कश्मीर में शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर स्थित मजार को लेकर विवाद, जीर्णोद्धार पर उठे सवाल
कश्मीर में शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर स्थित मजार को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई दलों और समूहों ने मजार के जीर्णोद्धार पर सवाल खड़े किए हैं। कश्मीरी पंडित समूहों का दावा है कि यह मजार हाल ही में बनाई गई है।

कश्मीर में शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर स्थित एक मजार को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा और लोक जनशक्ति पार्टी ने इस जगह के जीर्णोद्धार (मरम्मत) पर सवाल उठाए हैं और दावा किया है कि यह एक नई "मजार" है। वहीं दूसरी ओर कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम, जो एक प्रमुख धार्मिक हस्ती हैं, उनका कहना है कि यह मजार पुरानी है और अगर धार्मिक स्थलों से जुड़े किसी काम में कोई छेड़छाड़ की जाती है, तो यह स्वाभाविक है कि लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, यह पूरा मामला डल झील के पास जबरवान पहाड़ियों में, शंकराचार्य मंदिर जाने वाले रास्ते पर स्थित एक दफन स्थल (कब्रिस्तान) के जीर्णोद्धार से जुड़ा हुआ है। ये पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शंकराचार्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर पहले सड़क पर स्थित 'सैय्यद उस्मान साहिब' की मजार के नवीनीकरण के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की और इसका ठेका दे दिया। यह कब्रिस्तान एक जंगली इलाके में है, जहां कई कब्रें और एक बड़ी मजार मौजूद है। मजार के पास एक बोर्ड लगा है जिस पर इन सूफी संतों के नाम लिखे हैं। पहले सड़क के किनारे एक साइनबोर्ड लगा था जिस पर इस मजार का नाम लिखा था, लेकिन हाल ही में हुए विवाद के बाद उस बोर्ड से नाम हटा दिया गया है। फिलहाल यहां कोई काम शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि मामला अब राजस्व विभाग (रेवेन्यू डिपार्टमेंट) को सौंप दिया गया है।
कश्मीरी पंडित समूहों ने आपत्ति जताई
कश्मीरी पंडित समूहों ने सबसे पहले इस निर्माण कार्य पर आपत्ति जताई। उनका दावा है कि यह मजार हाल ही में बनाई गई है और पहले यहां ऐसी कोई जगह नहीं थी। उन्होंने मांग की है कि निर्माण कार्य को तुरंत रोका जाए। जिसके बाद बीजेपी की स्थानीय इकाई ने इस मजार के लिए फंड या ठेका दिए जाने पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि पवित्र शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर स्थित यह जगह कोई प्राचीन स्थल नहीं है। उनका कहना है कि वहां दिखने वाली सभी कब्रें नई हैं। असल में, पहले वहां केवल एक ही कब्र थी, और यह मजार सदियों पुरानी नहीं, बल्कि केवल 40 साल पुरानी है। बीजेपी ने इस परियोजना के लिए 44.37 लाख रुपये की मंजूरी देने को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार से जवाबदेही की मांग की है।
भाजपा ने NC पर उठाए सवाल
इंडिया टीवी से बात करते हुए, बीजेपी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का आचरण पहले भी जांच के दायरे में रहा है। उन्होंने बताया कि पार्टी ने कुछ जगहों के लिए अलग नामों का इस्तेमाल किया था- जैसे शंकराचार्य पहाड़ी के लिए 'तख्त-ए-सुलेमान' और हरि पर्वत के लिए 'कोह-ए-मरान'। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ये ढांचे क्या हैं, इनका उद्देश्य क्या है, इन्हें किसने मंजूरी दी, और इनकी सटीक जगह क्या है? बीजेपी ने 44.37 लाख रुपये की कथित मंजूरी को लेकर तुरंत जवाब मांगा है कि यह प्रोजेक्ट किसने प्रस्तावित किया और किस अधिकारी ने इसे मंजूरी दी? आपको बता दें कि इससे पहले श्रीनगर के फतेह कदल इलाके में 700 साल पुराने 'श्री दुर्गेश्वरी मंदिर' के जीर्णोद्धार की खबर भी सामने आई थी।
सब कुछ एक उचित प्रक्रिया के तहत हो- LJP
इस पूरे विवाद पर लोक जनशक्ति पार्टी के नेता संजय सराफ ने कहा- "सच कहूं तो, मैं लगभग 30-35 सालों से श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर जा रहा हूं। उससे पहले, बचपन में, मैं बहुत कम जाता था, लेकिन अब मैं लगातार जा रहा हूं। हम हमेशा नीचे से गाड़ी में बैठकर सीधे शंकराचार्य की चोटी तक जाते थे, इसलिए हमने न तो कभी दाएं-बाएं ज्यादा देखा और न ही वहां कुछ ऐसा दिखा जिसने हमारा ध्यान खींचा हो। लेकिन हाल ही में, धर्म ट्रस्ट के कुछ लोग मेरे पास आए और बताया कि वहां एक जियारत (धार्मिक स्थल) है, जिसके लिए सरकार ने 44 लाख 37 हजार रुपये का फंड दिया है, और हमें वहां जाकर इस बारे में सबको बताना चाहिए। वे मुझे वहां ले गए। जब मैं वहां पहुंचा, तो हमने एक तरफ एक छोटी सी जियारत देखी। उसके पास ही मैंने कुछ ऐसा देखा जिसने मुझे हैरान कर दिया। क्योंकि मैं सूफीवाद में बहुत विश्वास रखता हूं। लेकिन यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था कि वहां इधर-उधर कुछ क्रेट (बक्से) रखे हुए थे, उन पर हरा कपड़ा डाला गया था, और उसके ऊपर एक और कपड़ा रखकर वे बस एक जियारत जैसा रूप देना चाहते थे। अगर वहां पहले से ही वह छोटी जियारत मौजूद है, तो फिर यह सब करने की क्या जरूरत है? इस बात ने मुझे हैरान कर दिया। सच कहूं तो, कोई भी कश्मीरी पंडित किसी जियारत या ऐसी किसी जगह के खिलाफ नहीं है। लेकिन हम चाहते हैं कि सब कुछ एक उचित प्रक्रिया के तहत हो। अगर कोई राजस्व रिकॉर्ड या विवरण मौजूद है, तो यह तय होना चाहिए कि किस आधार पर यह फंड दिया गया है। वैसे, हमें किसी चीज से कोई आपत्ति नहीं है।"
स्थानीय मुसलमानों ने क्या कहा?
हालांकि, स्थानीय मुसलमानों का कहना है कि इस जगह पर पहले से ही एक कब्रिस्तान और कुछ मजारें मौजूद थीं। कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती, नासिर-उल-इस्लाम ने कहा- "पिछले 50 सालों में मैं कई बार इस रास्ते से गुजरा हूं, और हमने हमेशा यहां दो कब्रें देखी हैं। एक कब्र सैयद असदुल्लाह बुखारी साहब की है, और दूसरी सैयद उस्मान साहब की। वे हजरत मीर सैयद अली हमदानी (रह.) के समकालीन और साथी थे, और उन्होंने उनकी शिक्षाओं को फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी। असल में, इस मामले का शंकराचार्य या वन भूमि से कोई लेना-देना नहीं है।" मुफ्ती ने आगे कहा- "जहां तक 'नवीनीकरण' या 'सुधार' के काम की बात है, उनका दावा है कि वे इसके मूल ढांचे को बहाल कर रहे हैं, जो बहुत पुराने समय का है। जिस तरह हमारे हिंदू भाई सतवारी या गांधीनगर जैसी जगहों पर पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ जाते हैं, उसी तरह उन्हें इस जगह को भी उसी सम्मान की नजर से देखना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि यहां एक मजार है जिसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व है, जिसे मान्यता मिलनी चाहिए।" मुफ्ती ने आगे कहा, "मेरी नजर में, अगर धार्मिक स्थलों से जुड़े किसी काम में कोई छेड़छाड़ की जाती है, तो यह स्वाभाविक है कि लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
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