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AI से अब जैविक हथियारों तक का खतरा? Anthropic ने बताया कैसे रोका खतरनाक इस्तेमाल

एंथ्रोपिक ने AI के बढ़ते दुरुपयोग को लेकर गंभीर खतरे बताए हैं। कंपनी ने साइबर हमलों, निगरानी, राजनीतिक प्रचार और संभावित खतरनाक जैविक शोध में AI के इस्तेमाल की कोशिशों को रोकने की बात कही है।

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Image Source : INDIA TV एंथ्रोपिक ने AI के खतरों को लेकर एक अहम रिपोर्ट तैयार की है।

Highlights

  • Anthropic ने AI के साइबर हमले, निगरानी और जैविक शोध में दुरुपयोग की कोशिशें रोकीं।
  • Claude से चिकनगुनिया वायरस को ज्यादा खतरनाक बनाने वाले शोध में मदद मांगी गई थी।
  • AI की बढ़ती क्षमता के बीच कंपनियों पर सुरक्षा और सरकारों पर नियमन का दबाव बढ़ा है।

AI Biological Weapons: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के तेजी से ताकतवर होने के साथ इसके गलत इस्तेमाल का खतरा भी बढ़ रहा है। AI कंपनी Anthropic ने अपनी नई रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों का खुलासा किया है, जहां उसके AI मॉडल का इस्तेमाल साइबर हमलों, निगरानी, राजनीतिक प्रचार और ऐसे जैविक शोध में करने की कोशिश हुई, जिसका इस्तेमाल खतरनाक जैविक हथियार बनाने में भी हो सकता था। कंपनी का कहना है कि उसने इन सभी मामलों में संदिग्ध गतिविधियों को रोक दिया। एंथ्रोपिक ने यह रिपोर्ट इसलिए जारी की है ताकि दूसरी AI कंपनियां, सरकारें और सुरक्षा एजेंसियां भी ऐसे खतरों को पहचानकर उनसे निपटने की तैयारी कर सकें।

AI से जैविक हथियारों का खतरा कितना बढ़ा?

Anthropic के मुताबिक, AI मॉडल अब पहले से कहीं ज्यादा सक्षम हो गए हैं। इसका एक असर यह है कि जटिल साइबर हमलों के लिए पहले जितनी विशेषज्ञता जरूरी थी, वह अब हमेशा जरूरी नहीं रह गई है। यानी अकेला व्यक्ति भी AI की मदद से ऐसी गतिविधियां करने की कोशिश कर सकता है, जो कुछ समय पहले तक उसके लिए बेहद मुश्किल थीं।

इसी तरह जैविक विज्ञान से जुड़े AI के इस्तेमाल में भी खतरा है। साइंटिफिक रिसर्च का इस्तेमाल बीमारी की रोकथाम, दवा और वैक्सीन विकसित करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन वही जानकारी गलत हाथों में पड़ने पर किसी बीमारी पैदा करने वाले जीव को ज्यादा खतरनाक बनाने में भी इस्तेमाल हो सकती है।

चिकनगुनिया वायरस से जुड़े रिसर्च पर AI ने लगाई रोक

Anthropic की रिपोर्ट में एक खास मामले का जिक्र है। कंपनी के मुताबिक, उसके AI मॉडल Claude से वैज्ञानिक फंडिंग के लिए एक एप्लिकेशन तैयार करने में मदद मांगी गई थी। इस एप्लिकेशन में चिकनगुनिया वायरस से जुड़े गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च का प्रस्ताव था। गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च का मतलब ऐसे वैज्ञानिक प्रयोगों से है, जिनमें किसी जीव या वायरस में आनुवंशिक बदलाव करके उसके किसी गुण को बढ़ाया या बदला जाता है। इस मामले में रिसर्च का संबंध वायरस की फैलने की क्षमता और प्रतिरक्षा प्रणाली से बचने की क्षमता से था।

Image Source : India TVएंथ्रोपिक ने अपनी रिपोर्ट में AI के खतरों के प्रति आगाह किया है।

Anthropic ने इस अनुरोध को रोक दिया। कंपनी के मुताबिक, ऐसा रिसर्च बेहतर वैक्सीन और इलाज विकसित करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी जीवा या वायरस को और खतरनाक बनाने के लिए भी किया जा सकता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया कि AI की मदद से कोई जैविक हथियार बना लिया गया था। मामला ऐसे रिसर्च के लिए AI की मदद लेने की कोशिश का था, जिसे कंपनी ने संभावित रूप से खतरनाक माना और रोक दिया।

क्या AI कंपनी अपने मॉडल को पूरी तरह सुरक्षित मानती है?

Anthropic ने कहा कि उसके पुराने मॉडल, जैसे Claude Opus 4 और Claude Sonnet 4.5, इतने सक्षम नहीं थे कि वे किसी बेहद विशेषज्ञ व्यक्ति को खतरनाक जैविक शोध में महत्वपूर्ण मदद दे सकें। इसलिए उन मॉडलों पर सुरक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से ऐसी जानकारी को रोकने पर केंद्रित थी, जिससे कोई शुरुआती स्तर का व्यक्ति पहले से मौजूद जैविक हथियारों को दोहराने की कोशिश कर सके।

Image Source : India TVएंथ्रोपिक ने इस बात की जानकारी दी है कि उसने किस तरह के दुरुपयोग रोके हैं।

लेकिन अब AI मॉडल वैज्ञानिक शोध के कई जटिल कामों में ज्यादा सक्षम हो रहे हैं। इसलिए कंपनी का कहना है कि वह अब यह भरोसा नहीं दे सकती कि ऐसे मॉडल खतरनाक जैविक शोध में कोई महत्वपूर्ण मदद नहीं कर सकते। इसी वजह से Anthropic ने अपने नए और ज्यादा सक्षम मॉडल्स में जैविक शोध से जुड़े कई ऐसे सवालों पर कड़े सुरक्षा उपाय लगाए हैं, जिनका इस्तेमाल अच्छे और बुरे दोनों उद्देश्यों के लिए हो सकता है। यानी कि कंपनी भी नहीं मानती कि उसका मॉडल पूरी तरह सुरक्षित है।

सिर्फ जैविक हथियार नहीं, साइबर हमले भी चिंता की बात

Anthropic ने दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच सामने आए कई मामलों की स्टडी की। इनमें संदिग्ध गतिविधियों में स्पाइवेयर कंपनियां, राजनीतिक रूप से प्रेरित लोग और सरकार समर्थित समूह शामिल थे। कंपनी ने साइबर हमलों, निगरानी और राजनीतिक प्रचार से जुड़े मामलों को भी रिपोर्ट में शामिल किया है। हालांकि, Anthropic ने साफ किया कि ये सामान्य स्तर के दुरुपयोग के मामले नहीं थे, बल्कि अब तक सामने आए सबसे गंभीर और नए तरह के खतरे थे। कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में कुछ संदिग्ध AI प्रॉम्प्ट और दुर्भावनापूर्ण कोड के हिस्से भी शामिल किए हैं, ताकि दूसरी कंपनियां ऐसे पैटर्न को पहचान सकें।

AI से नकली सोशल मीडिया अकाउंट भी बनाए गए

रिपोर्ट में AI के जरिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रचार फैलाने का मामला भी सामने आया है। Anthropic ने ऐसे नौ मामलों की पहचान की, जिनमें सैकड़ों सोशल मीडिया अकाउंट बनाए गए। ये अकाउंट देखने में आम लोगों के अकाउंट जैसे लगते थे। इन अकाउंट से करीब एक हफ्ते तक एक ही राजनीतिक विचार को बढ़ावा देने वाली सामग्री पोस्ट की गई। ऐसे मामले रूस, ईरान, तुर्की, फारस की खाड़ी, दक्षिण एशिया, अफ्रीका और यूरोप से जुड़े पाए गए। Anthropic का कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर ऐसे अभियान को तब पकड़ती हैं, जब पोस्ट पहले ही फैल चुके होते हैं। लेकिन AI कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर इन गतिविधियों को उस समय पहचान सकती है, जब ऐसा अभियान अभी तैयार ही किया जा रहा हो।

Image Source : India TVएंथ्रोपिक ने बताया है कि AI का इस्तेमाल सियासी प्रोपेगेंडा फैलाने में भी हो रहा है।

AI कंपनियों पर खुद नियम बनाने का दबाव क्यों?

AI मॉडल जितने ज्यादा सक्षम हो रहे हैं, उतना ही यह सवाल उठ रहा है कि उनकी सीमाएं तय करने की जिम्मेदारी सिर्फ AI कंपनियों पर छोड़ी जानी चाहिए या नहीं। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर जॉन थिकस्टन ने कहा कि Anthropic और OpenAI जैसी कंपनियों के लिए यह असहज स्थिति है कि उनसे यह तय करने की उम्मीद की जा रही है कि कौन सा व्यवहार सुरक्षित है और कौन सा नहीं। उनके मुताबिक, कंपनियां समाज के बड़े स्तर पर ऐसे मूल्य-आधारित फैसले ले रही हैं, लेकिन इन फैसलों पर किसी लोकतांत्रिक या सार्वजनिक विचार-विमर्श की निगरानी नहीं है। इसी वजह से विशेषज्ञ लगातार सरकारों से AI के लिए नियम बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल कंपनियों के भरोसे न रहे।

Anthropic के अंदर भी AI सुरक्षा को लेकर चिंता

Anthropic की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब कंपनी के एक रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने इस्तीफे का ऐलान किया है। उन्होंने चिंता जताई कि Anthropic और उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनी OpenAI बेहद तेजी से ऐसी AI तकनीक की ओर बढ़ रही हैं, जो खुद को और बेहतर बनाने में सक्षम हो सकती है। कॉक्सन ने चेतावनी दी कि उनके कुछ सहयोगियों को अब डर है कि इस दशक के अंत तक AI मानव जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकता है। उनकी चिंता मूल रूप से इस बात को लेकर है कि AI की क्षमता बढ़ने के साथ इंसानों का उस पर नियंत्रण कितना प्रभावी रहेगा।

Anthropic ने कहा, 'सभी मामलों में कार्रवाई की'

कंपनी का कहना है कि रिपोर्ट में जिन भी संदिग्ध गतिविधियों की पहचान की गई, उन्हें रोक दिया गया। इन घटनाओं से मिले अनुभव का इस्तेमाल सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने में किया गया है। Anthropic ने यह जानकारी सरकारी एजेंसियों और इंडस्ट्री के दूसरे साझेदारों के साथ भी साझा की है। कंपनी का कहना है कि उसका मकसद दूसरी AI कंपनियों को ऐसे खतरों के पैटर्न पहचानने में मदद करना और सरकारों तथा समाज को यह समझाना है कि AI से जुड़े नए खतरे किस तरह सामने आ रहे हैं।

आखिर इस पूरे मामले का मतलब क्या है?

इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि AI खुद खतरनाक या सुरक्षित नहीं होता, बल्कि उसकी बढ़ती क्षमता के साथ उसके इस्तेमाल के तरीके ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वही AI वैज्ञानिकों को नई दवा और वैक्सीन बनाने में मदद कर सकता है और गलत हाथों में पड़ने पर खतरनाक रिसर्च को भी आसान बना सकता है। Anthropic ने इसलिए अपने नए मॉडलों पर सुरक्षा बढ़ाई है। लेकिन कंपनी खुद मानती है कि AI की क्षमता तेजी से बढ़ रही है और भविष्य के खतरों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होना संभव नहीं है। यही वजह है कि AI की सुरक्षा, सरकारी नियम और कंपनियों की जवाबदेही पर बहस अब और तेज होती जा रही है। (AP से इनपुट्स के साथ)

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