नयी दिल्ली: मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की पैरोकारी करने वाले संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने विधि आयोग से आग्रह किया है कि देश में संसद से पारित पूरी तरह से नए संहिताबद्ध पर्सनल लॉ को अमल में लाया जाए ताकि कानूनी रूप से भेदभाव की शिकार मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलना सुनिश्चित हो सके।
विधि आयोग ने हाल ही में तीन तलाक और समान नागरिक संहिता सहित कुछ बिंदुओं पर लोगों की राय मांगते हुए एक प्रश्नावली जारी की थी। बीएमएमए ने पिछले दिनों इसी प्रश्नावली के जवाब में आयोग को अपनी सिफारिश सौंपी जिसमें उसने मुस्लिम विवाह व्यवस्था में अमूल-चूल परिवर्तन की पैरवी की है।
गौरतलब है कि आयोग की इस प्र्रश्नावली का ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध करते हुए आरोप लगाया था कि केंद्र की मोदी सरकार एक कानून थोपकर पूरे देश को एक रंग में रंगना चाहती है, हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि समान नागरिक संहिता थोपी नहीं जाएगी।
बीएमएमए की सह-संस्थापक जकिया सोमन ने आज भाषा से कहा, बीते 20 दिसंबर को हमने विधि आयोग को तीन तलाक और मुस्लिम विवाह से जुड़े प्रावधानों को लेकर अपनी सिफारिश सौंपी है। हम पर्सनल लॉ में पूरी तरह बदलाव चाहते हैं। देश के संविधान और कानून के दायरे वाले पर्सनल लॉ से महिलाओं को भेदभाव और उत्पीड़न से मुक्ति मिल सकती है।
उन्होंने कहा, सरकार और अदालत के हस्तक्षेप के बिना मुस्लिम महिलाओं को उनका हक नहीं मिल सकता। अदालत में मामले चल रहे हैं, लेकिन अगर संसद में एक कानून पारित हो जाता है तो महिलाओं की बहुत बड़ी जीत होगी।
बीएमएमए ने विधि आयोग को सौंपी अपनी सिफारिश में कहा, देश में एक ऐसा संहिताबद्ध पर्सनल लॉ होना चाहिए जो मुस्लिम महिलाओं की बराबरी और गरिमा सुनिश्चित करता हो। हमारा मानना है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ कानूनी भेदभाव हो रहा है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13, 14 और 15 का स्पष्ट उल्लंघन है।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने कहा, मुस्लिम महिलाओं को शरीयत अप्लीकेशन ऐक्ट-1937 में संशोधन और मुस्लिम विवाह अधिनियमम-1939 को खत्म करके अथवा संसद से पारित किये जा सकने वाले नए संहिताबद्ध पर्सनल लॉ के जरिए न्याय मिलना सुनिश्चित हो सकता है।
मुंबई आधारित इस संगठन ने मुस्लिम परिवार कानून नाम से एक मसौदा भी तैयार किया है जिसमें उसने 15 बिंदुओं को अमल में लाने पर जोर दिया है। उसने इन बिंदुओं से विधि आयोग को भी अवगत कराया है।
इन बिंदुओं में उसने कहा कि शादी से पहले जोर-जबरदस्ती और धोखाधड़ी किए बिना लड़के और लड़की दोनों की रजामंदी ली जाए, लड़की की शादी की न्यूनतम आयु 18 साल होने के कानून का अनुपालन सुनिश्चित हो, निकाह के समय महर की राशि लड़के की वार्षिक आमदनी के बराबर हो और तलाक-ए-अहसन को अमल में लाया जाए ताकि तलाक की किसी भी स्थिति में दोनों पक्षों को सुलह के लिए 90 दिन का समय मिल सके।
बीएमएमए ने बहुविवाह को गैरकानूनी घोषित किया जाए , माता-पिता दोनों को बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक बनाया जाए, तलाक की स्थिति में बच्चे का संरक्षण उसके हितों और उसकी मर्जी के मुताबिक तय किया जाए , हलाला को अपराध घोषित किया जाए तथा मां-बाप की संपत्ति में लड़कियों को बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए।
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