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BLOG: सर्वहारा से सर्वेसर्वा बने केजरीवाल की उल्टी गिनती शुरू!

दिल्ली...साल 2015...जब विधानसभा चुनावों के रुझान आ रहे थे कइयों को आंखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था। जब नतीजे आए...कांग्रेस साफ़, बीजेपी तीन और जुम्मा जुम्मा बनी आम आदमी पार्टी 67 सीटों पर विजयी घोषित हुई। एक नई तरह की राजनीति का उदय जिसमें लोकलुभावन स्वप

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दिल्ली...साल 2015...जब विधानसभा चुनावों के रुझान आ रहे थे कइयों को आंखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था। जब नतीजे आए...कांग्रेस साफ़, बीजेपी तीन और जुम्मा जुम्मा बनी आम आदमी पार्टी 67 सीटों पर विजयी घोषित हुई। एक नई तरह की राजनीति का उदय जिसमें लोकलुभावन स्वप्न थे। स्वच्छ, पारदर्शी और आमजन के सरोकार की हिमायती पार्टी।

दिल्ली के जनादेश ने बता दिया था कि सत्ता के सिरमौर को धूल चटाने के लिए एक चुनाव ही काफी है। अब आइये 2017 एमसीडी चुनाव के नतीजो को देखें। पूर्वी,दक्षिणी और उत्तरी दिल्ली तीनों में बीजेपी ने विजय पताका लहराई और आप के लोकप्रियता का गुब्बारा फूट गया।

आम आदमी पार्टी 270 वार्डों में केवल 48 पर सिमट गयी।यदि नतीजों को विधानसभा चुनाव में बदलें तो 'आप' आज की तारीख़ में केवल 12-13 सीटों पर सिमट जाती। इन परिणामों का सीधा अर्थ है कि अरविन्द केजरीवाल और आप ने अपनी चमक खो दी है। केजरीवाल जिस अलटेर्नेटिव पॉलिटिक्स की बात करते थे उसने उन आम लोगों को भी अपने साथ जोड़ लिया था जो राजनीति में आना तो दूर इसमें दिलचस्पी भी नहीं रखते थे। लोगों ने अपनी नौकरियां छोड़ी....घर का पैसा पार्टी फण्ड बना दिया...आम कार्यकर्ता बन घर-घर प्रचार में लग गए।

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लोगों को लगा पहली बार एक चेहरा सर्वहारा की राजनीति करने आया है। आशावाद की ऐसी पौध तैयार हुई जिससे सत्ता ने राउंड द क्लॉक टर्न लिया। लोग कांग्रेस को भूले, बीजेपी को किनारे किया, आप की सरकार बनी और यहीं से धरना पॉलिटिक्स की शुरुआत हुई।

पांच महीने के भीतर ही धरना पॉलिटिक्स को लेकर सवाल उठे, फिर सोमनाथ भारती विवाद, डिग्री विवाद न जाने कौन कौन से विवाद पीछे लग गए। 2 साल में दाग़ी चेहरों ने आम लोगों की उम्मीद को डिगाया। सोने पर सुहागा यह की कि हर वो चेहरा जो केजरीवाल से बड़ा या उनके कद का था, जिनकी अपनी सोच थी उन्हें पार्टी से बाहर या तो जाना पड़ा या निकाला गया मसलन शाज़िया इल्मी बीजेपी में चली गयीं और योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण को आंतरिक फ़ासीवाद के कारण बाहर होना पड़ा।

दिल्ली में 5 साल केजरीवाल का नारा खूब चला लेकिन पांच साल से पहले ही अति महत्वाकांक्षी केजरीवाल पंजाब और गोवा चल दिए। जब हार हुई तो तोहमत ईवीएम पर और बीजेपी जालसाज़ करार दी गयी। यह आरोप तब क्यों नहीं जब एकाएक 67 सीट पर 'आप' ने जीत हासिल की? अब एमसीडी हार पर भी वोटिंग मशीन को कठघरे में खड़ा करना क्या जनादेश का अपमान नहीं!

क्या वजह है कि पार्टी पॉलिटिक्स केजरीवाल केंद्रित हो गयी है, जबकि केजरीवाल यही आरोप बीजेपी और कांग्रेस पर लगा सत्तासीन हुए। क्या वजह है कि महीने दर महीने केजरीवाल पार्टी महामहिम हो गए, और पार्टी के मुखर चेहरे कुमार विश्वास को गोवा,पंजाब और एमसीडी चुनाव से दूर रखा। मैं राजा, मैं मंत्री ,मैं ही सत्ता, मैं सर्वेसर्वा की केजरीवाल रणनीति का खामियाज़ा 'आप' भुगत रही है।

कुमार विश्वास की चुप्पी, सोमनाथ भारती, अल्का लांबा के इस्तीफे की पेशकश, दिलीप पांडे का इस्तीफा और भगवंत मान की आत्ममंथन सलाह को भी यदि नज़रअंदाज़ किया तो जनता का विश्वास वैकल्पिक राजनीति से सदा के लिए उठ जाएगा।

सनद रहे न व्यक्ति न दल...कोई अजेय नहीं।

(ब्लॉग लेखिका मीनाक्षी जोशी देश के नंबर वन चैनल इंडिया टीवी में न्यूज एंकर हैं)

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