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'रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बदलेगी, ऐसा कभी नहीं हुआ', विजयादशमी समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत का संबोधन

विजयादशी संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने स्व की भावना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को संगठित और बलसंपन्न बनाने के लिए अपने इतिहास, अस्मिता और स्वभाव को समझना जरूरी है।

मोहन भागवत- India TV Hindi
Image Source : ANI मोहन भागवत

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में अपने विजयादशी संबोधन में स्व की भावना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को संगठित और बलसंपन्न बनाने के लिए अपने इतिहास, अस्मिता और स्वभाव को समझना जरूरी है। संघ प्रमुखने अपने संबोधन में रिजीम चेंज का जिक्र करते हुए कहा कि इससे परिस्थिति बदलेगी, ऐसा कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा,"रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बदलेगी, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। पहले नहीं हुआ है, आज भी नहीं हुआ है। अपने स्वार्थ का पोषण करने वाले अपने पिट्ठू सब जगह प्रभावी रहे।"

पहले भी ऐसा नहीं हुआ और आज भी ऐसा नहीं हो रहा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि केवल रिजीम चेंज से परिस्थितियां नहीं बदलतीं। उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसा नहीं हुआ और आज भी ऐसा नहीं हो रहा है। मोहन भागवत के मुताबिक, सत्ता परिवर्तन के बावजूद अपने स्वार्थों को पूरा करने वाली ताकतें और उनके समर्थक अलग-अलग जगहों पर प्रभावी बने रहते हैं। मोहन भागवत ने आरोप लगाया कि दुनिया में कुछ ताकतें अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए काम करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत का मजबूत होना ऐसी गतिविधियों के लिए चुनौती बन सकता है। इसी वजह से भारत को निशाना बनाया जा रहा है। भागवत ने दावा किया कि भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने और तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। 

स्व की भावना हमारी एकता का आधार

इससे पहले अपने संबोधन के शुरुआत में संघ प्रमुख ने कहा, 'हमारी जो हम भावना है, वो जो हमारा स्व है, वो हमारा भावनात्मक बंधन है। इसी के चलते इतनी सारी विविधताओं से भरा हुआ देश प्राचीन समय से एक राष्ट्र के नाते चलते आया है। क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास संपूर्ण अस्तित्व के एकता की एक अनुभूति थी। इसी अनुभूति के आधार पर अपनेपन का व्यवहार करने वाले अनेक सोपानों से बने हुए उत्कृष्ट तत्त्वज्ञान के भी हम विरासतदार हैं। लेकिन हम इसको भूल गए, तब हमारा पतन हुआ। हम विभाजित और दुर्बल हो गए और फिर इतने नीचे गिरते चले गए कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी हमको झेलनी पड़ी। अब उस गुलामी से हम अनेक महापुरुषों के भीम प्रयासों के बाद और बलिदानों के बाद मुक्त होकर अपनी एकता और प्रगति के राह पर चल पड़े हैं।

तपस्या और समर्पण की आवश्यकता

संघ प्रमुख ने कहा कि देश की स्वाधीनता के समय एक अलग वातावरण था। उस वातावरण में देश को स्वतंत्र करने के लिए प्रयास करने वाले महापुरुषों और उस समय के समाज को जितनी तपस्या और समर्पण करना पड़ा, उससे कई गुना अधिक तपस्या और समर्पण की आवश्यकता आज की परिस्थिति में  है। इस परिस्थिति को हम देखते हैं तो ध्यान में आता है वो भाव कौन सा है, वो तत्त्व कौन सा है? अपना भारत विविधता का देश, सब प्रकार की विविधता है। एकजुट होकर इस देश को चलना है, तो आधारभूत तत्त्व ऐसा चाहिए जो इन सबको स्वीकार करे। इन सबको सम्मान दे। इन सबकी प्रतिष्ठा और सुरक्षा की चिंता करे। ऐसा आधार हमारे पास कौन सा है? दुनिया के उपलब्ध विचारों में ऐसा कोई नहीं है। सौभाग्य से ऐसा विचार परंपरा से हमारे पास है, हमारी सनातन काल से चलती आई जो परंपरा है, सभी प्रकार की विविधता को स्वीकार करना, सभी को संरक्षित करना, ऐसा परंपरा से हमारा स्वभाव है। 

शाश्वत परंपराओं, मूल्यों को हमेशा बनाए रखना चाहिए

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमें अपनी शाश्वत परंपराओं और मूल्यों को हमेशा बनाए रखना चाहिए, जबकि समय के साथ बदलने वाली चीजों में बदलाव के लिए लचीलापन भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि भाषा, जाति और पंथ के प्रति लगाव स्वाभाविक है, लेकिन इन सबसे ऊपर देश के प्रति भावनात्मक एकता का भाव होना चाहिए। मोहन भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा पूरी दुनिया को अपना मानने की रही है, लेकिन समय के साथ हम समुद्र पार न करने जैसी बंदिशों में बंध गए। इससे हमारी कमजोरी बढ़ी और हममें अहंकार भी आया, जिसका नतीजा देश की दुर्दशा के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि अब हमें अपनी पहचान और अस्मिता को याद करते हुए आपसी एकता मजबूत करनी होगी और एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए जीवन जीना होगा।

दुनिया में देश का मान बढ़ा 

संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया में देश का मान बढ़ा है, देश आगे बढ़ रहा है। भारत के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ रही है। दुनिया के अन्य देशों में  भौतिक दृष्टि से सर्वसंपन्न होने के बाद भी चिंता है। बड़ी विविधताओं को दुनिया की कैसे संभालें एक साथ, विकास और पर्यावरण को एक साथ कैसे चलाएं, जो अपने जैसे नहीं हैं, उनसे भी अपनेपन से कैसे बरतें, कुटुम्ब का जीवन उसमें क्षरण हो रहा है, नई पीढ़ी के संस्कारों में क्षरण हो रहा है, उसको कैसे रोकना, इन समस्याओं का उत्तर उनके पास नहीं है। और इसलिए हम देख रहे हैं कि सब ठीक होने के बाद भी विश्व में प्राकृतिक तनाव तो बढ़ ही रहे हैं, भू-राजनैतिक तनाव भी बढ़ रहे हैं, आर्थिक अनिश्चितता और पर्यावरणीय संकट और वर्चस्व की लड़ाई से विनाश हो रहा है। और दुनिया ये जानती है कि भारत के पास इसका उत्तर है। और इसलिए भारत अगर बढ़ा हो रहा है तो भारत का कहना क्या है? 

आंदोलनों का उद्देश्य क्या होना चाहिए?

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत अभी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है और इस दौरान समस्याएं होना स्वाभाविक है। समस्याओं के कारण आंदोलन भी होते हैं और लोकतंत्र में आंदोलनों की जगह है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आंदोलनों, सरकार और राजनीतिक नेताओं के कार्यों से समाज में आपसी मतभेद, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। संघ प्रमुख ने कहा कि भावनाएं कितनी भी तीव्र हों, सभी को संविधान, कानून और सभ्य व्यवहार की मर्यादा का पालन करना चाहिए। राजनीतिक नेताओं को सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ के लिए अपने विवेक और सद्भावना से समझौता नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसे राजनीतिक स्वार्थों के प्रभाव में आने से बचाने की जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। देश और समाज को चलाने की जिम्मेदारी केवल नेताओं की नहीं, बल्कि सभी नागरिकों की है।

वंदे मातरम पर क्या बोले भागवत?

RSS प्रमुख ने कहा कि वंदे मातरम आज भी देशवासियों को प्रेरणा देने वाला गीत है। इसे पूरे सम्मान और गर्व के साथ गाने में किसी को संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को मातृभूमि मानकर उसका सम्मान करना, अपने पूर्वजों के योगदान पर गर्व करना और भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्यों के अनुसार जीवन जीना देशवासियों को एकजुट रखता है। उनके मुताबिक, यही भावना अलग-अलग पंथ, प्रांत, भाषा और जातियों के लोगों को एक सूत्र में बांधती है।

इससे पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर के धंतोली स्थित दुर्गा पंडाल में पूजा अर्चना की थी। इस अवसर पर उन्होंने शक्ति की उपासना का महत्व बताया। संघ प्रमुख ने कहा था कि शिव से अगर शक्ति का इकार निकाल दिया तो केवल शव बचता है। मोहन भागवत ने सद्गुणों को जागृत करने और राष्ट्र के नवउत्थान में मां की शक्ति के महत्व पर भी अपनी बात रखी। 

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