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'उत्तर दा पुत्तर' रिव्यू: कर्म बड़ा या किस्मत? हंसी और ड्रामे के डबल डोज में फांसी गुदगुदाने वाली कहानी
'उत्तर दा पुत्तर' एक बेहतरीन फैमिली कॉमेडी है। इसमें अन्नू कपूर एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर बने हैं जो वास्तु पर अंधविश्वास करते हैं। यह फिल्म हंसाते हुए कर्म और किस्मत का शानदार संदेश देती है।
भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों से मध्यवर्गीय परिवारों और उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं पर आधारित स्लाइस-ऑफ-लाइफ फिल्मों का एक बेहद सफल दौर देखने को मिला है। इसी कड़ी में एक और ताज़ा और दिलचस्प नाम जुड़ने जा रहा है, 'उत्तर दा पुत्तर'। अक्सर सिनेमा में विज्ञान और आस्था या अंधविश्वास के बीच की बहस को बेहद गंभीर और दार्शनिक तरीके से पेश किया जाता है, जिससे दर्शक कई बार बोझिल महसूस करने लगते हैं। लेकिन क्या हो जब इसी वैचारिक टकराव को एक बेहद गुदगुदाने वाली, हास्य से भरपूर और व्यंग्यात्मक कॉमेडी के रूप में पर्दे पर उतारा जाए?
संदीप कपूर और प्रिया कपूर द्वारा निर्मित यह फिल्म बिल्कुल यही साहसिक प्रयास करती है। यह एक ऐसी साफ़-सुथरी फैमिली एंटरटेनर है, जो बिना किसी फूहड़ता या जबरदस्ती के चुटकुलों के, आपको हंसाने का वादा करती है। फिल्म का मूल विषय एक बहुत ही सामान्य लेकिन गहरे सवाल पर आधारित है कि क्या जीवन की सफलता और सुख-शांति हमारे कर्मों से तय होती है या फिर घर की दिशाओं और किस्मत से? बिना कहानी के मुख्य सस्पेंस को उजागर किए, यह कहा जा सकता है कि यह फिल्म आपको उन तमाम सामाजिक मान्यताओं पर हंसने का मौका देती है, जिन्हें हम अक्सर बिना सोचे-समझे अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं।
कहानी और प्लॉट
फिल्म 'उत्तर दा पुत्तर' की कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण इसका मुख्य किरदार और उसके जीवन का अंतर्निहित विरोधाभास है। कहानी के केंद्र में हैं प्रोफेसर साई राम टुटेजा, जो पेशे से एक भौतिक विज्ञान के शिक्षक हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसका काम छात्रों को न्यूटन के नियम और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पढ़ाना है, वह अपनी निजी जिंदगी में पूरी तरह से वास्तु शास्त्र, तंत्र-मंत्र और शुभ-अशुभ के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। लेखक संदीप कपूर ने इस विडंबना को बेहद खूबसूरती से कागज पर उतारा है।
फिल्म का शुरुआती ताना-बाना दर्शकों को तुरंत अपनी ओर खींचने में कामयाब रहता है। एक दृश्य में प्रोफेसर टुटेजा अपने कोचिंग सेंटर में सिर से पांव तक काले कपड़ों में लिपटे हुए आते हैं और जब वह बाहरी कपड़ा हटाते हैं तो अंदर भी काले रंग के ही कपड़े निकलते हैं। यह नाटकीय प्रवेश ही उनके किरदार की सनक को स्थापित कर देता है। कहानी तब रफ़्तार पकड़ती है जब प्रोफेसर साहब अपने और अपने परिवार के लिए एक 'परफेक्ट वास्तु' वाले घर की तलाश पूरी करते हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि इस नए घर की सटीक दिशाएं उनके जीवन से सारी नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर देंगी। वह अपने ससुर और साले को बड़े गर्व से इस वास्तु-सम्मत घर की खूबियां गिना ही रहे होते हैं कि अचानक छत का एक पुराना पंखा उन दोनों पर गिर जाता है। यह दृश्य न केवल बेहतरीन हास्य पैदा करता है, बल्कि प्रोफेसर के विश्वास पर एक गहरा तमाचा भी मारता है।
इस दुर्घटना के बाद उनकी पत्नी गिन्नी नाराज़ होकर मायके चली जाती है। अपनी बिखरी हुई पारिवारिक जिंदगी को समेटने और अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए, प्रोफेसर अपने जिगरी दोस्त मन्नू के साथ एक नई यात्रा पर निकलते हैं, एक ऐसे परफेक्ट वास्तु की तलाश, जो उनकी किस्मत बदल सके। इस सफ़र में उनका सामना दिल्ली के कई अतरंगी और विचित्र किरदारों से होता है। नेक चड्ढा, वास्तुकार वर्मा, और एस.बी. सिद्धू जैसे किरदार कहानी में नए-नए ट्विस्ट लाते हैं। फिल्म का प्लॉट पूरी तरह से इन किरदारों के बीच होने वाली हास्यास्पद परिस्थितियों और संवादों पर टिका है, जो अंत तक दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखता है।
अभिनय
एक अच्छी कॉमेडी फिल्म तभी सफल होती है जब उसके कलाकार अपनी कॉमिक टाइमिंग और हाव-भाव से दर्शकों को बांध सकें। इस मामले में 'उत्तर दा पुत्तर' पूरी तरह से एक एक्टर ड्रिवन फिल्म है।
अन्नू कपूर ने प्रोफेसर साई राम टुटेजा के रूप में जो प्रदर्शन किया है, वह इस फिल्म की सबसे बड़ी ताक़त है। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति की उलझनों को बड़ी सहजता से परदे पर जिया है, जो अपने ही बनाए हुए अंधविश्वास के पिंजरे में कैद है। उनके चेहरे के भाव, संवाद अदायगी और घबराहट में की गई हरकतें दर्शकों को लोटपोट कर देती हैं। वहीं भावनात्मक दृश्यों में भी वह अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं, जिससे उनका किरदार महज एक कैरिकेचर बनकर नहीं रह जाता।
रुखसार रहमान ने गिन्नी (प्रोफेसर की पत्नी) के किरदार को बड़ी सादगी और शालीनता के साथ निभाया है। उनके किरदार में एक ठहराव है, जो प्रोफेसर की सनक को संतुलित करता है। फिल्म में एक और चमकता हुआ सितारा हैं पवन मल्होत्रा। नेक चड्ढा के रूप में उनका प्रवेश कहानी में एक नई ऊर्जा भर देता है। हमेशा की तरह पवन मल्होत्रा ने अपने किरदार की बारीकियों को पकड़ा है और उनकी कॉमिक टाइमिंग देखने लायक है।
बृजेंद्र काला, जो मन्नू (प्रोफेसर के दोस्त) की भूमिका में हैं, एक बार फिर साबित करते हैं कि वह सह-कलाकार के रूप में कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं। उनके वन-लाइनर्स और संवाद अदायगी का लहज़ा बेहद स्वाभाविक है। इश्तियाक खान ने वास्तुकार वर्मा के छोटे लेकिन बेहद प्रभावशाली रोल में महफ़िल लूट ली है। जीवेशु अहलूवालिया ने एसबी सिद्धू के रूप में स्क्रीन पर आते ही ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया है। नितिन अरोड़ा, राजेंद्र सेठी और सुमित गुलाटी जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है और फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट को बेहद मजबूत बनाया है।
निर्देशन
यह फिल्म निर्देशक रविंदर सिवाच की पहली निर्देशित फिल्म है, लेकिन उनका काम देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि कैमरे के पीछे कोई डेब्यूटेंट बैठा है। सिवाच ने पूरी फिल्म को एक बहुत ही सधे हुए तरीके से हैंडल किया है।
अक्सर मल्टी-स्टारर या कई अतरंगी किरदारों वाली कॉमेडी फिल्मों में कहानी के भटकने का डर रहता है, लेकिन सिवाच ने पटकथा पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी है। उन्होंने दिल्ली के स्थानीय स्वाद, वहां के गली-मोहल्लों, मध्यवर्गीय परिवारों की सोच और उनके रहन-सहन को बेहद प्रामाणिक ढंग से पर्दे पर पेश किया है। निर्देशन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने कॉमेडी और ड्रामा के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा है। जहां एक तरफ फिल्म हंसाती है, वहीं दूसरी तरफ यह बिना किसी उपदेशात्मक स्वर के एक गहरा संदेश भी दे जाती है। दृश्यों के बीच का ट्रांजिशन बहुत स्मूथ है, और उन्होंने अपने अभिनेताओं से उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकालने में पूरी सफलता पाई है।
तकनीकी पहलू
फिल्म की तकनीकी टीम ने 'उत्तर दा पुत्तर' को विजुअली और ऑडिटरी रूप से एक सुखद अनुभव बनाने में अहम भूमिका निभाई है। 1 घंटा 43 मिनट की अवधि वाली इस फिल्म की एडिटिंग बेहद चुस्त है। फिल्म कहीं भी खिंचती हुई महसूस नहीं होती और पहले दृश्य से लेकर क्लाइमैक्स तक एक सही गति में आगे बढ़ती है।
सिनेमेटोग्राफी ने दिल्ली के परिवेश को बहुत ही जीवंत तरीके से कैद किया है। तंग गलियां, मध्यवर्गीय घरों की सजावट, और अस्त-व्यस्त बाज़ार फिल्म की वास्तविकता को बढ़ाते हैं। प्रोडक्शन डिज़ाइन की विशेष रूप से तारीफ करनी होगी, क्योंकि 'वास्तु' के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी में घरों के इंटीरियर और दिशाओं को जिस तरह से सेट पर दर्शाया गया है, वह कहानी की मांग को पूरी तरह से संतुष्ट करता है।
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर
इसकी कॉमेडी को और अधिक उभारता है। जहां किरदारों के अजीबोगरीब कृत्य होते हैं, वहां का संगीत दृश्यों के हास्य को दोगुना कर देता है। इसके अलावा डायलॉग्स की बात करें तो वे बेहद चुटीले, ठेठ दिल्ली के अंदाज़ वाले और रोज़मर्रा की बोलचाल से प्रेरित हैं, जो दर्शकों से सीधा संवाद करते हैं।
क्या कमियां रहीं
हालांकि फिल्म अपने इरादों में पूरी तरह से सफल रहती है, लेकिन कुछ छोटी-मोटी कमियां हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिल्म का दूसरा हॉफ विशेषकर क्लाइमैक्स से ठीक पहले का हिस्सा, थोड़ी सी ढिलाई का शिकार होता है। प्रोफेसर द्वारा 'परफेक्ट वास्तु' की तलाश में की जाने वाली भागदौड़ कुछ दृश्यों में दोहराई गई सी लगने लगती है, जिसे थोड़ा और कड़ा किया जा सकता था।
इसके अलावा कुछ सहायक किरदारों को स्क्रीन पर विकसित होने का पूरा समय नहीं मिल पाया है। कहानी इतनी तेज़ी से आगे बढ़ती है कि कुछ किरदारों की पृष्ठभूमि अनकही ही रह जाती है। हालांकि यह कॉमेडी फिल्मों की एक आम समस्या है, लेकिन इतने बेहतरीन कलाकारों के होने के बावजूद उनके लिए कुछ और दृश्य लिखे जा सकते थे। अंतिम भाग में संदेश देने की जल्दबाज़ी में कहानी थोड़ी सी मेलोड्रामैटिक हो जाती है, जो शुरुआत की हल्की-फुल्की टोन से थोड़ा अलग महसूस होती है।
वर्डिक्ट
'उत्तर दा पुत्तर' आज के तनावपूर्ण दौर में ताज़ी हवा के झोंके की तरह है। यह महज़ कुछ बेसिर-पैर के चुटकुलों का संकलन नहीं है, बल्कि एक विचारोत्तेजक कॉमेडी है। यह फिल्म बड़े ही प्यार से दर्शकों के सामने यह सवाल रखती है कि जिंदगी की पहेली को सुलझाने के लिए इंसान को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए या केवल किस्मत और अंधविश्वास के भरोसे बैठे रहना चाहिए?
शानदार अभिनय, चुस्त निर्देशन और दिल्ली के देसी तड़के के साथ, यह एक बेहतरीन फैमिली एंटरटेनर है। यदि आप अपने सप्ताहांत पर परिवार के साथ एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाए और दिल को एक सकारात्मक संदेश दे तो आपको इस फिल्म का टिकट जरूर कटाना चाहिए। अन्नू कपूर और पवन मल्होत्रा की जुगलबंदी ही इसे देखने का एक पर्याप्त कारण है।