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Explainer: पहले ईरान को धमकी, बड़ी-बड़ी बातें और फिर अचानक एकतरफा सीजफायर; जानें ट्रंप की मजबूरी है या स्ट्रैटजी?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एकतरफा सीजफायर करके सबको चौंका दिया है। पहले ईरान को मिटाने की धमकियां देने वाले ट्रंप ईरान की शर्तों के आगे अचानक इतना कैसे झुक गए?

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति। - India TV Hindi
Image Source : AP डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति।

Explainer: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ईरान को शांति वार्ता में शामिल नहीं होने उसके पावर प्लांट और ब्रिज उड़ाने और पहले कभी नहीं देखा गया हमला करने की धमकियां दीं और कई बड़ी-बड़ी बातें कीं, लेकिन फिर मंगलवार की रात को अचानक एकतरफा सीजफायर का ऐलान कर दिया। ट्रंप ने इसके लिए फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के कंधे का सहारा लिया। आखिर ट्रंप के पास ऐसी क्या मजबूरी थी, जिसने उनको ईरान के अडिग रवैये के बावजूद झुकने को मजूबर किया। सवाल उठ रहा है कि अमेरिका ने ईरान के आगे क्या सरेंडर कर दिया या फिर यह ट्रंप की यह कोई नई स्ट्रैटेजी है। आइये विस्तार से जानते हैं...

पहले दबाव, फिर पलटने की नीति

ट्रंप की विदेश नीति अक्सर “मैक्सिमम प्रेशर” यानी अधिकतम दबाव की रणनीति पर आधारित रही है। ईरान के मामले में भी शुरुआत में सख्त बयान, सैन्य चेतावनियां और संभावित कार्रवाई की बातें सामने आईं, लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़ने लगे, अमेरिका ने अचानक सीजफायर की ओर रुख किया। इस बदलाव ने कई विश्लेषकों को चौंका दिया है।

मजबूरी क्या हो सकती है?

ऐसा माना जा रहा है कि ईरान के साथ टकराव के दौरान अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा। कुछ दावों में कहा गया है कि एयर डिफेंस और प्रिसीजन मिसाइल सिस्टम का बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है, जिससे आगे लंबे संघर्ष की क्षमता सीमित हो सकती है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि अमेरिका ने ईरान के साथ सिर्फ 40 दिनों की जंग में अपना 50 फीसदी तक मिसाइल और गोला-बारूद का स्टॉक खो दिया है। इसके अलावा क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर वैश्विक तेल आपूर्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट का खतरा भी सामने है। इस दौरान खाड़ी देश अपने यहां हुए अरबों डॉलर की संपत्तियों के नुकसान के लिए अमेरिका से मुआवजा मांग रहे हैं। इसलिए ट्रंप बेहद दबाव में हैं। वहीं अमेरिका की घरेलू राजनीति भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। लंबे युद्धों को लेकर अमेरिकी जनता में थकान है और चुनावी माहौल में एक नया “अनपॉपुलर वॉर” ट्रंप के लिए राजनीतिक जोखिम बन सकता था।

क्या यह रणनीति भी है?

दूसरी तरफ इसे केवल मजबूरी नहीं माना जा सकता। यह कदम एक रणनीतिक “डी-एस्केलेशन” (तनाव कम करने) की कोशिश भी हो सकता है। सीजफायर से अमेरिका को कूटनीतिक बातचीत का समय मिल जाता है, जबकि सैन्य दबाव भी बना रहता है। यह तरीका विरोधी को बातचीत की मेज पर लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ट्रंप का सोशल मीडिया पर आक्रामक बयान देना भी इस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। एक तरफ सख्त चेतावनी, दूसरी तरफ बातचीत का दरवाजा खुला रखना ट्रंप की रणनीति का हिस्सा है। इस बहाने अमेरिका को ईरान से आगे की जंग लड़ने की नौबत आने पर अपने स्टॉक जुटाने का मौका मिल सकता है।

कब तक रहेगा संघर्ष विराम

अमेरिका और ईरान के बीच बुधवार को 15 दिनों का सीजफायर खत्म होने से पहले ही ट्रंप ने सीजफायर को बिना किसी शर्त आगे बढ़ाने का ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक ईरान की लीडरशिप दूसरे दौर की वार्ता पर पूरी तरह अपना रुख साफ नहीं करती, तब तक यह सीजफायर जारी रहेगा और अमेरिका तेहरान पर हमले नहीं करेगा। यानी यह सीजफायर अनिश्चितकाल के लिए है, जो कभी भी टूट सकता है। 

होर्मुज से ब्लॉकेड हटा सकता है अमेरिका

अब अमेरिका के सामने ईरान से दूसरे दौर की वार्ता शुरू करने के लिए ईरानी बंदरगाहों और होर्मुज पोर्ट से ब्लॉकेड हटाना ही एक मात्र रास्ता है। ट्रंप ने इसका संकेत भी दिया है कि वह आगे ईरानी पोर्ट्स से अमेरिकी ब्लॉकेड को हटा सकते हैं। ईरान इस जिद पर अड़ा है कि जब तक अमेरिकी ब्लॉकेड नहीं हटाता, तब तक उससे कोई वार्ता नहीं होगी। इस प्रकार सैन्य दबाव, राजनीतिक गणना और क्षेत्रीय अस्थिरता ने मिलकर ट्रंप को सीजफायर की दिशा में धकेला है। जबकि कूटनीतिक लाभ उठाने की कोशिश भी जारी है। फिलहाल यह संघर्षविराम कितना टिकेगा, वह आने वाले दिनों की बातचीत और जमीनी हालात तय करेंगे। क्योंकि ईरान ने भी इस बीच अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ रैलियां निकाली हैं, जो इजरायल और अमेरिका को जंग के लिए तैयार रहने का संकेत देने के लिए है।