श्रीनगर: कश्मीर की वादियों में इस साल एक नई शुरुआत हुई है। भारतीय सेना की एक खास मालगाड़ी, जो सैन्य साजो-सामान लेकर आई थी, कश्मीर के मशहूर सेबों को देश के बाकी हिस्सों में पहुंचा रही है। यह गाड़ी उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (USBRL) पर चली, जो 272 किलोमीटर लंबा रेल मार्ग है। इस रेल सेवा ने न सिर्फ सेना की सर्दियों की तैयारी को आसान किया है, बल्कि कश्मीरी किसानों के लिए भी नई उम्मीद की किरण जगाई है। इसे 'सैन्य-नागरिक साझेदारी' (military-civil fusion) का अनोखा नमूना कहा जा रहा है। आइए, समझते हैं कि यह घटना इतनी अहम क्यों है।
पहले क्या थी मुश्किलें? इससे क्या फायदा होगा?
कश्मीर में सर्दियों का मौसम बेहद सख्त होता है। बर्फबारी और भूस्खलन की वजह से सड़क मार्ग अक्सर बंद हो जाते हैं। भारतीय सेना, जो जम्मू-कश्मीर, कारगिल और लद्दाख जैसे दुर्गम इलाकों में तैनात है, को सर्दियों के लिए पहले से सामान जमा करना पड़ता है। इसे 'एडवांस विंटर स्टॉकिंग' (AWS) कहते हैं। पहले यह सामान सड़कों के जरिए ट्रकों और काफिलों में भेजा जाता था। लेकिन बर्फ और भूस्खलन की वजह से यह काम जोखिम भरा और महंगा था। कई बार सामान समय पर नहीं पहुंच पाता था, जिससे सेना की तैयारियों पर असर पड़ता था।
इसी तरह, कश्मीर के सेब उत्पादक किसानों को भी सड़क मार्ग की बंदिशों का सामना करना पड़ता था। कश्मीर के सेब, जो देश-विदेश में मशहूर हैं, सड़क मार्ग से दिल्ली और अन्य शहरों तक पहुंचाए जाते थे। लेकिन बारिश, बर्फबारी या भूस्खलन की वजह से रास्ते बंद होने पर सेब खराब हो जाते थे। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था। लागत ज्यादा थी, मुनाफा कम था, और बाजार तक पहुंचने में देरी की वजह से सेब की क्वालिटी भी प्रभावित होती थी।
Image Source : Reporter Inputअनंतनाग से वापसी में मालगाड़ी पर कश्मीर के सेब लादे गए।
USBRL ने कैसे बदल दी पूरी तस्वीर?
इस साल जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 43780 करोड़ रुपये की लागत से बने उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक का उद्घाटन किया। यह रेल मार्ग दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में से एक है, जिसमें 36 सुरंगें, 943 पुल, और विश्व का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज (चिनाब नदी पर) शामिल है। यह रेल लिंक कश्मीर को हिमालय के बीच से देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है, वो भी हर मौसम में।
12-13 सितंबर को सेना ने पहली बार इस रेल मार्ग का इस्तेमाल करते हुए 753 मीट्रिक टन सैन्य सामान बीडी बारी (सांबा के पास) से अनंतनाग तक पहुंचाया। यह सामान जम्मू-कश्मीर, कारगिल और लद्दाख में तैनात सैनिकों के लिए सर्दियों की तैयारी का हिस्सा था। इस रेल सेवा ने न सिर्फ समय और लागत बचाई, बल्कि सड़क मार्ग की अनिश्चितताओं को भी खत्म किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वापसी में यह मालगाड़ी खाली नहीं लौटी। इसमें कश्मीर के सेब लादे गए, जो अब देश के बड़े बाजारों तक पहुंच रहे हैं।
Image Source : Reporter Inputअनंतनाग रेलवे स्टेशन।
किसानों के लिए वरदान की तरह है ये सेवा
सेना की इस मालगाड़ी के साथ-साथ एक और अच्छी खबर आई। लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने बडगाम से नई दिल्ली के आदर्श नगर तक एक खास पार्सल ट्रेन शुरू की। यह ट्रेन हर दिन 180 टन सामान ले जा सकती है। यह ट्रेन सुबह 6:15 बजे बडगाम से चलती है, दोपहर में जम्मू के बारी ब्राह्मणा में रुकती है, और अगली सुबह दिल्ली पहुंचती है। जल्द ही अनंतनाग से भी ऐसी ही सेवा शुरू होगी। यह रेल सेवा किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। पहले जहां सड़क मार्ग से सेब भेजने में समय, पैसा और माल खराब होने का डर रहता था, अब रेल के जरिए तेज, सस्ता और भरोसेमंद परिवहन संभव है। इससे सेब की क्वालिटी बनी रहती है, लागत कम होती है, और किसानों की आय बढ़ रही है।
'सैन्य-नागरिक साझेदारी' का बेहतरीन उदाहरण
यह रेल सेवा सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट फैसिलिटी नहीं है, यह कश्मीर की अर्थव्यवस्था और सेना की स्ट्रैटिजी में एक नया अध्याय है। कहा जा सकता है कि पहली बार सेना और नागरिकों की जरूरतों को इस तरह एक साथ जोड़ा गया है। इसे 'सैन्य-नागरिक साझेदारी' का बेहतरीन उदाहरण कहा जा सकता है। सेना को हर मौसम में सामान पहुंचाने की सुविधा मिली है, जिससे उनकी तैयारियां और मजबूत होंगी। वहीं, किसानों को अब बाजार तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की अनिश्चितताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा, यह पहल कश्मीर के आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देगी।