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Explainer: डूबने के बाद कैसे बचेगी मालदीव जैसे देशों की पहचान? क्या मिट जाएगा इनका नामोनिशान? समझें पूरी बात

जलवायु परिवर्तन के कारण छोटे द्वीप राष्ट्रों, जैसे तुवालु और मालदीव, के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। इन देशों ने अपनी पहचान बचाने के लिए डिजिटल समाधान, संधियों और इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स को अपनाया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में इस बात को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि अगर द्वीप डूब जाएं तो क्या होगा।

जलवायु परिवर्तन के...- India TV Hindi
Image Source : PIXABAY REPRESENTATIONAL जलवायु परिवर्तन के चलते कई देशों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है।

नॉर्विच: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का खतरा छोटे द्वीप राष्ट्रों जैसे तुवालु, किरिबाती, मालदीव और मार्शल आइलैंड्स के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है। बढ़ता समुद्री जलस्तर, तेज तूफान, पीने के पानी की कमी और बुनियादी ढांचे को नुकसान इन देशों को रहने लायक नहीं छोड़ रहे। कुछ द्वीपों के सामने तो पूरी तरह डूब जाने या खाली होने का खतरा है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है: अगर इन देशों की जमीन ही खत्म हो जाए, तो क्या ये कानूनी तौर पर 'राष्ट्र' या 'देश' के तौर पर बने रहेंगे?

आखिर क्यों अहम है यह सवाल?

द्वीपों पर बसे इन देशों के लिए कानूनी दर्जा (Legal Status) बेहद जरूरी है। अगर ये देश अपनी जमीन खो देते हैं, तो वहां के लोग न सिर्फ अपने घर और रोजगार खोएंगे, बल्कि अपनी संस्कृति, पहचान और कम्युनिटी को भी गंवा देंगे। साथ ही, इन देशों को समुद्र में मौजूद कीमती प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अपनी जगह भी खोनी पड़ सकती है। इसीलिए ये राष्ट्र अपनी पहचान और हक को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।

आने वाले खतरे से यूं निपट रहा तुवालु

तुवालु नाम का छोटा से देश ने इस खतरे से निपटने के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ एक ऐतिहासिक संधि की है। इस संधि में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और समुद्री जलस्तर बढ़ने के बावजूद तुवालु का राष्ट्र के तौर पर दर्जा और संप्रभुता बरकरार रहेगी। ऑस्ट्रेलिया ने यह भी वादा किया है कि वह तुवालु के उन नागरिकों को अपने यहां बसने की इजाजत देगा जो सुरक्षित जमीन पर नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं।

Image Source : Pixabay Representationalतुवालु ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए डिजिटल समाधान का रास्ता खोजा है।

तुवालु ने एक और अनोखा कदम उठाया है। वह खुद को डिजिटल दुनिया में ले जा रहा है। तुवालु ने अपनी सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन कर दिया है और अपनी जमीन, संस्कृति और इतिहास को डिजिटल रूप में संरक्षित या आर्काइव कर रहा है। इसका मकसद है कि अगर समुद्र उनकी जमीन को निगल ले और लोग देश छोड़ने को मजबूर हों, तब भी तुवालु एक 'डिजिटल राष्ट्र' के रूप में जिंदा रहे। तुवालु का कहना है कि वह दुनिया का पहला डिजिटल राष्ट्र बनेगा।

मालदीव ने इंजीनियरिंग में खोजा हल

मालदीव जैसे देश इंजीनियरिंग के जरिए इस समस्या से लड़ रहे हैं। वे अपने द्वीपों की ऊंचाई को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि समुद्र के बढ़ते जलस्तर का मुकाबला किया जा सके। इसके अलावा, 'राइजिंग नेशंस इनिशिएटिव' जैसी कोशिशें प्रशांत महासागर के द्वीप राष्ट्रों की संप्रभुता को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। 

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, एक राष्ट्र के लिए 4 चीजें जरूरी हैं: आबादी, जमीन, स्वतंत्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने की क्षमता। अगर जलवायु परिवर्तन की वजह से ये द्वीप डूब जाते हैं, तो आबादी और जमीन दोनों खत्म हो जाएंगे। सरकार भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगी। ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या ये देश कानूनी तौर पर 'राष्ट्र' बने रहेंगे?

Image Source : Pixabay Representationalमालदीव खुद को इंजीनियरिंग के दम पर बचाने की कोशिश कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय कानून में पहले से यह प्रावधान है कि एक बार राष्ट्र बनने के बाद, अगर उसका कोई एक हिस्सा कमजोर भी हो जाए, तो वह राष्ट्र का दर्जा नहीं खोता। जैसे, सोमालिया और यमन जैसे 'विफल देश' आज भी राष्ट्र माने जाते हैं, भले ही उनकी सरकार प्रभावी न हो। लेकिन डूबते द्वीपों का मामला अलग है, क्योंकि यहां सारी जरूरी चीजें जैसे कि जमीन, आबादी, सरकार और अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थायी रूप से (Permanently) खत्म हो सकते हैं।

क्या है अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख?

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी राय दी। इसमें उसने माना कि जलवायु परिवर्तन छोटे द्वीपों और तटीय देशों के लिए खतरा है। लेकिन इस सवाल पर कि क्या डूबते द्वीप राष्ट्र बने रहेंगे, ICJ ने सिर्फ इतना कहा: 'एक बार राष्ट्र बनने के बाद, उसके किसी एक हिस्से के गायब होने से जरूरी नहीं कि उसका राष्ट्र का दर्जा खत्म हो जाए।' यह बयान थोड़ा साफ नहीं है। कुछ जजों ने इसे इस तरह समझा कि अंतरराष्ट्रीय कानून में लचीलापन है और डूबते द्वीपों को भी राष्ट्र माना जा सकता है। लेकिन ICJ ने यह साफ नहीं किया कि अगर सारी जमीन, आबादी और सरकार खत्म हो जाए, तब भी क्या ये देश राष्ट्र बने रहेंगे। इस अनिश्चितता की वजह से कई देशों को वह साफ जवाब नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

आखिर क्या होगा इन डूबते देशों का?

डूबते द्वीप देश अपनी पहचान, संस्कृति और संप्रभुता को बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल समाधान, इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट और अंतरराष्ट्रीय संधियां इस दिशा में बड़े कदम हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में अभी इस सवाल का साफ जवाब नहीं है कि अगर ये द्वीप पूरी तरह समुद्र में समा जाएं, तो इनका कानूनी दर्जा क्या होगा। इन देशों का भविष्य अभी अनिश्चित है, लेकिन अपने अस्तित्व को बचाए रखने की उनकी कोशिशें लगातार जारी हैं। (PTI-The Conversation)