PHOTOS: दुश्मन की नींद उड़ाएंगे भारत के नए ड्रोन! HAPS, 'तांडव' और AI से बदलेगा युद्ध का अंदाज

भारत आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए ड्रोन और AI तकनीक को मजबूत कर रहा है। HAPS जैसे सोलर ड्रोन ऊंचाई पर लंबे समय तक निगरानी कर सकते हैं, जबकि 'तांडव' जैसे समुद्री प्लेटफॉर्म पानी के अंदर निगरानी और सैन्य अभियानों में उपयोगी हो सकते हैं।

ड्रोन वॉरफेयर की बदलती चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना में आधुनिक ड्रोन तकनीक को शामिल करने की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ रही है। इसी कड़ी में हाई-ऑल्टिट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट (HAPS) या सोलर-पावर्ड UAV जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। यह UAV करीब 20,000 मीटर यानी 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरने के लिए डिजाइन किया जाता है। इतनी ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने की क्षमता इसे निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बना सकती है। इसकी मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने, सीमावर्ती इलाकों की निगरानी करने और सैन्य ठिकानों की स्थिति से जुड़ी अहम जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। सोलर पावर से संचालित होने के कारण ऐसे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता भी रखते हैं। ड्रोन वॉरफेयर के इस दौर में HAPS तकनीक भारत की निगरानी क्षमताओं को नई दिशा दे सकती है।
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ड्रोन वॉरफेयर की बदलती चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना में आधुनिक ड्रोन तकनीक को शामिल करने की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ रही है। इसी कड़ी में हाई-ऑल्टिट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट (HAPS) या सोलर-पावर्ड UAV जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। यह UAV करीब 20,000 मीटर यानी 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरने के लिए डिजाइन किया जाता है। इतनी ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने की क्षमता इसे निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बना सकती है। इसकी मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने, सीमावर्ती इलाकों की निगरानी करने और सैन्य ठिकानों की स्थिति से जुड़ी अहम जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। सोलर पावर से संचालित होने के कारण ऐसे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता भी रखते हैं। ड्रोन वॉरफेयर के इस दौर में HAPS तकनीक भारत की निगरानी क्षमताओं को नई दिशा दे सकती है।
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अब तक आपने कैमिकाजी ड्रोन के बारे में सुना होगा, लेकिन अब भारतीय सेना और नौसेना के लिए समुद्र में इस्तेमाल होने वाली कैमिकाजी बोट और अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म जैसी नई तकनीकों पर भी काम किया जा रहा है। इन प्लेटफॉर्म्स के ट्रायल किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसमें एक बोट ऐसी है, जो पानी के अंदर रहकर निगरानी कर सकती है। इसमें 360 डिग्री कैमरा होने की बात कही जा रही है। यह कई दिनों तक पानी के अंदर रहकर सर्विलांस करने में सक्षम होने के लिए डिजाइन की गई है, जबकि इसका कैमरा पानी की सतह के ऊपर रहकर आस-पास की गतिविधियों पर नजर रख सकता है।
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इसके अलावा, एक मिनी सबमरीन जैसा प्लेटफॉर्म भी है,जिसकी बनावट टॉर्पेडो जैसी दिखाई देती है। ऐसे अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म समुद्री निगरानी और सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इन तकनीकों का नाम 'तांडव' है। भारतीय सेना और नौसेना के लिए इनकी उपयोगिता और संभावित तैनाती को लेकर ट्रायल की जानकारी सामने आई है।
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भारतीय नौसेना भविष्य के युद्धों की चुनौतियों को देखते हुए अपने युवा अधिकारियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन और आधुनिक तकनीक से लैस करने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में इंडियन नेवल एकेडमी में कैडेट्स को ट्रेनिंग के दौरान ही AI और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करने के अवसर देने की तैयारी की गई है। इसका उद्देश्य है कि कैडेट्स अधिकारी बनने से पहले ही नई तकनीकों को समझें और अपने ड्रोन, AI आधारित सिस्टम एवं स्वदेशी तकनीकी समाधान विकसित करने की क्षमता हासिल कर सकें।
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नौसेना का यह दृष्टिकोण भविष्य के युद्धक्षेत्र में तकनीक की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है, जहां केवल पारंपरिक सैन्य प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि नवाचार, ऑटोमेशन और स्वदेशी तकनीक का विकास भी महत्वपूर्ण होगा। यानी अब नौसेना के युवा कैडेट्स सिर्फ युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग नहीं लेंगे, बल्कि भविष्य के युद्ध में इस्तेमाल होने वाली तकनीक विकसित करने की दिशा में भी काम करेंगे।
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आधुनिक युद्ध में दुश्मन को चकमा देना यानी डिसेप्शन बेहद अहम हो गया है। युद्धक्षेत्र में दुश्मन के लिए यह पहचानना मुश्किल बनाना है कि आसमान में दिखाई देने वाला ऑब्जेक्ट कोई लड़ाकू विमान है, ड्रोन है या फिर कोई दूसरा प्लेटफॉर्म, सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी तरह की आधुनिक युद्ध जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना और वायुसेना में 'शक्ति' और 'अभय' नाम के ड्रोन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनका उपयोग टारगेट प्रैक्टिस, हथियार प्रणालियों के परीक्षण और प्रशिक्षण जैसी भूमिकाओं में किया जा सकता है।
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टारगेट ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन के विमान या ड्रोन जैसे लक्ष्यों का अनुकरण करने के लिए किया जाता है, ताकि वायु रक्षा प्रणालियों और सैनिकों की प्रतिक्रिया क्षमता को परखा जा सके। दूसरी ओर, विस्फोटक ले जाने वाले कामिकाजी ड्रोन का उद्देश्य लक्ष्य पर हमला करना होता है। कुछ मानवरहित प्लेटफॉर्म निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किए जाते हैं। मॉडर्न वॉरफेयर में अब मुकाबला सिर्फ हथियारों की ताकत का नहीं, बल्कि दुश्मन की पहचान प्रणाली को भ्रमित करने और सही समय पर सही प्रतिक्रिया देने की क्षमता का भी है।
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आधुनिक युद्ध में ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम और फॉरवर्ड कामिकाजी ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज के लिए इन तकनीकों की तैयारी और क्षमताओं को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि ऑपरेशन सिंदूर जैसे हालात में उभरती चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। इस तैयारी में दुश्मन के ड्रोन की पहचान और उन्हें निष्क्रिय करने वाली एंटी-ड्रोन तकनीक के साथ-साथ फॉरवर्ड ऑपरेशंस में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन प्लेटफॉर्म भी अहम हैं। इनका उद्देश्य सैनिकों की निगरानी क्षमता बढ़ाना, ऑपरेशनल परिस्थितियों की बेहतर जानकारी हासिल करना और बदलते युद्धक्षेत्र में तकनीकी बढ़त हासिल करना है।
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इस क्षेत्र में Zulu Technologies ड्रोन तकनीक पर काम कर रही है और अलग-अलग प्रकार के ड्रोन प्लेटफॉर्म विकसित करने पर ध्यान दे रही है। आधुनिक युद्ध में अब सिर्फ सैनिकों और हथियारों की ताकत ही नहीं, बल्कि ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल भी ऑपरेशनल सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक के बीच भारतीय सेना की तैयारी साफ संकेत देती है कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन टेक्नोलॉजी और काउंटर-ड्रोन क्षमता की भूमिका और महत्वपूर्ण होगी।