आम भारतीयों की खास ट्रेन कैसे बनी वंदे भारत? दुनिया की हाई स्पीड ट्रेनों से क्यों है स्पेशल
भारतीय रेलवे का नायाब नमूना है वंदे भारत एक्सप्रेस। दुनिया की हाई स्पीड ट्रेनों को बनाने में काफी खर्च आता है, लेकिन वंदे भारत बनाने में खर्च कम आता है, जानें क्या क्या है इसकी खासियत?

अगर कहीं ट्रेन से यात्रा करनी हो तो आज भारत में ज्यादातर लोग सबसे पहले वंदे भारत को चुन रहे हैं। इसकी वजह है समय की बचत, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय रेल के मैकेनिकल इंजीनियर्स ने जब इस ट्रेन को तैयार किया था, तब इसका नाम Train 18 रखा गया और बाद में इसका नाम वंदे भारत कर दिया गया। यह भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेनों में सबसे ऊपर है और रेलवे को इससे खूब कमाई भी हो रही है। रेलवे अब अपनी इस ट्रेन वंदे भारत को विदेशी बाजार में भी निर्यात करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए ट्रेन को अलग-अलग देशों की पटरी के हिसाब से बदलना होगा। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक रेल मंत्रालय का सार्वजनिक उपक्रम RITES Ltd. विदेशी बाजारों, खास कर यूरोपीय देशों में स्टैंडर्ड-गेज प्लेटफॉर्म पर वंदे भारत ट्रेनें निर्यात करने की संभावना तलाश रहा है।
दुनिया की हाई स्पीड ट्रेनों से क्यों खास है वंदे भारत
दुनिया में चीन की शंघाई मैगलेव, फुक्सिंग, जापान की शिंकानसेन, फ्रांस की TGV, जर्मनी की ICE, दक्षिण कोरिया की KTX और इटली की Frecciarossa जैसी हाई स्पीड ट्रेनें हैं। दुनिया की ये ट्रेनें रफ्तार में तो आगे हैं लेकिन भारतीय रेलवे की वंदे भारत कई मायनों में स्पेशल है, इसकी वजह है कम लागत, आधुनिक सुविधाएं और भारतीय रेलवे के हिसाब से डिजाइन।
- चीन की शंघाई मैगलेव दुनिया की सबसे तेज ट्रेनों में गिनी जाती है, इसकी खासियत ये है कि ये मैगनेट तकनीक से चलती है और इसकी रफ्तार करीब 430 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। इसे चलाने के लिए अलग तरह का ट्रैक चाहिए और इसका निर्माण और ऑपरेशन काफी महंगा पड़ता है।
- जापान की शिंकानसेन 300 से 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, यह तेज रफ्तार के साथ सुरक्षा और समय की पाबंदी के लिए जानी जाती है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं वाले देश में भी इसके संचालन के लिए खास सुरक्षा व्यवस्था की गई है। जापान की पहली Tokaido Shinkansen को बनाने में उस समय करीब 380 अरब येन खर्च हुए थे। आज इसकी लागत करीब 1.8 ट्रिलियन येन यानी लगभग ₹10 हजार करोड़ से ज्यादा है।
- फ्रांस की TGV यूरोप की हाई-स्पीड ट्रेनों में से एक है और यह करीब 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है। फ्रांस की पहली TGV लाइन (पेरिस-लियोन) को बनाने में करीब 18 अरब फ्रैंक, यानी उस समय लगभग ₹2,700 करोड़ खर्च हुए थे।
- जर्मनी की ICE ट्रेन करीब 300 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार पकड़ सकती है। इस ट्रेन में यात्रियों के आराम के साथ आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। इस ट्रेन के एक सेट को बनाने की लागत करीब 25 मिलियन यूरो यानी लगभग ₹250 करोड़ थी।
- दक्षिण कोरिया की KTX ट्रेन करीब 305 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है। KTX ट्रेन के एक नए 16-कोच ट्रेन सेट की लागत करीब ₹600 करोड़ के आसपास है।
- इटली की Frecciarossa हाई-स्पीड ट्रेन करीब 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है। इस एक ट्रेन सेट की शुरुआती लागत करीब €30.8 मिलियन यानी लगभग ₹300 करोड़ थी।
- अब बात करते हैं भारतीय रेलवे के नायाब नमूने वंदे भारत की, तो इस एक 16 कोच वाली ट्रेन बनाने में करीब ₹110–130 करोड़ खर्च ही आता है।
अब जान लीजिए वंदे भारत की खासियत
- यह ट्रेन 0 से 100 किमी/घंटा की गति मात्र 52 सेकंड में पकड़ सकती है और इसकी अधिकतम परिचालन गति 160 किमी/घंटा तक है।
- दुर्घटनाओं से बचाव और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के लिए यह स्वदेशी 'कवच' (KAVACH) प्रणाली से लैस है।
- एग्जीक्यूटिव क्लास में 180 डिग्री तक घूमने वाली (Rotating) चेयर कार सीटें दी गई हैं, जिन्हें दिशा के अनुसार घुमाया जा सकता है।
- इसमें मेट्रो की तरह स्वचालित प्लग दरवाजे (Automatic Plug Doors) और यात्रियों की जानकारी के लिए जीपीएस-आधारित सूचना प्रणाली है।
- स्वच्छता और आधुनिकता को ध्यान में रखते हुए सेंसर-आधारित और टच-फ्री सुविधाओं वाले बायो-वैक्यूम टॉयलेट बनाए गए हैं।
- हर कोच में आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे, आपातकालीन खिड़कियां और टॉक-बैक यूनिट्स मौजूद हैं।
- यात्रियों के लिए गर्म खाने व ठंडे पेय पदार्थों के प्रबंध के साथ मिनी पेंट्री की सुविधा उपलब्ध है।
भारतीय रेलवे की यह सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन सिर्फ़ एक शानदार तकनीकी नमूने का ही उदाहरण नहीं है, बल्कि यह यात्री रेल संचालन के लिए रेलवे के लिए कमाई का एक बड़ा ज़रिया बन गई है। देखने में बेहतर बनाने और तेज़ी से रफ़्तार पकड़ने की खूबियों से कहीं आगे, पूरे देश में इसके तेज़ी से विस्तार के पीछे एक मज़बूत आर्थिक सच्चाई है। कुल मिलाकर कहें तो वंदे भारत रेल नेटवर्क के लिए मुनाफ़ा कमाने वाली एक अहम ट्रेन बन गई है।
यात्रियों की बढ़ती मांग और ट्रेनों की संख्या
- 2025–26 फाइनेंशियल ईयर में कुल यात्री संख्या दर्ज की गई, जो FY25 के 2.97 करोड़ से 34% ज़्यादा है।
- 2019 में नई दिल्ली–वाराणसी के बीच पहली सर्विस शुरू होने के बाद से लगभग 1,00,000 ट्रिप में यात्रियों ने सफ़र किया।
- यह ट्रेन देश भर के लगभग 270 ज़िलों को जोड़ती हैं।
- इन सेमी-हाई-स्पीड रूट का फाइनेंशियल परफॉर्मेंस दिखाता है कि लोग कम समय में सफ़र करने और आधुनिक सुविधाओं के लिए ज़्यादा किराया देने को तैयार हैं।
- वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के आने से यह फ़ायदेमंद मॉडल लंबी दूरी और रात भर के सफ़र तक के लिए आगे बढ़ गया है।
2030 तक सैकड़ों ट्रेनें पटरी पर दौड़ेंगी
2030 तक 800 से ज़्यादा वंदे भारत ट्रेनसेट लाने की लंबी अवधि की योजनाओं के साथ, यह नेटवर्क आर्थिक रूप से टिकाऊ और तेज़ रफ़्तार यात्री इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक स्थायी बदलाव को दर्शाता है।
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