थोड़ी बिखरी हुई महसूस होती है। ओटीटी पर किसी कहानी को कई एपिसोड में फैलाने की आजादी होती है, लेकिन फिल्म में हर दृश्य को कहानी की गति में योगदान देना चाहिए। यहां कई बार ऐसा नहीं हो पाता।
अभिनय
पंकज त्रिपाठी, अखंडा के रोल में हमेशा की तरह दमदार हैं, लेकिन स्क्रीन स्पेस कम है। रवि किशन से उनकी सीधी टक्कर देखने को मिलती तो मजा अलग होता। रवि किशन (बब्बन बाबू) का भौकाल सब पर भारी पड़ा है। वो जिस सीन में नजर आए हैं, बस नजरें उन पर ही रही हैं। एक पल के लिए भी उनसे नजरें नहीं हटा पाएंगे। असली पूर्वांचल वाला स्वैग तो उन्होंने ही दिखाया है। चाल-ढाल और बॉडी लैंग्वेज से वो इस बार पंकज त्रिपाठी से लेकर अली फजल और दिव्येंदु शर्मा, तीनों पर अकेले ही भारी पड़े हैं। अली फजल (गुड्डू पंडित) और दिव्येंदु शर्मा (मुन्ना भैया) पुराना वाला नॉस्टेलजिया पर्दे पर लाने में कामयाब रहे। दोनों का वही पुराना वाला स्वैग देखने को मिला। दोनों का जुनूनी अंदाज पहले की तरह ही जिंदा है।
मोहित मलिक (बिर्जु लोहार) कहानी में नया ट्विस्ट लेकर आए हैं। क्लाइमेक्स तक पहुंचने से पहले लगता है कि कहानी इन पर ही केंद्रित है। इनकी एक्टिंग कमाल की है। इनके अंदाज में लॉयलटी, प्यार और खतरनाक मिजाज साफ दिख रहा है, लेकिन कहानी में इनका अंत न होता तो चौथे सीजन में इनसे काफी उम्मीदें की जा सकती थीं। मोहित मलिक की ये दूसरी फिल्म है। इससे पहले वो टीवी के बड़े स्टार रहे हैं। उनके टैलेंट को सालों बाद समझा गया और जो मौका मिला है, उसका उन्होंने पूरी तरह सही और सटीक इस्तेमाल किया है। रसिका दुग्गल फिर से छा गई हैं। कहानी के क्लाइमैक्स को पलटने वाली इस बार भी वही हैं। रसिका दुग्गल बीना भाभी के रोल में पुरानी वाली छाप छोड़ती दिखी हैं। कहानी देख कर यही लगेगा कि असली खलनायक यही हैं।
सोनल चौहान (मुमताज बीबी) के रोल में हैं। किरदार सीमित है, लेकिन एक्ट्रेस का काम परफेक्ट है। रवि किशन संग उनकी जोड़ी खूब जमी है। उनकी सहज खूबसूरती से नजरें हटाना आसान नहीं है। जितेंद्र कुमार (बबलू पंडित) के रोल में हैं। इस किरदार को विक्रांत मैसी पहले इतना बखूबी निभा चुके हैं कि उनकी परछाई इस किरदार से हटा पाना किसी के बस की बात नहीं। यही वजह रही कि जितेंद्र इस रोल में ढलने की कितनी भी कोशिश करते दिखे, लेकिन विक्रांत वाली छाप न छोड़ पाए। वो अच्छे एक्टर हैं, लेकिन ये किरदार उनके लिए नहीं बना। इस पर विक्रांत मैसी का नाम छप चुका है।
शीबा चड्ढा (गुड्डु और बबलू की मम्मी) के रोल में कमाल की हैं। राजेश तैलंग (गुड्डू के पिता) का क्या ही कहना, वो अपने दमदार अभिनय से कम स्क्रीन टाइम में भी मोहित करना जानते हैं। सुशांत सिंह (भैरव सिंह कर्णावत) के साथ इस कहानी ने अन्याय किया है। इतने टैलेंटेड एक्टर को वो मुकाम नहीं मिला, जिसके वो हकदार हैं। बार-बार यही लगेगा कि वो अंडरयूटिलाइज्ड रह गए, जबकि वो फिल्मी दुनिया के ओजी गैंगस्टर माने जाते हैं। राम गोपाल वर्मा की लगभग हर फिल्म में उनका कमाल देखने को मिला। कुलभूषण खरबंदा (बाबू जी) परफेक्ट हैं। अभिषेक बनर्जी भी कंपाउंडर के रोल में ठीक हैं, लेकिन वो कहानी में न भी होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका रोल थोड़ा और कम होता तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। सतेंद्र सोनी भी छोटे रोल में जमे हैं। शाजी चौधरी (मकबूल) के रोल में इस बार भी जमे हैं। प्रमोद पाठक ने जेपी यादव के रोल में जस्टिस किया है। श्रिया पिलगांवकर, हरषिता और श्वेता त्रिपाठी का होना न होना बराबर है।
एक्शन और विजुअल ट्रीटमेंट
बड़े पर्दे पर आने का सबसे बड़ा फायदा फिल्म के एक्शन को मिलता है। मिर्जापुर की दुनिया में हिंसा कोई नई चीज नहीं है, लेकिन थिएटर स्क्रीन के लिए इसे बड़े स्केल पर डिजाइन किया गया है। गैंगवार, पीछा करने वाले सीक्वेंस और हाथापाई वाले हिस्सों में फिल्म का उद्देश्य साफ है, दर्शकों को तमाशा देना। कुछ एक्शन सीक्वेंस वास्तव में सीट से बांधकर रखते हैं। खासकर जब पुराने किरदार एक-दूसरे के सामने आते हैं, तब फिल्म अपने सबसे मनोरंजक रूप में नजर आती है। बैकग्राउंड स्कोर भी इन पलों को वजन देता है और मिर्जापुर की पहचान को बनाए रखता है। राजस्थान के हिस्से विजुअली फिल्म को एक अलग रंग देते हैं। लोकेशन और सिनेमैटोग्राफी में वह सिनेमाई विस्तार दिखाई देता है, जिसकी उम्मीद बड़े पर्दे पर की जाती है। संगीत और रैप ट्रैक भी फिल्म के देसी टोन को सपोर्ट करते हैं। हालांकि हर एक्शन सीन उतना प्रभावशाली नहीं है, खास तौर पर रवि किशन और अली फजल के बीच फिल्माया गया सीन। कुछ जगह एक्शन कहानी से स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय सिर्फ दर्शकों को रोमांच देने के लिए जोड़ा हुआ महसूस होता है। बड़े सेटअप के बावजूद हर सीक्वेंस में बराबर इमोशनल वजन नहीं आता।
निर्देशन
गुरमीत सिंह जानते हैं कि मिर्जापुर के दर्शकों को क्या चाहिए। उन्होंने फिल्म के ट्रीटमेंट में उस पुराने मिर्जापुर वाले स्वाद को बनाए रखने की कोशिश की है। संवाद, किरदारों का अंदाज, हिंसा और रिश्तों की कड़वाहट, इन सबमें मूल सीरीज की पहचान दिखाई देती है। फिल्म का निर्देशन तब सबसे मजबूत लगता है जब यह अपने किरदारों को आपस में भिड़ाता है। पुराने चेहरों को साथ देखने का उत्साह और उनके बीच की केमिस्ट्री कई दृश्यों को अतिरिक्त ऊर्जा देती है, लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी समस्या फिल्म की लंबाई और गति है। फिल्म को देखकर कई बार लगता है कि एडिटिंग टेबल पर इसे और कसने की जरूरत थी। कुछ दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ दुनिया को और फैलाते हैं। यही वजह है कि दूसरे हिस्से में फिल्म की रफ्तार कई बार धीमी पड़ जाती है।
मिर्जापुर द मूवी में क्या हैं कमियां?
फिल्म थोड़ी लंबी है। प्रेम प्रसंग स्थापित करने वाले गानों को पूरी तरह हटाया जा सकता था। इसके अलावा बार-बार अखंडा त्रिपाठी द्वारा मुन्ना भैया की होने वाली बेइज्जती को भी हटाया जा सकता था, क्योंकि वेब सीरीज के पहले दो सीजन में इसे भर-भर कर दिखाया गया है। ये सब हटाकर फिल्म को तीन घंटे के भीतर ही समेटा जा सकता था। आखिरी के फाइट सीक्वेंस में गुड्डू पंडित का एक सीन है, जो थोड़ा खटकेगा। खतरनाक गैंगवार में वो पूरी तरह से मरते दिखा दिए जाते हैं। बबलू पंडित आंसू भी बहा लेता है, लेकिन कुछ देर बाद गुड्डू पंडित दोबारा जिंदा हो जाते हैं। इतना ही नहीं, पहले से भी ज्यादा ताकतवर दिखा दिए जाते हैं। उन्हें देख कर लगता है मानों हल्क आ गया हो। ये सब होता है एक ऊंट वाले इंजेक्शन की बदौलत।
क्लाइमैक्स थोड़ा निराश करता है। पहले तो बब्बन बाबू (रवि किशन) को हद से ज्यादा पावरफुल और दबंग दिखाया गया, लेकिन उनका अंत हवा की तरह हो रहा है। सबको अकेले पछाड़ने वाले बब्बन बाबू की मौत एक झटके में हो जाती है। ठीक इसी तरह बिर्जु लोहार का कैरेक्टर बहुत उम्मीदें बांधता है और लगता है कि इसकी कहानी वेब सीरीज के चौथे सीजन से जोड़ी जा सकती है, लेकिन इसका अंत भी बुरा होता है। इस किरदार की मौत बहुत खलने वाली है। इसके अलावा एक चीज बहुत प्रिडिक्टेबल है कि कुछ भी हो अखंडा त्रिपाठी का बचना तो तय ही है, साम दाम दंड भेद के बाद भी वो नहीं मरने वाले।
जितेंद्र कुमार इस बार बबलू पंडित के रोल में हैं, लेकिन उन्हें देखने के बाद दिल बस एक ही बात कहता है कि काश विक्रांत मैसी ये फिल्म कर लेते। विक्रांत की कमी बहुत खलती है। खास तौर पर वहां, जब गुड्डू की टेंपरेरी वाली मौत पर बबलू के इमोशन किसी काम के नहीं लगते, तब बस यही फीलिंग आती है कि पुराने वाले बबलू भैया होते तो रुला देते। तीसरे सीजन में जैसे पंकज त्रिपाठी के किरदार ने निराश किया था, इस बार भी वैसा ही है। उन्हें सीमित स्क्रीन टाइम मिला है, जबकि वो अखंडा त्रिपाठी के रोल में बेहतरीन हैं। ठीक ऐसा ही हाल सुशांत सिंह के किरदार के साथ भी हुआ है। इसके अलावा मिर्जापुर सीरीज वाली गालियां, बोल्ड सीन और खूनी खेल की उम्मीद कर रहे हैं तो वो इसमें सीमित हैं और शायद सेंसर बोर्ड की सख्ती ही इसकी वजह रही होगी।
कहानी में क्या बहुत अच्छा है?
कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसकी मिर्जापुर वाली दुनिया और उसके किरदारों का असर है। फिल्म उन रिश्तों और सत्ता के खेल को बड़े पर्दे पर लेकर आती है, जिसने इस फ्रेंचाइजी को पहचान दी है। कालीन भैया की वापसी कहानी को सबसे ज्यादा मजबूती देती है। उनका शांत लेकिन खतरनाक अंदाज आज भी दर्शकों पर असर छोड़ता है, भले ही उनका किरदार सीमित क्यों न हो। गुड्डू, मुन्ना और बबलू के बीच की पुरानी केमिस्ट्री और तनाव भी कहानी को बांधे रखते हैं। इसके साथ रवि किशन का बब्बन यादव के रूप में आना कहानी में नया रंग भरता है। उनका किरदार पुराने खिलाड़ियों के बीच एक नई चुनौती खड़ी करता है। कहानी में सत्ता, परिवार, वफादारी और धोखे के बीच बदलते समीकरण दिलचस्प हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म सिर्फ एक्शन पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि किरदारों के रिश्तों और उनकी महत्वाकांक्षाओं को भी जगह देती है। यही पुराने और नए का संतुलन इसे मनोरंजक बनाता है।
क्या फिल्म देखने लायक है?
हां, लेकिन उम्मीदों के साथ थोड़ा संतुलन रखना होगा। अगर आप मिर्जापुर के फैन हैं और अपने पसंदीदा किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो फिल्म आपको कई ऐसे पल देगी जिनके लिए थिएटर जाना बनता है। डायलॉग्स पर रिएक्शन मिलेगा, एक्शन पर सीटियां बजेंगी और पुराने किरदारों की वापसी नॉस्टेलजिया पैदा करेगी, लेकिन अगर आप एक ऐसी फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं जो मिर्जापुर की दुनिया को बिल्कुल नई ऊंचाई पर ले जाए, तो निराशा हो सकती है। फिल्म में आइडिया और किरदारों की कमी नहीं है, बल्कि समस्या इसके उलट है। इसमें इतना कुछ है कि कहानी को सांस लेने की जगह कम मिलती है।
मिर्जापुर द मूवी में भौकाल है, पुराने किरदारों का आकर्षण है, दमदार अभिनय है और थिएटर में मनोरंजन देने वाले कई पल भी हैं। रवि किशन फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनकर सामने आते हैं, जबकि पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु शर्मा और रसिका दुग्गल अपने-अपने किरदारों की पहचान को बनाए रखते हैं। समस्या यह है कि फिल्म अपनी लंबाई, जरूरत से ज्यादा कहानी और कुछ कमजोर रचनात्मक फैसलों के कारण उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती, जहां यह एक यादगार सिनेमाई अनुभव बन सके। इसे थोड़ा छोटा किया जाता, कुछ गैरजरूरी हिस्से हटाए जाते और क्लाइमैक्स को ज्यादा प्रभावी बनाया जाता तो असर कहीं बेहतर हो सकता था। फिर भी मिर्जापुर की दुनिया को बड़े पर्दे पर देखने का अपना अलग मजा है। यह परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन पूरी तरह निराश भी नहीं करती।