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CEC ज्ञानेश कुमार पर लगे हैं गंभीर आरोप, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के क्या हैं नियम?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कई तरह के गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बाद अब विपक्ष उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने जा रहा है। जानें क्या है महाभियोग प्रस्ताव, कैसे सीईसी को उनके पद से हटाया जा सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार- India TV Hindi
Image Source : PTI (FILE) मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

Highlights

  • महाभियोग प्रस्ताव क्या है
  • मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया
  • सीईसी को कैसे हटाया जा सकता है

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर आंतरिक मतभेदों की मीडिया रिपोर्टों के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश के शीर्ष चुनावी नेतृत्व पर तीखा हमला किया और कथित वोट चोरी में शामिल लोगों को साफ़ तौर पर "देशद्रोही" बताया। मीडिया रिपोर्टों से पता चला है कि दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञान कुमार के नेतृत्व में कामकाज के तरीकों और वोटर लिस्ट के डेटा मैनेजमेंट को लेकर 14 अलग-अलग मौकों पर औपचारिक रूप से लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

इस विवाद पर विपक्ष ने जल्द ही संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की बात कही है। कहा जा रहा है कि, इसके लिए कानूनी विशेषज्ञों की मदद से महाभियोग प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में नोटिस सौंपा जाएगा। ऐसे में आने वाले समय में चुनाव आयुक्त के लिए परेशानी बढ़ सकती है।

अहम होता है सीईसी का पद
बता दें कि भारत निर्वाचन आयोग में तीन चुनाव आयुक्त होते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद सबसे अहम होता है। इसके अलावा चुनाव आयोग में दो और आयुक्त हैं, और इसी वजह से किसी भी तरह का फैसला या सहमति तीनों आयुक्तों की मर्जी से ली जाती है। यानी फैसला सर्वसम्मति से ही लिया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स की जांच से सामने आई इन बातों के कारण विपक्ष ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की है। तो ऐसे में जान लेते हैं कि संसद में किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या प्रक्रिया होती है?

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

  • भारत निर्वाचन आयोग पर देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की बड़ी ज़िम्मेदारी होती है।
  • देश के राष्ट्रपति तीन सदस्यों वाली एक सिलेक्शन कमिटी की सिफारिश पर, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं।
  • इस कमिटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और केंद्रीय कैबिनेट का एक सदस्य शामिल होते हैं।
  • 2023 के कानून के अनुसार, चुनाव आयुक्त के लिए नियुक्त होने वाले लोगों के पास पहले सरकार में सेक्रेटरी-लेवल के पदों पर काम करने का अनुभव होना चाहिए। 
  • उन्हें ईमानदार होना चाहिए।
  • उन्हें चुनाव के मैनेजमेंट और संचालन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए। 
  • आयुक्तों की नियुक्तियां छह साल के कार्यकाल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती हैं।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त को वही सुविधाएं और आर्थिक लाभ मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते हैं।

सीईसी को कैसे हटाया जा सकता है?

  • संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।
  • यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) में भी कही गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, उन्हें केवल "साबित कदाचार या अक्षमता" के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
  • कदाचार में कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का गलत इस्तेमाल शामिल हो सकता है।
  • अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जब अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।
  • भारतीय निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को बहुत मुश्किल बनाया गया है।

महाभियोग प्रस्ताव लाने के बाद क्या होगा
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को कदाचार या अक्षमता का स्पष्ट आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होगा, जिसे महाभियोग प्रस्ताव कहा जाता है। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच के लिए एक जांच की जाती है। 

इसके बाद, पद से हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पास कराना होता है। एक बार प्रस्ताव पास हो जाने पर, राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश देते हैं। एक बार संवैधानिक ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद राष्ट्रपति के पास कोई विकल्प नहीं बचता, क्योंकि इस मामले में वे संसद की सलाह मानी जाती है।

कब खारिज हुआ था महाभियोग प्रस्ताव
अप्रैल में, राज्यसभा के चेयरमैन और लोकसभा के स्पीकर ने विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दोनों सदनों में पेश किए गए महाभियोग प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। इसी साल 12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने विपक्ष की अगुवाई की थी और लोकसभा वाले प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा वाले प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपाती और भेदभावपूर्ण व्यवहार करने और चुनाव में धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में बाधा डालने के आरोप लगाए गए थे।

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