नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म को लेकर युवाओं की भूमिका और इसके व्यापक अर्थ पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आजकल धर्म की बात सुनते ही कई लोग इसे बुजुर्गों से जोड़ देते हैं। भगवद्गीता और रामायण को भी अक्सर रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाला ग्रंथ मान लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। धर्म का संबंध इंसान के पूरे जीवन और सृष्टि के अस्तित्व से है। उन्होंने धर्म और रिलिजन में फर्क भी बताया है।
'धर्म बुढ़ापे के लिए नहीं है'
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म का विचार युवाओं में होना चाहिए, लेकिन आजकल यह बात ज्यादा सुनाई नहीं देती। उन्होंने कहा कि जब धर्म की बात होती है तो लोग कहते हैं कि यह बुढ़ापे की बात है। कुछ लोग भगवद्गीता और रामायण को भी रिटायर होने के बाद पढ़ने की चीज मानते हैं। उन्होंने कहा,
'वास्तव में धर्म सृष्टि के अस्तित्व की शुरुआत से उसके अंत तक बना रहता है। इंसान उसे माने या न माने, अस्तित्व के कुछ नियम अपनी जगह बने रहते हैं। कोई व्यक्ति सूर्य को न माने, फिर भी उसका उदय और अस्त होना निश्चित है।'
अहंकार पर भी बोले भागवत
RSS प्रमुख ने कहा कि इंसान अहंकार में यह सोचने लगता है कि हर चीज उसकी इच्छा के अनुसार चलनी चाहिए और उसकी सत्ता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा,
'इसी वजह से उसके मन में यह गलतफहमी पैदा हो जाती है कि दुनिया उसकी इच्छा के अनुसार चल सकती है। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है। धर्म को समझना आसान नहीं है। यह एक ऐसी व्यापक अवधारणा है, जिसके बारे में खोज और चिंतन करते-करते पूरा जीवन निकल सकता है, फिर भी उसे पूरी तरह समझ पाना मुश्किल हो सकता है।'
'धर्म जन्म से मृत्यु तक रहता है'
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल बुढ़ापे से जुड़ी चीज नहीं है, सृष्टि के अस्तित्व से धर्म है और सृष्टि के विलय तक बना रहेगा। उन्होंने कहा कि उनके लिए उनका धर्म जन्म से निर्धारित है और मृत्यु तक रहेगा। संघ प्रमुख ने कहा कि इसी वजह से धर्म के बारे में विचार करना उस समय से शुरू कर देना चाहिए, जब इंसान चीजों को थोड़ा-बहुत समझने लगे। उनके मुताबिक, धर्म सभी सुखों का कारण है। बता दें कि इससे पहले नई पीढ़ी पर बोलते हुए भागवत ने कहा था कि Gen Z और Gen अल्फा सबसे ईमानदार हैं और वह इनपर आंख मूंद कर यकीन करते हैं।
'सुख-दुख आते-जाते हैं, धर्म स्थायी है'
मोहन भागवत ने कहा कि जीवन में आनंद के कुछ क्षण होते हैं तो दुख के भी हजारों मौके आते हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि, जो व्यक्ति चीजों को समझता है, वह इन सुख-दुख के चक्कर में नहीं फंसता, जबकि जानकारी और समझ की कमी वाला व्यक्ति इनमें उलझ जाता है। संघ सुप्रीमो ने लोगों से कहा कि अपनी इच्छा पूरी करने, डर, लालच या अपनी जान बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुख और दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है। भागवत ने कहा कि मनुष्य और उसका अस्तित्व भी नित्य है।
'हम धर्म को रिलिजन समझने लगे'
धर्म को बूढ़ों की चीज समझे जाने पर भागवत ने कहा कि इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि हम धर्म शब्द का सही अर्थ भूल गए हैं। उन्होंने कहा कि जब पश्चिमी लोग भारत आए तो उन्होंने यहां लोगों को धर्म का आचरण करते देखा। भागवत ने कहा,
'उन्हें यह समझ नहीं आया कि यह क्या चीज है और इसके आचरण के लिए कुछ अभ्यास और अनुशासन भी करना पड़ता है। धर्म में कर्मकांड भी एक हिस्सा होता है। इसे समझना और उसका पालन करना एक तरह का अनुशासन है, जो व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करता है। लेकिन कर्मकांड ही पूरा धर्म नहीं है।'
भागवत ने कहा कि पश्चिमी लोगों ने भारत में धर्म के इसी बाहरी आचरण को देखकर उसे 'रिलिजन' के रूप में समझा और बाद में हम भी धर्म को रिलिजन कहने लगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि रिलिजन और धर्म एक नहीं हैं।
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