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घिसे-पिटे चुटकुलों में उलझी 'पति पत्नी और वो 2, कमजोर कहानी को संभालने में फीकी पड़ गई एक्टर्स की कॉमेडी
यह फिल्म प्रयागराज के एक फॉरेस्ट ऑफिसर की कहानी है, जो पुरानी दोस्त की मदद के चक्कर में झूठ और गलतफहमियों के जाल में फंस जाता है। कमजोर लेखन और घिसे-पिटे फॉर्मूले के कारण, सितारों से सजी यह कॉमेडी उम्मीद के मुताबिक नहीं हंसा पाती।
बॉलीवुड में एक दौर था जब छोटे शहर की कहानियों और शादीशुदा जिंदगी की उलझनों पर बनी फिल्में दर्शकों को खूब पसंद आती थीं। आयुष्मान खुराना इसी जॉनर के बेताज बादशाह माने जाते रहे हैं। निर्देशक मुदस्सर अजीज ने एक बार फिर इसी फॉर्मूले को 'पति पत्नी और वो 2' के जरिए भुनाने की कोशिश की है। 15 मई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह फिल्म अपने साथ एक बड़ी स्टार कास्ट लेकर आई है, जिसमें सारा अली खान, वामिका गब्बी और रकुल प्रीत सिंह जैसे नाम शामिल हैं, लेकिन क्या यह फिल्म वाकई उतनी मजेदार है जितना इसका ट्रेलर दावा कर रहा था? चलिए विस्तार से जानते हैं इस फिल्म के हर पहलू को।
एक परिचित शुरुआत
फिल्म की शुरुआत हमें प्रयागराज की गलियों में ले जाती है। यहां हमें मिलवाया जाता है प्रजापति पांडे (आयुष्मान खुराना) से, जो वन विभाग (फॉरेस्ट डिपार्टमेंट) में एक सरकारी अधिकारी हैं। उनकी शादी अपर्णा (वामिका गब्बी) से हुई है, जो पेशे से एक निडर और महत्वाकांक्षी पत्रकार हैं। अपर्णा का सपना है कि वह एक दिन बड़े न्यूज चैनल की हेड बनें। प्रजापति की जिंदगी सामान्य चल रही होती है, जहां उनके दफ्तर में उनके साथ डॉ. नीलोफर (रकुल प्रीत सिंह) काम करती हैं। शुरुआत में फिल्म एक आम मिडिल क्लास परिवार की खट्टी-मीठी नोक-झोंक दिखाती है, जो दर्शकों को जुड़ाव महसूस कराती है। फिल्म का माहौल पूरी तरह से देसी रखा गया है, जिसमें छोटे शहर की बोली और रहन-सहन का तड़का लगाया गया है।
कहानी का ताना-बना
फिल्म की असली कहानी तब रफ्तार पकड़ती है जब अपर्णा एक बड़ी खबर के चक्कर में राजनेता गजराज सिंह (तिग्मांशु धूलिया) के बेटे की एक फोटो वायरल कर देती है। इस फोटो में नेता जी का बेटा एक बुर्का पहनी महिला के साथ नजर आता है। यहीं से फिल्म में 'वो' की एंट्री होती है। यह रहस्यमयी महिला कोई और नहीं बल्कि चंचल (सारा अली खान) है, जो प्रजापति की पुरानी कॉलेज फ्रेंड है। चंचल अपनी जिंदगी की कुछ मुश्किलों में फंसी है और वह मदद के लिए प्रजापति के पास पहुंचती है।
प्रजापति, जो स्वभाव से सीधे और थोड़े डरपोक हैं, चंचल को बचाने के चक्कर में एक ऐसा झूठ बोल देते हैं जो उनके गले की हड्डी बन जाता है। वह चंचल को अपनी 'प्रेमिका' के रूप में पेश करने का नाटक करते हैं ताकि उसे राजनेता के गुंडों से बचाया जा सके। लेकिन जैसा कि हर बॉलीवुड कॉमेडी में होता है, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। जल्द ही उनकी पत्नी अपर्णा को शक होने लगता है और उनके दफ्तर की साथी नीलोफर भी इस गलतफहमी के जाल में फंस जाती हैं। पूरी फिल्म बस इसी भागदौड़, सफाई देने और नए शक पैदा होने के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। क्लाइमेक्स तक आते-आते मामला इतना उलझ जाता है कि इसमें जंगल के जानवर, मधुमक्खियां और भेड़िए तक शामिल हो जाते हैं।
अभिनय का लेखा-जोखा
अभिनय की बात करें तो आयुष्मान खुराना ने अपनी पूरी कोशिश की है कि वह प्रजापति पांडे के किरदार में जान फूंक सकें। हालांकि, दर्शकों को कहीं न कहीं ऐसा महसूस होता है कि आयुष्मान अब एक ही तरह के सांचे में ढल गए हैं। उनके चेहरे के हाव-भाव और डायलॉग बोलने का अंदाज उनकी पिछली फिल्मों जैसे 'ड्रीम गर्ल' या 'शुभ मंगल सावधान' की याद दिलाता है। वह अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन उनके अभिनय में अब वो नयापन नजर नहीं आता जिसकी उम्मीद उनसे की जाती है।
वामिका गब्बी ने अपर्णा के किरदार में बहुत ही सधा हुआ काम किया है। वह फिल्म की सबसे नेचुरल कलाकार नजर आती हैं। एक शक करने वाली पत्नी और एक करियर-ओरिएंटेड पत्रकार के बीच के संतुलन को उन्होंने बखूबी निभाया है। वहीं सारा अली खान का किरदार काफी लाउड है। चंचल के रोल में वह इतनी ज्यादा ऊर्जा दिखाती हैं कि कई बार वह ओवरएक्टिंग की सीमा को पार कर जाती हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी और एक्साइटमेंट कई जगहों पर बनावटी लगती है।
रकुल प्रीत सिंह के पास फिल्म में करने के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं था। उनका किरदार सिर्फ भ्रम को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, हालांकि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया है। फिल्म के असली हीरो तिग्मांशु धूलिया और विजय राज साबित होते हैं। तिग्मांशु ने एक नेता के तौर पर जो सूखी कॉमेडी (ड्राय ह्यूमर) पेश की है, वह फिल्म के सबसे बेहतरीन हिस्सों में से एक है। विजय राज अपनी छोटी सी भूमिका में भी अपनी कॉमिक टाइमिंग से प्रभावित करते हैं। आयशा रजा मिश्रा ने भी बुआ के किरदार में अच्छी कॉमेडी की है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक मुदस्सर अजीज को इस तरह की कॉमेडी फिल्मों का काफी अनुभव है। उन्होंने फिल्म की लंबाई को दो घंटे से कम रखकर एक अच्छा फैसला लिया, जिससे फिल्म बहुत ज्यादा बोझिल नहीं लगती। लेकिन निर्देशन के मामले में वह कहानी को नया मोड़ देने में नाकाम रहे। फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी कमजोर है। फिल्म में वही पुराने फॉर्मूले इस्तेमाल किए गए हैं- जैसे किसी का आधी बात सुन लेना, गलत वक्त पर गलत जगह पहुंच जाना और फिर सफाई देना।
तकनीकी रूप से फिल्म औसत है। प्रयागराज को कैमरामैन ने अच्छी तरह से दिखाया है, लेकिन फिल्म के गाने कहानी की रफ्तार को रोकते हैं। गाने जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं और उनकी धुनें भी लंबे समय तक याद रहने वाली नहीं हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत लाउड है, जो कॉमेडी को और ज्यादा शोर-शराबे वाला बना देता है।
फिल्म की कमजोरियां
'पति पत्नी और वो 2' की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लिखावट (राइटिंग) है। कॉमेडी फिल्मों के लिए सबसे जरूरी चीज होती है पंचलाइन्स और सिचुएशनल ह्यूमर। इस फिल्म में जो जोक्स इस्तेमाल किए गए हैं, उनमें से ज्यादातर पुराने हो चुके हैं या फिर 'वॉट्सऐप फॉरवर्ड्स' जैसे लगते हैं।
दूसरी बड़ी समस्या है पुराना फॉर्मूला। बॉलीवुड अब भी वही एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और गलतफहमी वाले प्लॉट से बाहर नहीं निकल पा रहा है। दर्शक अब इससे बोर हो चुके हैं। फिल्म में तर्क (लॉजिक) की भारी कमी है। प्रजापति जिस तरह का प्लान बनाते हैं, वह शुरुआत से ही बेवकूफी भरा लगता है और दर्शक उससे खुद को जोड़ नहीं पाते। क्लाइमेक्स में मधुमक्खियों और भेड़ियों का इस्तेमाल फिल्म को कॉमेडी से ज्यादा कार्टून जैसा बना देता है। इसके अलावा फिल्म में दिखाया गया स्टीरियोटाइप और कुछ भद्दे मजाक भी खटकते हैं।
वर्डिक्ट
कुल मिलाकर 'पति पत्नी और वो 2' एक ऐसी फिल्म है जिसे आप तब देख सकते हैं जब आपके पास करने को कुछ न हो और आप बस अपना दिमाग बंद करके कुछ हल्का-फुल्का देखना चाहते हों। यह फिल्म न तो बहुत अच्छी है और न ही बहुत खराब, यह बस एक औसत दर्जे की कॉमेडी है। अगर आप आयुष्मान खुराना के बहुत बड़े प्रशंसक हैं तो शायद आप इसे एक बार देख लें, लेकिन अगर आप एक ऐसी फिल्म की तलाश में हैं जो आपको वाकई हंसाए और कुछ नया दिखाए, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है। फिल्म का संदेश और कॉमेडी दोनों ही फीके पड़ गए हैं। तिग्मांशु धूलिया और वामिका गब्बी के अभिनय के लिए इसे देखा जा सकता है, वरना यह फिल्म ओटीटी पर आने तक का इंतजार करने लायक है।
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