उत्तर प्रदेश भारतीय राजनीति की धुरी माना जाता है और यहां विधानसभा चुनाव भी किसी लोकसभा चुनाव से कम नहीं माना जाता। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की अधिसूचना अब कभी भी जारी हो सकती है और इसीलिये बीजेपी और कांग्रेस की रैलियों का दौर भी शुरु हो चुका है। केंद्र में ज़बकदस्त जीत के साथ सत्ता पर काबिज़ बीजेपी इस सियासी बिसात पर एक शक्तिशाली मोहरा माना जा रहा है और ख़बरे हैं कि इस मोहरे को पीटने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ सकते हैं। पिछले कई हफ्तों से दोनों पार्टियों के बीच चुनावी गठबंधन को लेकर बातचीत चलती रही है जो अब आख़िरी दौर में है।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद और राज बब्बर नेता जी यानी समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ कई बार बैठक कर चुके हैं। ज़ाहिर है इन दोनों पार्टियों के बीच चुनावी तालमेल से राजनीतिक खेल पर बड़ा असर पड़ेगा।
दरअसल इस गठबंधन के बीच दोनों पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं के बीच ग़लतफहमियां सबसे बड़ा रोड़ा है जिसे ख़त्म करके ही गठबंधन संभव हो सकता है। माना जाता है कि मुलायम सिंह यादव कांग्रेस को शक़ की नज़र से देखते हैं। उनके शक़ की वजह भी है। राज्य में सबसे पुरानी पार्टी के पुनर्जन्म से उन्हें डर लगता है। डर जायज़ भी है। समाजवादी पार्टी ने वर्षों के प्रयास के बाद कांग्रेस को राज्य में हाशिए पर लाकर खुद को मुख्य 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टी के रूप में स्थापित किया है। ऐसे में मुलायम सिंह यादव का मानना है कि कांग्रेस पार्टी के पुनरुद्धार राज्य में अल्पसंख्यक वोटों को आकर्षित करेगा जो फिलहाल उनकी पार्टी के साथ माने जाते हैं।
दूसरी तरफ कांग्रेस नेतृत्व भी अतीत में सपा प्रमुख की गलतफहमियों का शिकार हुआ है। राहुल गांधी को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक रिश्ता रखने में कोई गुरेज़ नही है लेकिन सपा प्रमुख के साथ वह काफी असहज महसूस करते हैं। राहुल और अखिलेश परस्पर एक दूसरे की सार्वजनिक रुप से तारीफ भी कर चुके हैं।
दोनों पार्टियों के बीच संदेह और अविश्वास का पुराना इतिहास है। 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी सपा प्रमुख के साथ गठबंधन की कोशिश की थी जो सफल नही हो पाई थी। राजीव गांधी से मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में गठबंधन की घोषणा करने का वादा किया था लेकिन अगली सुबह दिल्ली से लखनऊ रवाना हो गए और विधानसभा भंग कर अपने दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी जिससे कांग्रेस काफी नाराज़ हुई थी।
इतिहास गवाह है दोनों पार्टियों के बीच जब भी गठबंधन पर बात हुई वह केवल बीजेपी को राज्य में सत्ता से दूर रखने के लिए की गई है। दोनों पार्टियों में गठबंधन होने से समाजवादी के अल्पसंख्यक वोटों के बंटने का डर खत्म हो जाएगा साथ ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को भी राज्य में फिर से जीवनदान मिल जाएगा।
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य में 42 फीसदी वोट के साथ 71 सीटें जीती थी जबकि सपा 22.2 फीसदी वोट के साथ 5 सीट जीत पाई थी और कांग्रेस 7.5 फीसदी वोट शेयर के साथ 2 ही लोकसभा सीट जीत सकी थी।
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