Toxic Review: यश का मैग्नेटिक अवतार, सिर्फ स्वैग ही नहीं, मजबूत महिला किरदारों से सजी है 'टॉक्सिक'

गीतू मोहनदास निर्देशित 'टॉक्सिक' में यश का स्टारडम और एक्शन शानदार है। बेहतरीन विजुअल्स के बावजूद, 194 मिनट लंबी फिल्म कमजोर स्क्रीनप्ले और ओवरलोड कहानी के कारण पूरी तरह प्रभावित करने से चूक जाती है।

Photo: KVN.PRODUCTIONS/INSTAGRAM यश।
मूवी रिव्यू:: टॉक्सिक
Critics Rating: 3 / 5
पर्दे पर: 26/08/2026
कलाकार: हुमा कुरैशी, कियारा आडवाणी
डायरेक्टर: गीतू मोहनदास
शैली: एक्शन थ्रिलर
संगीत: ..............

लंबा इंतजार, भारी भरकम बजट, पैन-इंडिया स्टार यश की बड़ी स्क्रीन पर वापसी और लीक से हटकर सिनेमा बनाने वाली निर्देशक गीतू मोहनदास की जुगलबंदी फिल्म 'टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स' को लेकर दर्शकों और क्रिटिक्स के बीच जबरदस्त माहौल बना हुआ था। 1940 के दशक के बैकड्रॉप पर बनी यह बॉलीवु फिल्म अपनी घोषणा के बाद से ही लगातार चर्चा में रही। गीतू मोहनदास की यह एक्शन-ड्रामा फिल्म एक साथ गैंगस्टर ड्रामा, फैमिली इमोशंस, साइकोलॉजिकल थ्रिलर और विजुअल स्पेक्टेकल बनने की कोशिश करती है। 194 मिनट की यह फिल्म कुछ जगहों पर बेहद शानदार और प्रभावी है, लेकिन कई मोर्चों पर अपनी ही कहानी की गति के आगे हावी और उलझी हुई नजर आती है। पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी 1940 के दशक के गोवा के अंडरवर्ल्ड और आपराधिक साम्राज्य के इर्द-गिर्द बुनी गई है। कहानी के केंद्र में है 'राया' (यश), एक ऐसा निर्दयी गैंगस्टर जिसकी जिंदगी हिंसा, असीमित महत्वाकांक्षा और पेचीदा रिश्तों के ताने-बाने से घिरी हुई है। राया के जीवन में उसकी बड़ी बहन गंगा (नयनतारा) एक मजबूत और महत्वपूर्ण स्तंभ की तरह खड़ी है। राया के इर्द-गिर्द कई महिलाएं मौजूद हैं नाडिया (कियारा आडवाणी), रेबेका (तारा सुतारिया), मेलिसा (रुक्मिणी वसंत) और एलिजाबेथ (हुमा कुरैशी)। ये सभी किरदार अलग-अलग परिस्थितियों में राया की जिंदगी से जुड़े हुए हैं।

कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब फिल्म में 'टिकट' नाम के एक अन्य किरदार का प्रवेश होता है, जिसे खुद यश ने ही निभाया है। फिल्म के सेकंड हाफ में राया और टिकट के बीच का कनेक्शन और टकराव कहानी का सबसे अहम पहलू बन जाता है। कागजों पर देखा जाए तो कहानी में काफी गहराई और नयापन है। राया सिर्फ ताकत और सत्ता के पीछे भागने वाला पारंपरिक गैंगस्टर नहीं है; फिल्म उसके भावनात्मक फैसलों, उसके आंतरिक विरोधाभासों और उसके आस-पास के उन लोगों को भी तलाशने की कोशिश करती है जो या तो उसे बढ़ावा देते हैं या उसे चुनौती देते हैं।

लेखन और निर्देशन

निर्देशक गीतू मोहनदास ने यह साफ कर दिया है कि वे एक साधारण या घिसी-पिटी गैंगस्टर फिल्म नहीं बनाना चाहती थीं। यही 'टॉक्सिक' की सबसे बड़ी खासियत भी है और इसकी कमजोरी भी। फिल्म में एक मास एंटरटेनर के सभी तत्व मौजूद हैं, एक शक्तिशाली मुख्य किरदार, खौफनाक हिंसा, बैकग्राउंड म्यूजिक, एंट्री सीन्स और हैरतअंगेज एक्शन सीक्वेंस। लेकिन गीतू ने इन सभी तत्वों को एक काल्पनिक और अनोखी दुनिया में स्थापित करने का प्रयास किया है।

स्क्रीन पर राया के कैरेक्टर को जिस तरह से पेश किया गया है, उसमें 'KGF' के रॉकी भाई की झलक महसूस होती है। रॉकी की तरह राया भी एक आम हीरो के बजाय 'लार्जर देन लाइफ' व्यक्तित्व है, जिसकी साख और खौफ उसके आने से पहले ही माहौल बना देता है। लेकिन दोनों में बड़ा अंतर यह है कि गीतू मोहनदास राया के चरित्र की जटिलताओं और उसकी कमियों को दिखाने में ज्यादा दिलचस्पी रखती हैं।

फिल्म की समस्या विचारों की कमी नहीं है, बल्कि ओवरलोड है। 194 मिनट का लंबा रनटाइम मिलने के बावजूद स्क्रीनप्ले बहुत जल्दबाजी में लिखा गया महसूस होता है। महत्वपूर्ण भावनात्मक सीन बनने से पहले ही खत्म हो जाते हैं, जिससे दर्शक उनसे पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। कई दृश्य केवल कहानी को अगले बड़े एक्शन सीक्वेंस तक ले जाने के लिए रखे गए प्रतीत होते हैं। हालांकि गीतू का निर्देशन उन दृश्यों में सबसे ज्यादा चमकता है जहाँ वे किरदारों को शांति से संवाद करने का मौका देती हैं। खासतौर पर राया और टिकट के बीच के सीन्स में जो मनोवैज्ञानिक तनाव देखने को मिलता है, उसकी जरूरत पूरी फिल्म में महसूस होती है।

विजुअल ग्रैंडियोर और बेहतरीन एक्शन

यदि कोई एक डिपार्टमेंट है जिसमें 'टॉक्सिक' पूरी तरह से अपनी छाप छोड़ती है तो वह है इसका तकनीकी पहलू। 1940 के गोवा के दौर को बड़े पर्दे पर री-क्रिएट करने के लिए मेकर्स ने काफी मेहनत की है। फिल्म के सेट, कॉस्ट्यूम डिजाइन और ओवरऑल प्रोडक्शन वैल्यू एक ऐसी दुनिया का निर्माण करते हैं जो वास्तविकता से बड़ी और भव्य लगती है।

सिनेमैटोग्राफर राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को एक अलग और विशिष्ट विजुअल लैंग्वेज देती है। कैमरे के फ्रेम में हर एक डिटेल को बेहद खूबसूरती से कैद किया गया है, बिना मुख्य किरदारों से ध्यान हटाए। फिल्म के मेकिंग स्टाइल पर अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा और दुनिया भर की प्रदर्शन कलाओं का साफ प्रभाव दिखाई देता है और मेकर्स इन प्रभावों को अपनी कहानी का हिस्सा बनाने में काफी हद तक सफल रहे हैं।

फिल्म का एक्शन डिपार्टमेंट इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। सर्कस के बैकड्रॉप में नाडिया के इर्द-गिर्द फिल्माया गया एम्बुश एक्शन सीक्वेंस बेहद यादगार बन पड़ा है। यह सीन काफी थियेट्रिकल है, लेकिन कहीं भी अपनी पकड़ नहीं खोता। सर्कस के अलग माहौल ने एक्शन कोरियोग्राफी को एक नया और अनूठा एंगल दिया है। इसके अलावा साउंड डिजाइन और म्यूजिक का इस्तेमाल राया के ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को कई गुना बढ़ाने के लिए किया गया है।

यश का करिश्मा और सहयोगी कलाकारों का काम

चार साल के लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रहे यश वही करते हैं जो इस तरह की फिल्मों में एक मुख्य स्टार को करना चाहिए, वे हर एंट्री को धमाकेदार बना देते हैं। राया के रूप में यश बिना ज्यादा प्रयास किए भी स्क्रीन पर अपना दबदबा बनाए रखते हैं। उनका स्वैग प्राकृतिक लगता है, लेकिन साथ ही वे अपने किरदार में एक डार्क और भयानक शेड भी लाते हैं। राया एक ऐसा किरदार नहीं है जिसे आसानी से पसंद किया जा सके, और फिल्म भी दर्शकों से उसे हीरो मानने की उम्मीद नहीं करती। यश का अभिनय इसलिए प्रभावी लगता है क्योंकि वे समझते हैं कि उनके किरदार का असली आकर्षण उसके अनपेक्षित व्यवहार में छुपा है।

डबल रोल ने यश को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने का एक नया मौका दिया है। राया और टिकट के एक साथ वाले सीन पूरी फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से हैं, क्योंकि यश को एक ही समय में दो बिल्कुल अलग स्वभाव वाले किरदारों के बीच का समीकरण और तनाव स्थापित करना पड़ा है।

अन्य कलाकारों की बात करें तो नयनतारा ने 'गंगा' के रूप में एक शांत लेकिन प्रभावशाली परफॉर्मेंस दी है। उनके अभिनय में गंभीरता और अधिकार झलकता है, हालांकि कमजोर राइटिंग की वजह से उनके किरदार को कोई बहुत बड़ा आर्क नहीं मिल पाया। कियारा आडवाणी ने 'नाडिया' के रूप में अपनी छाप छोड़ी है, जबकि रुक्मिणी वसंत ने अपने दृश्यों में एक अलग ऊर्जा लाई है। हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया ने भी अपने काम के साथ पूरा न्याय किया है, भले ही स्क्रीनप्ले ने उनके किरदारों को उतना विस्तार न दिया हो जितना शुरुआत में वादा किया गया था। फिल्म की मुख्य समस्या यह है कि सभी रास्ते घूम-फिरकर राया पर ही आकर खत्म होते हैं, जिससे बाकी मजबूत किरदार साइडलाइन हो जाते हैं।

कहां चूक गई फिल्म?

फिल्म का स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित होता है। एक ही समय पर बहुत सारी चीजें घटित हो रही हैं, जिससे किसी भी मुद्दे को सही समय और न्याय नहीं मिल पाता। गैंगस्टर ड्रामा, पारिवारिक झगड़े, लव स्टोरी, बदले की भावना और मनोवैज्ञानिक संघर्ष एक-दूसरे से होड़ लगाते दिखते हैं। इनके बीच का ट्रांजिशन बहुत सहज नहीं है।

फिल्म की महिला कलाकारों के किरदारों को सही विस्तार न मिलना भी एक छूटा हुआ अवसर है। गंगा, एलिजाबेथ और नाडिया जैसे किरदारों के पास अपनी अलग और समृद्ध कहानियों की गुंजाइश थी, लेकिन पूरी फिल्म में वे राया के सफर के आगे सेकेंडरी ही बने रहे। 194 मिनट की लंबाई भी दर्शकों को अखरने लगती है, क्योंकि फिल्म बार-बार अपनी गति और टोन बदलती रहती है। कई मौकों पर ऐसा लगता है कि इस तमाशे और भव्यता के पीछे एक ज्यादा बेहतर और कसी हुई फिल्म छिपी हुई थी।

फाइनल वर्डिक्ट

'टॉक्सिक' एक ऐसी फिल्म है जिसकी तारीफ और सराहना करना आसान है, लेकिन इसे पूरी तरह से अपनाना थोड़ा मुश्किल। फिल्म में बेहतरीन क्राफ्टमैनशिप देखने को मिलती है, शानदार प्रोडक्शन डिजाइन, कल्पनाशील एक्शन सीक्वेंस और यश की स्क्रीन पर अविश्वसनीय उपस्थिति। गीतू मोहनदास ने पारंपरिक गैंगस्टर ब्लॉकबस्टर से कुछ अलग और नया प्रयोग करने की हिम्मत दिखाई है, जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं, लेकिन केवल बड़ी महत्वाकांक्षाएं ही 194 मिनट की लंबी फिल्म को अकेले अपने दम पर नहीं खींच सकतीं। स्क्रीनप्ले में और अधिक कसावट की जरूरत थी, कुछ किरदारों को अधिक स्पेस मिलना चाहिए था और भावनात्मक दृश्यों को अगले एक्शन सीक्वेंस पर जाने से पहले दर्शकों के दिलों तक पहुंचने का समय मिलना चाहिए था।

कुल मिलाकर 'टॉक्सिक' एक दिलचस्प अधर में खड़ी नजर आती है, यह इतनी बेहतरीन बनी है कि इसे खारिज नहीं किया जा सकता और इतनी बिखरी हुई है कि इसे पूरी तरह से रिकमेंड भी नहीं किया जा सकता। फिर भी, इसके विशाल विज़न, तकनीकी भव्यता और यश के दमदार अभिनय के लिए इसे सिनेमाघरों में देखा जा सकता है।

रेटिंग: 3/5 स्टार्स