सालों की जंग, अरबों के हथियार और हवाई हमले भी बेअसर; आखिर इतने ताकतवर कैसे हुए हूती?
यमन के हूती विद्रोही वर्षों के युद्ध और बड़े पैमाने पर हवाई हमलों के बावजूद मजबूत बने हुए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर सालों तक झटके झेलने के बाद आज भी वे सऊदी अरब जैसे देश को परेशान करने की हालत में कैसे हैं? आइए, समझते हैं।

Highlights
- एक दशक के हवाई हमलों के बावजूद हूतियों की सैन्य और लड़ाकू क्षमता लगातार बढ़ती गई।
- ईरानी मदद, पहाड़ी इलाका और विरोधियों की कमजोरी हूतियों की ताकत के अहम कारण हैं।
- बाब-अल-मंदेब पर बढ़त से यमन का संघर्ष अब वैश्विक व्यापार के लिए भी बड़ा खतरा बना।
Houthi Rebels Vs Saudi Arabia: यमन के हूती विद्रोही पिछले करीब एक दशक से लगातार युद्ध और हवाई हमलों का सामना कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी ताकत कम होने के बजाय बढ़ती गई। सऊदी अरब, UAE, अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल अलग-अलग समय पर हूतियों के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले कर चुके हैं। फिर भी आज हूती एक अहम समुद्री रास्ते के करीब आगे बढ़ रहे हैं और सऊदी अरब की तेल सुविधाओं को निशाना बना रहे हैं। सवाल है कि आखिर इतने हमलों के बाद भी हूती कमजोर क्यों नहीं हुए? आइए, समझने की कोशिश करते हैं।
पहाड़ी इलाके का मिला बड़ा फायदा
हूतियों के कब्जे वाला इलाका काफी बड़ा और पहाड़ी है। ऐसे भूगोल में लड़ाकों और सैन्य ठिकानों को अलग-अलग जगहों पर फैलाना आसान होता है। इससे किसी एक बड़े हवाई हमले में उनके पूरे सैन्य ढांचे को तबाह करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा हूती ऐसे हथियार इस्तेमाल करते हैं, जिनसे वे सऊदी अरब की सीमा के पार तेल और दूसरी महत्वपूर्ण सुविधाओं को निशाना बना सकते हैं। वे समुद्र में तेल टैंकरों और दूसरे जहाजों के लिए भी खतरा पैदा कर सकते हैं।
ईरान से मिला हथियार और तकनीक का सहारा
हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और ड्रोन की बड़ी संख्या है। इनमें से कई हथियार ईरानी मॉडलों से मिलते-जुलते हैं। इनकी पहुंच खाड़ी के देशों के साथ-साथ इजरायल तक है। हूतियों ने लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाने के लिए उन्नत एंटी-शिप मिसाइलों और समुद्री ड्रोन का भी इस्तेमाल किया है। इससे दुनिया के एक महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री रास्ते पर खतरा पैदा हुआ है। ईरान हूतियों को हथियार देने से इनकार करता है, क्योंकि ऐसा करना संयुक्त राष्ट्र के हथियार प्रतिबंध का उल्लंघन होगा। हालांकि, यमन जा रहे कई जहाजों से तस्करी के जरिए भेजे गए ईरानी हथियार और उनके हिस्से जब्त किए जा चुके हैं। 2024 की संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट में भी हूतियों, ईरान और ईरान के दूसरे सहयोगियों के बीच व्यापक सैन्य संबंधों का जिक्र किया गया था।
30 हजार से 3.5 लाख तक हुई लड़ाकों की संख्या
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, हूतियों ने करीब 3.5 लाख लड़ाकों की भर्ती कर ली थी। 2015 में यह संख्या लगभग 30 हजार थी। यानी करीब एक दशक में उनके लड़ाकुओं की संख्या में कई गुना ज्यादा इजाफा हुआ है। माना जाता है कि हूतियों को ईरान से अत्याधुनिक तकनीक और अन्य तमाम तरह की मदद मिलती रही है, लेकिन वे अपने हथियारों का काफी हिस्सा यमन में ही तैयार करने में सक्षम हैं। यही वजह है कि कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों से वे बड़े और महंगे सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।
सऊदी अरब के आधुनिक हथियार भी हुए नाकाम
सऊदी अरब के पास अमेरिका से मिले अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं। हाल के युद्ध के दौरान इनका इस्तेमाल ईरान से आने वाले हमलों के खिलाफ भी किया गया। लेकिन महंगे और आधुनिक इंटरसेप्टर मिसाइलों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि सऊदी अरब कब तक हूतियों के हमलों के साथ-साथ इराक में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया के संभावित हमलों को रोक पाएगा। इन मिलिशिया पर एक ऐसे हमले का आरोप है, जिससे तेल निर्यात के लिए महत्वपूर्ण पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन बंद हो गई थी।
2015 से सऊदी अरब से लड़ रहे हैं हूती विद्रोही
2015 की शुरुआत में सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ युद्ध शुरू किया। इससे पहले हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना समेत देश के उत्तरी और मध्य हिस्सों के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था। सऊदी अरब को डर था कि उसकी सीमा के ठीक पास ईरान का एक मजबूत और हथियारों से लैस सहयोगी खड़ा हो रहा है। इसके बाद करीब 7 साल तक सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ लगातार हवाई हमले किए। इन हमलों में बड़ी संख्या में आम नागरिकों के मारे जाने की खबरें भी सामने आईं। हूतियों को पीछे धकेलने के लिए यमन सरकार के समर्थक सैनिकों और दक्षिणी अलगाववादियों ने भी लड़ाई लड़ी, लेकिन मोर्चे में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया। आखिरकार 2022 में युद्धविराम हुआ।
गाजा युद्ध के बाद लाल सागर में बढ़े हमले
2023 में गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद हूतियों ने लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। हूतियों ने इसे इजरायल की नाकाबंदी के तौर पर पेश किया। इसके जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन ने जनवरी 2024 से हूतियों के खिलाफ लगातार हवाई हमले शुरू किए। इसके अगले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ हवाई अभियान और तेज करने का आदेश दिया। उस समय अमेरिकी सेना के एक अधिकारी ने बताया था कि हजार से ज्यादा ठिकानों पर करीब 2 हजार हथियार गिराए गए। सिर्फ अमेरिकी हथियारों की कीमत ही 75 करोड़ डॉलर से ज्यादा बताई गई। इसके बावजूद हूतियों ने अमेरिका के 7 MQ-9 रीपर ड्रोन मार गिराए। हर ड्रोन की कीमत 3 करोड़ डॉलर से ज्यादा बताई गई। इसके अलावा 6 करोड़ डॉलर से ज्यादा कीमत वाला एक F/A-18 लड़ाकू विमान भी एयरक्राफ्ट कैरियर से फिसलकर समुद्र में चला गया।
अमेरिकी हमले रुके, इजरायल पर हमले जारी रहे
कई हफ्तों के अमेरिकी हमलों के बाद हूतियों ने अमेरिकी जहाजों पर हमले रोकने पर सहमति जताई। हालांकि, उन्होंने इजरायल को निशाना बनाना जारी रखा। इजरायल ने 2025 में हूतियों के खिलाफ जवाबी हमले किए। इन हमलों में हूती प्रधानमंत्री समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई और एक महत्वपूर्ण बंदरगाह को भी बार-बार निशाना बनाया गया। ईरान के साथ चल रहे युद्ध के शुरुआती महीनों में हूती बड़े पैमाने पर इससे दूर रहे। लेकिन जुलाई में उन्होंने सऊदी अरब पर फिर हमले शुरू कर दिए और सऊदी जहाजों की नाकाबंदी का ऐलान कर दिया।
सिर्फ हवाई हमलों से हूतियों को हराना मुश्किल क्यों?
यमन का मामला इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि किसी भी संगठन को पूरी तरह हराने के लिए सिर्फ हवाई हमले पर्याप्त नहीं होते। हाल के कई युद्धों ने दिखाया है कि हमले के बाद जमीन पर सैनिकों का आगे बढ़कर इलाके पर कब्जा करना जरूरी होता है। लेकिन हूतियों के खिलाफ लड़ने वाले यमनी गुट खुद बंटे हुए हैं। इनमें सऊदी अरब समर्थित यमन सरकार के सैनिक और यूएई समर्थित दक्षिणी अलगाववादी शामिल हैं। यूएई कभी सऊदी अरब का साझेदार रहा है, लेकिन वह 2019 में यमन से बाहर निकल गया था। इन गुटों के बीच जनवरी में भी लड़ाई हुई थी।
एक्सपर्ट ने हूतियों की ताकत के बारे में क्या बताया?
यमन एवं ईरान के एक्सपर्ट और यूनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के प्रोफेसर थॉमस जूनो के मुताबिक, हूतियों की ताकत की कहानी का केवल आधा हिस्सा ईरान की मदद है। दूसरा आधा हिस्सा उनके विरोधियों की कमजोरी है। उन्होंने कहा कि ईरान का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरी तरफ उनके विरोधियों की कमजोरी भी उतनी ही अहम है। जूनो के मुताबिक, यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार बंटी हुई, कमजोर, असंगठित और भ्रष्ट है और हूतियों ने लगातार इस स्थिति का फायदा उठाया है।
ईरान ने हूतियों को कितनी तेजी से मजबूत किया?
रणनीतिक विशेषज्ञ माइकल नाइट्स, जिन्होंने हूतियों पर काफी काम किया है और अब न्यूयॉर्क की रणनीतिक सलाहकार संस्था होराइजन एंगेज में शोध प्रमुख हैं, के मुताबिक हूती ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों में सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध और आक्रामक गुटों में हैं। उन्होंने कहा कि ईरान ने हूतियों को बहुत तेजी से विकसित किया है। उनके मुताबिक,
'जिन क्षमताओं को विकसित करने में लेबनान के हिजबुल्लाह को 20 साल लगे, हूतियों ने उनमें से कई क्षमताएं 5 साल में विकसित कर लीं।'
बाब-अल-मंदेब पर बढ़ रहा हूतियों का दबाव
हाल के हफ्तों में हूती विरोधी गुटों को एक के बाद एक मोर्चों से पीछे हटना पड़ा है। हूती अब बाब-अल-मंदेब की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। यह रास्ता वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अगर यहां समुद्री यातायात बाधित होता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल बाजारों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि हूतियों की गतिविधियां अब केवल यमन का घरेलू मुद्दा नहीं रह गई हैं।
सऊदी अरब जमीन पर उतरने से क्यों बच रहा?
सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ एक और पूर्ण युद्ध में उतरने को लेकर सतर्क दिखाई देता है। जमीनी अभियान का मतलब लंबे समय तक लड़ाई और बड़ी संख्या में सैनिकों के हताहत होने का खतरा है। अमेरिका भी ईरान के साथ अपने संघर्ष में उलझा हुआ है और यमन में बड़े पैमाने पर जमीनी कार्रवाई से दूर रहना चाहता है। सऊदी अरब ने पिछले महीने तुर्की और पाकिस्तान के साथ आपसी रक्षा समझौता भी किया है, लेकिन अभी तक इसे सक्रिय नहीं किया गया है। इसके बाद ये भी सवाल उठने लगे थे कि क्या पाकिस्तान-सऊदी और तुर्की के डिफेंस पैक्ट की हवा निकल गई है?
कूटनीति का रास्ता भी आसान क्यों नहीं?
हूतियों की मांग है कि सऊदी अरब यमन की नाकाबंदी हटाए। लेकिन सऊदी अरब के लिए ऐसा करना लंबे समय से चले आ रहे युद्ध में हार स्वीकार करने जैसा माना जा सकता है। इसके साथ ही इससे हूतियों को ईरान से और ज्यादा मदद मिलने का रास्ता भी खुल सकता है। प्रोफेसर थॉमस जूनो का कहना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच तनाव खत्म नहीं होता, तब तक सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों में बड़ी प्रगति की संभावना सीमित रहेगी। उन्होंने कहा कि हूती इस समय किसी समझौते के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं और वे अपनी मांगों से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
तो आखिर हूतियों को रोकना इतना मुश्किल क्यों है?
सीधी भाषा में समझें तो हूतियों की ताकत एक नहीं, कई वजहों का नतीजा है। उनके पास पहाड़ी और बड़ा इलाका है, लड़ाकों की संख्या काफी बढ़ चुकी है, मिसाइल और ड्रोन जैसे हथियार हैं, ईरान से तकनीकी और सैन्य मदद मिलने की बात कही जाती है और वे हथियारों का एक हिस्सा खुद भी बना सकते हैं। दूसरी तरफ उनके विरोधी गुट बंटे हुए हैं और यमन की सरकार कमजोर है। ऐसे में सिर्फ हवाई हमलों से हूतियों की सैन्य क्षमता को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल साबित हुआ है। (AP से इनपुट्स के साथ)
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