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कभी मोदी से लेकर ममता और तेजस्वी को जिताने के अहम रणनीतिकार रहे प्रशांत, बिहार चुनाव में खुद उतरे तो साबित हुए “किशोर”

बिहार विधान सभा चुनावों में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को सबसे बड़ा झटका लगा है। उनकी पार्टी 1 भी सीट नहीं जीत सकी। जबकि प्रशांत कभी पीएम मोदी से लेकर पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, तेजस्वी और जगनमोहन रेड्डी तक के सफल चुनावी रणनीतिकार रहे थे।

प्रशांत किशोर, जनसुराज पार्टी के संस्थापक।- India TV Hindi
Image Source : PTI प्रशांत किशोर, जनसुराज पार्टी के संस्थापक।

Bihar Election 2025: लोकसभा चुनाव 2014 से लेकर देश के विभिन्न राज्यों में हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों में कई दिग्गज नेताओं के लिए प्रशांत किशोर कभी अहम चुनावी रणनीतिकार रहे। वह जिस भी नेता के साथ गए, उसे जिताने का उनका स्ट्राइक रेट 100 फीसदी रहा। साल 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने से लेकर 2020 के बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव की आरजेडी को मजबूत बनाने और 2021 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को बंगाल में सत्ता दिलाने तक पीके की चुनावी रणनीतियां हमेशा चर्चा का केंद्र रहीं। लिहाजा चंद समय में प्रशांत किशोर पीके के नाम से मशहूर हो गए। उनकी गणना देश के मुख्य चुनावी रणनीतिकारों में होने लगी, लेकिन 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में जब वह खुद अपने सियासी दल के साथ मैदान में उतरे तो उनकी जन सुराज पार्टी (जसुपा) एक भी सीट नहीं जीत सकी। इतना ही नहीं, अधिकांश सीटों पर उनके उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। यानी दूसरों को चुनाव जिताने वाले प्रशांत ने जब बिहार की सियासत में जोर आजमाइश की तो वह इसमें "किशोर" (बच्चा) साबित हुए।  


 कहां फेल हुए पीके

पीके और उनकी पार्टी की यह करारी हार न सिर्फ उनकी भविष्यवाणियों को झुठला रही है, बल्कि सोशल मीडिया पर उन्हें 'किशोर' यानी राजनीति में अपरिपक्व साबित कर रही है। प्रशांत किशोर का सफर अनोखा रहा है। आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट और संयुक्त राष्ट्र में काम करने वाले प्रशांत किशोर ने 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन से राजनीतिक रणनीति की दुनिया में कदम रखा। 2012 में गुजरात चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए काम किया, जहां उनकी 'चाय पे चर्चा' कैंपेन ने बीजेपी को 182 सीटों पर पहुंचा दिया। 2014 लोकसभा में फिर मोदी के ही साथ रहे, लेकिन इस बार राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कंपेनिंग कराई। किशोर की सिटिजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) ने डेटा एनालिटिक्स और ग्राउंड लेवल कैंपेन से चमत्कार कर दिखाया। मगर जब वह खुद बिहार चुनाव में उतरे तो जमीनी हालात का सही आंकलन नहीं कर सके, लिहाजा उन्हें फेल साबित होना पड़ा।

 

चुनावी रणनीतिकार 

प्रशांत ने 2014 में पीएम मोदी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने के बाद फिर 2015 बिहार चुनाव में नीतीश-लालू गठबंधन के लिए काम किया, जहां उन्होंने महागठबंधन की जीत दिलाई। मगर 2017 में नीतीश के साथ उनका मतभेद हो गया और किशोर ने इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आईपीएसी) लॉन्च की। आईपीएसी के बैनर तले किशोर ने 2019 में आंध्र प्रदेश में वाईएसआरसीपी को सत्ता दिलाई और जगन मोहन रेड्डी को सीएम बनवाया। इसके बाद 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए 'घर घर तृणमूल' कैंपेन चलाकर टीएमसी  को 213 सीटों पर जीत दिलाकर सत्ता दिलाई। फिर उसी साल बिहार उपचुनाव में तेजस्वी यादव की आरजेडी को चारों खाने चित्त कर दिया।

 

डोर टू डोर अभियान और सोशल मीडिया के भरोसे रहे किशोर

किशोर को लगा था कि ग्रामीण स्तर पर डोर-टू-डोर कैंपेन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके वह मतदाताओं को अपनी तरफ मोड़ लेंगे। लिहाजा विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले उन्होंने 2022 में बिहार में 'जन सुराज' अभियान शुरू किया, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर केंद्रित था। फिर अक्टूबर 2024 में इसे पार्टी का रूप दिया। पीके ने दावा किया कि 2025 चुनाव में सभी 243 सीटों पर लड़ेंगे। इस चुनावी घोषणा के साथ किशोर ने बड़े-बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की जेडीयू 25 सीटों से ज्यादा नहीं जीतेगी और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन भी कमजोर पड़ेगा। जन सुराज 75 से ज्यादा सीटें जीतेगी, बिहार की राजनीति बदल देगी।

पार्टी ने 234 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और खुद पीके बक्सर से लड़े, लेकिन 14 नवंबर को जब चुनाव के नतीजे आए तो वह राजनीतिक रूप से 'किशोर'साबित हुए। पीके की पार्टी का कहीं खाता तक नहीं खुला और उनके अधिकांश उम्मीदवारों को 10 फीसदी से भी कम वोट मिले यानी जमानत जब्त हो गई। इससे पीके के रणनीति को बड़ा झटका लगा। बिहार विधान सभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने के बाद प्रशांत किशोर ने कहा, "यह शुरुआत है, हम सीखेंगे। 

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