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सौतनों की आपसी कड़वाहट पर भारी पड़ी आत्मसम्मान की कानूनी लड़ाई, 1 घंटे 52 मिनट की 'तीसरी बेगम' में दिखा काला सच
समाजिक सच्चाई को ये फिल्म लोगों के बीच लेकर आई है। 1 घंटे 52 मिनट की ये फिल्म कैसी है, फिल्म की कहानी कितनी दिलचस्प है, ये जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे फिल्म मेकर्स रहे हैं जिन्होंने सामाजिक सरोकारों को हमेशा कमर्शियल ताने-बाने में लपेटकर दर्शकों के सामने पेश किया है। 'प्यार झुकता नहीं', 'तेरी मेहरबानियां', 'कुदरत का कानून' और 'आज का अर्जुन' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाले दिग्गज फिल्म मेकर केसी बोकाड़िया इसी फेहरिस्त में एक बड़ा नाम हैं। अपने लंबे और शानदार करियर में उन्होंने हमेशा ऐसी कहानियों को प्राथमिकता दी है, जो आम आदमी की जिंदगी और उनके संघर्षों से सीधे जुड़ती हैं। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए इस बार उनकी नई फिल्म ‘तीसरी बेगम’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। बीएमबी प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी यह फिल्म एक वास्तविक जीवन की घटना से प्रेरित बताई जा रही है। यह फिल्म आज के समय के उस स्याह और डरावने पहलू को उजागर करती है, जहां कुछ असामाजिक तत्व शादी जैसे पवित्र बंधन का इस्तेमाल अपने निजी और घिनौने स्वार्थ के लिए करते हैं। हालांकि केसी बोकाड़िया का सिनेमा सिर्फ बेबसी या लाचारी दिखाकर खत्म नहीं होता, बल्कि यह फिल्म उस बेबसी को एक सामूहिक ताकत और बगावत में बदलने का संदेश देती है। एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे पर आधारित होने के बावजूद यह पूरी तरह से एक कमर्शियल एंटरटेनर फिल्म है, जिसमें ड्रामा, एक्शन, डायलॉगबाजी और संगीत का संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है।
कहानी
फिल्म की पटकथा मुख्य रूप से पूजा दीक्षित (रचना श्याम) नाम की एक बेहद मासूम, सीधी-सादी और भोली लड़की के इर्द-गिर्द बुनी गई है। पूजा अपनी छोटी सी दुनिया में बेहद खुश है और उसकी जिंदगी सामान्य ढर्रे पर चल रही होती है। लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब बब्बन खान नाम का एक बेहद चालाक और शातिर शख्स उसकी जिंदगी में दाखिल होता है। बब्बन खान अपनी असली धार्मिक पहचान, नीयत और इरादों को छुपाकर पूजा को अपने जाल में फंसाता है और धोखे से उससे शादी कर लेता है। शादी के तुरंत बाद पूजा की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। उसका नाम बदलकर ‘नगमा’ रख दिया जाता है और उसे एक ऐसे माहौल में कैद कर दिया जाता है जहां उसकी आजादी और पहचान पूरी तरह छिन जाती है। कहानी का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आता है जब नगमा को बब्बन खान का वो डरावना सच पता चलता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसे मालूम होता है कि बब्बन खान की जिंदगी में वह अकेली नहीं है, बल्कि उसकी पहले से ही दो पत्नियां हैं, शबाना (मुग्धा गोडसे) और तबस्सुम (कायनात अरोड़ा)।
खुद को एक अंतहीन दलदल में फंसा पाकर पूजा पूरी तरह टूट जाती है। लेकिन यहीं से फिल्म की स्क्रिप्ट एक बेहद सकारात्मक और शक्तिशाली करवट लेती है। समाज में आमतौर पर माना जाता है कि सौतनें एक-दूसरे की दुश्मन होती हैं, लेकिन इस फिल्म में स्थापित मान्यताओं को तोड़ते हुए शबाना और तबस्सुम, नगमा की सबसे बड़ी ढाल बनकर सामने आती हैं। ये तीनों पीड़ित महिलाएं अपनी आपसी कड़वाहट और सामाजिक संकोच को दरकिनार कर एक साथ खड़ी होती हैं। वे अपने अत्याचारी पति के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकती हैं और अपनी खोई हुई गरिमा, आत्मसम्मान तथा अधिकारों को वापस पाने के लिए एक कानूनी और सामाजिक लड़ाई की शुरुआत करती हैं।
अभिनय पक्ष
एक्टिंग के मोर्चे पर फिल्म की पूरी स्टार कास्ट ने सराहनीय काम किया है और कहानी के प्रभाव को कम नहीं होने दिया। शबाना के रूप में मुग्धा गोडसे ने एक ऐसी महिला के किरदार को बखूबी जिया है जो लंबे समय से घरेलू और मानसिक प्रताड़ना झेल रही है। मुग्धा के अभिनय में एक खास किस्म का ठहराव और परिपक्वता नजर आती है। जब उनका गुस्सा फूटता है, तो वह दृश्य दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है। तबस्सुम के किरदार में कायनात अरोड़ा ने अपनी पुरानी ग्लैमरस छवि से हटकर एक बेहद गंभीर और संवेदनशील परफॉर्मेंस दी है। उनके कुछ इमोशनल सीन दर्शकों की आंखें नम करने में कामयाब रहे हैं। फिल्म के केंद्र बिंदु यानी पूजा उर्फ नगमा के किरदार में रचना श्याम ने बेहतरीन काम किया है। एक मासूम लड़की की शुरुआती बेबसी, डर और फिर अपने हक के लिए उसके भीतर 'चंडी' के जागने के पूरे ट्रांसफॉर्मेशन को उन्होंने बहुत ही ईमानदारी और ग्रेस के साथ स्क्रीन पर उतारा है। सीनियर एक्ट्रेस जरीना वहाब हमेशा की तरह अपनी गरिमामयी और अनुभवी उपस्थिति से दृश्यों को एक अलग गहराई देती हैं। विलेन और अन्य सहायक किरदारों में केविन गांधी सहित बाकी कलाकारों ने भी अपने चरित्रों के साथ पूरा न्याय किया है। सभी कलाकारों का यह सामूहिक और संतुलित अभिनय ही है जो फिल्म की गति को बांधे रखता है।
निर्देशन
केसी बोकाड़िया को बॉलीवुड में 'मास्टर डायरेक्टर' यूं ही नहीं कहा जाता। इस उम्र में भी सिनेमा को लेकर उनका विजन, पैशन और स्क्रीन पर पकड़ वाकई तारीफ के काबिल है। 'तीसरी बेगम' में उन्होंने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह संवेदनशील और विवादित सामाजिक विषयों को बिना किसी अश्लीलता या लाउड प्रोपेगैंडा के बेहद सलीके से संभाल सकते हैं। बोकाड़िया के निर्देशन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह जानते हैं कि कमर्शियल सिनेमा के दर्शकों को थिएटर में कैसे रोके रखना है। उन्होंने फिल्म में ऐसे चुटीले और दमदार संवादों का इस्तेमाल किया है जो सीधे तौर पर समाज की पुरुष प्रधान और रूढ़िवादी सोच पर चोट करते हैं। कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकलवाना हो, या बिना किसी संवाद के सिर्फ किरदारों के चेहरे के हाव-भाव और आंखों के दर्द से कहानी को आगे बढ़ाना हो, बोकाड़िया का तजुर्बा हर फ्रेम में साफ झलकता है।
सिनेमैटोग्राफी और संगीत
तकनीकी तौर पर 'तीसरी बेगम' एक मजबूत और अच्छी तरह से क्राफ्ट की गई फिल्म है। इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी वास्तविक लोकेशंस हैं। पूरी फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के दो बेहद जीवंत और ऐतिहासिक शहरों— लखनऊ और वाराणसी में की गई है। कैमरे ने वहां की तंग गलियों, पुराने मकानों, अदालतों और गंगा के घाटों के मिजाज को इस तरह से कैद किया है कि ये लोकेशंस सिर्फ बैकग्राउंड न रहकर खुद कहानी का एक जीता-जागता किरदार महसूस होती हैं। इनडोर शॉट्स की लाइटिंग और एंगल्स किरदारों के मानसिक तनाव को बखूबी दर्शाते हैं। इसके अलावा कुशल तकनीशियनों द्वारा डिजाइन किए गए एक्शन सीक्वेंस काफी साफ-सुथरे और क्रिस्प हैं, जो मुख्यधारा के सिनेमा प्रेमियों को पसंद आएंगे।
संगीत की बात करें तो केसी बोकाड़िया की फिल्मों में गानों का हमेशा से एक बड़ा स्थान रहा है और 'तीसरी बेगम' भी इसका अपवाद नहीं है। फिल्म का संगीत इसका एक मजबूत पक्ष है। गाने न केवल कर्णप्रिय हैं, बल्कि वे स्क्रीनप्ले की रफ्तार को धीमा किए बिना कहानी को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। इसके साथ ही, फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कोर्टरूम ड्रामा और भावनात्मक दृश्यों के तनाव को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
कहां कमी रह गई?
एक मजबूत सामाजिक संदेश और अच्छे इरादों के बावजूद 'तीसरी बेगम' कुछ मोर्चों पर कमजोर साबित होती है, जिसके कारण यह एक 'मास्टरपीस' बनते-बनते रह गई। फिल्म का पहला हाफ कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करने, शादी के जाल और धोखे को दिखाने में जरूरत से ज्यादा वक्त ले लेता है। कुछ जगहों पर एडिटिंग काफी ढीली लगती है, जिससे फिल्म की रफ्तार प्रभावित होती है। यदि पहले हाफ को 10 से 15 मिनट और ट्रिम किया जाता, तो कहानी ज्यादा चुस्त लगती। फिल्म का अंत बेहद पारंपरिक और घिसे-पिटे बॉलीवुड स्टाइल में होता है। आज के समय में, विशेषकर ओटीटी पर आधुनिक और थ्रिलर कंटेंट देखने वाले युवाओं को यह क्लाइमैक्स काफी हद तक प्रेडिक्टेबल लग सकता है। कहानी में कुछ ऐसे सरप्राइज एलिमेंट्स की कमी खली जो दर्शकों को चौंका सकते थे। कुछ सीन में मेलोड्रामा का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया है। यदि भावुक सीन्स को थोड़ा और नियंत्रित रखा जाता तो फिल्म की सजीवता और उसका रियलिज्म अधिक उभरकर सामने आता।
वर्डिक्ट
कुल मिलाकर ‘तीसरी बेगम’ महिला सशक्तिकरण के एक बेहद संवेदनशील और जरूरी मुद्दे को उठाने वाली एक ईमानदार फिल्म है। यह फिल्म बताती है कि जब समाज की पीड़ित महिलाएं अपनी कड़वाहट भूलकर एक साथ खड़ी होती हैं, तो बड़े से बड़ा अत्याचारी भी उनके सामने टिक नहीं सकता। केसी बोकाड़िया का सधा हुआ निर्देशन, मुख्य अभिनेत्रियों का शानदार काम और लखनऊ-बनारस की खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। हालांकि थोड़ा पुराना ट्रीटमेंट, अत्यधिक मेलोड्रामा और ढीली एडिटिंग इसकी राह में रोड़ा बनते हैं। यदि आप सामाजिक सरोकारों से जुड़ी गंभीर कहानियों को पारंपरिक और कमर्शियल बॉलीवुड अंदाज में देखना पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। इन्हीं खूबियों और कमियों के मद्देनजर इस फिल्म को 3 स्टार (3/5) दिए जा सकते हैं।