जाति के ‘चक्रव्यूह’ में सियासत, ‘कोटे में कोटा’ किसके लिए फायदे का सौदा, किसके लिए खतरा? Coffee Par Kurukshetra में देखें पूरी चर्चा
देश की राजनीति में इस वक्त जाति का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में जाति से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई। आरक्षण, कोटे में कोटा, क्रीमी लेयर, दलित राजनीति और जातीय समीकरणों से जुड़े सवालों ने सियासी बहस को और गरमा दिया है।
देश की राजनीति में इस वक्त जाति का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में दिखाई दे रहा है। इसी विषय पर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में हुई चर्चा के दौरान आरक्षण, कोटे में कोटा, क्रीमी लेयर और अलग-अलग जातियों को मिलने वाले लाभ पर विस्तार से बातचीत हुई। कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि क्या आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और उसमें सुधार की जरूरत है। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
कोटे में कोटा पर मांझी-चिराग आमने-सामने
'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में सबसे पहले केंद्र सरकार के मंत्रियों जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच कोटे में कोटा को लेकर सामने आए मतभेद पर चर्चा हुई। सवाल यह है कि एससी-एसटी आरक्षण में उप-वर्गीकरण यानी कोटे में कोटा लागू किया जाए या नहीं। चर्चा में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को इस संबंध में व्यवस्था करने का रास्ता दिया है। जीतन राम मांझी जहां इसे लागू करने की मांग कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान इसके विरोध में हैं।
आरक्षण खत्म नहीं, सुधार की जरूरत पर बहस
बहस में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के सवाल को भी प्रमुखता से उठाया गया। चर्चा में कहा गया कि मुद्दा आरक्षण खत्म करने का नहीं, बल्कि यह देखने का है कि जिन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, उन्हें उसका लाभ मिल रहा है या नहीं। इस दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि अगर किसी योजना को लंबे समय तक लागू किया जाता है तो उसके असर का आकलन और समीक्षा भी होनी चाहिए। इसी संदर्भ में कहा गया कि आरक्षण में सुधार की बात होते ही राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध की आशंका सामने आने लगती है।
रोहिणी आयोग के आंकड़ों से उठे बड़े सवाल
आरक्षण के भीतर लाभ के असमान वितरण पर चर्चा करते हुए रोहिणी आयोग का भी उल्लेख किया गया। कार्यक्रम में दावा किया गया कि ओबीसी की बड़ी संख्या वाली जातियों में आरक्षण और एडमिशन का लाभ कुछ सीमित जातियों तक अधिक केंद्रित है।
चर्चा में कहा गया कि 983 ओबीसी जातियां ऐसी हैं जिन्हें अब तक एक भी नौकरी या एडमिशन का लाभ नहीं मिला है। वहीं कुछ सीमित जातियों को आरक्षण के बड़े हिस्से का लाभ मिलने की बात कही गई। इसी आधार पर सवाल उठाया गया कि क्या आरक्षण के भीतर भी लाभ के समान वितरण की व्यवस्था होनी चाहिए।
‘कोटे में कोटा’ बीजेपी के लिए सियासी चक्रव्यूह?
कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि आरक्षण में उप-वर्गीकरण का मुद्दा बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से आसान नहीं है। एक तरफ गैर-प्रमुख ओबीसी और दलित वर्गों के बीच लाभ के असमान वितरण का मुद्दा बीजेपी की राजनीति को मजबूती दे सकता है, तो दूसरी तरफ जातीय वर्गीकरण का मुद्दा उसके लिए राजनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकता है।
चर्चा में बिहार और यूपी के चुनावी उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जाति और आरक्षण जैसे मुद्दे बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहे हैं। यही वजह है कि इस मुद्दे को आगे बढ़ाने को लेकर राजनीतिक सावधानी की जरूरत बताई गई।
क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नई बहस
कार्यक्रम में OBC क्रीमी लेयर से जुड़े मामले पर भी चर्चा हुई। बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्रीमी लेयर के निर्धारण को केवल आर्थिक आधार पर तय करने के बजाय पद और अन्य पहलुओं को भी देखने की बात सामने आई। चर्चा में यह भी कहा गया कि पिछले साल की सिविल सेवा परीक्षा की कुछ भर्तियां इसी विवाद के कारण प्रभावित हुई हैं और सरकार के सामने इस मामले को लेकर अलग चुनौती है।
राहुल गांधी की FIR से गरमाई दलित राजनीति
मल्लिकार्जुन खरगे के कथित अपमान और राहुल गांधी के बयान को लेकर दर्ज एफआईआर पर भी कार्यक्रम में लंबी बहस हुई। चर्चा में इस बात पर सवाल उठाया गया कि राहुल गांधी ने जिस घटना को दलित अपमान से जोड़ा, क्या उसके पीछे तथ्य वही थे। कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि जिन लोगों पर शुद्धिकरण कराने का आरोप लगाया गया था, उनमें से कुछ युवकों के खुद दलित समाज से होने की बात सामने आई। इसी आधार पर राहुल गांधी के बयान और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों पहलुओं पर चर्चा हुई।
कांग्रेस की दलित राजनीति और वोट बैंक का सवाल
राहुल गांधी के दलित मुद्दे को उठाने के पीछे राजनीतिक कारणों पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में कांग्रेस के पुराने दलित वोट आधार और समय के साथ बीजेपी तथा अन्य दलों की ओर हुए वोट शिफ्ट का उल्लेख किया गया। चर्चा में कहा गया कि कांग्रेस के लिए दलित वोट वापस हासिल करना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती है। साथ ही यूपी में गैर-जाटव दलित वोटों के बदलते राजनीतिक रुझान को भी इस बहस से जोड़कर देखा गया।
सोशल मीडिया पर बीजेपी-कांग्रेस की नई जंग
कार्यक्रम के अंत में बीजेपी और कांग्रेस के सोशल मीडिया अभियानों पर भी चर्चा हुई। एआई के जरिए नेताओं के वीडियो और राजनीतिक सामग्री बनाए जाने का मुद्दा सामने आया। चर्चा में कहा गया कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के बीच जवाबी हमले तेज हुए हैं और कई बार गंभीर मुद्दों की जगह फर्जीवाड़ा, सनसनी और मनोरंजन हावी हो जाता है।
यह भी कहा गया कि चुनावी माहौल में राजनीतिक दलों के लिए गलत या भ्रामक सामग्री का जवाब देना जरूरी हो जाता है। सोशल मीडिया के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा गया कि अब यह पहले की तुलना में अलग तरीके से काम कर रहा है और दोनों तरफ से राजनीतिक अभियान चल रहे हैं।
जाति से सोशल मीडिया तक, सियासत का बदलता एजेंडा
पूरी चर्चा में जाति, आरक्षण, दलित राजनीति, क्रीमी लेयर और सोशल मीडिया जैसे मुद्दे केंद्र में रहे। एक तरफ आरक्षण के लाभ के असमान वितरण और कोटे में कोटा की मांग पर बहस हुई, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की रणनीति और वोट बैंक की राजनीति पर भी सवाल उठे। कार्यक्रम में यह बहस इसी सवाल के साथ आगे बढ़ी कि जाति का मुद्दा आने वाले समय में भारतीय राजनीति को किस तरह प्रभावित करेगा।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
