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आखिर इतनी खास क्यों है जयपुर की मीनाकारी? जानें इससे जुड़ी कई अनसुनी बातें

जयपुर की मीनाकारी कला धातु पर रंगीन इनेमल और बारीक कारीगरी से शाही विरासत को जीवंत बनाती है। कारीगर कमल कुमार असाट और उनका परिवार इसे नई पीढ़ी तक पहुंचा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए यह पारंपरिक कला अब वैश्विक पहचान हासिल कर रही है।

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Image Source : ANI सदियों पुरानी मीनाकारी कला आज भी अपनी चमक बिखेर रही है।

जयपुर: 'पिंक सिटी' जयपुर में सदियों पुरानी मीनाकारी कला आज भी अपनी चमक बिखेर रही है। यह कला रंग-बिरंगे इनेमल और बारीक कारीगरी के जरिए धातु को जीवंत रूप देती है और शाही विरासत को आज की दुनिया तक पहुंचा रही है। कारीगर कमल कुमार असाट, जिन्होंने इस कला को वर्षों तक निखारा है, कहते हैं कि मीनाकारी सिर्फ सजावट नहीं है, बल्कि यह धातु पर उकेरी गई भावनाएं हैं। उन्होंने कहा, 'हम जो भी रंग लगाते हैं और जो भी रेखाएं खींचते हैं, उनमें हमारी परंपरा का हिस्सा होता है। इसे बनाने में धैर्य और सटीकता की जरूरत होती है।'

सोशल मीडिया ने मीनाकारी में फूंकी नई जान

मीनाकारी की कला पीढ़ियों से चली आ रही है। जयपुर में असाट जैसे परिवार इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं और अब इसे अगली पीढ़ी को भी सिखा रहे हैं। कार्यशाला में वे अपनी बेटियों के साथ बैठकर धातु पर डिजाइन बनाते हैं, जहां परंपरा और नए विचारों का सुंदर मेल देखने को मिलता है। उनकी बेटी गर्गी असाट का कहना है कि यह कला समय के साथ बदल भी रही है। उन्होंने कहा, 'हमें गर्व है कि हम अपने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन हम नए डिजाइन और प्लेटफॉर्म भी अपना रहे हैं। सोशल मीडिया ने हमारी कला को दुनिया तक पहुंचाने में मदद की है।'

कई चरणों में होती है मीनाकारी की प्रक्रिया

वहीं उनकी दूसरी बेटी ख्याति ने बताया कि पहले यह कला केवल कार्यशालाओं और स्थानीय बाजारों तक सीमित थी, लेकिन अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए दुनिया भर के लोग इसे देख और सराह सकते हैं। मीनाकारी की प्रक्रिया कई चरणों में होती है। पहले सुनार आधार तैयार करता है, फिर एनामेल कलाकार उस पर रंग भरता है और अंत में पॉलिशर उसे चमक देता है। कमल कुमार असाट बताते हैं कि एक ही वस्तु को बनाने में कई कुशल हाथों की जरूरत होती है और यह एक धीमी प्रक्रिया है, लेकिन इसी वजह से हर वस्तु अनोखी और मूल्यवान बनती है।

बहुत ही समृद्ध है मीनाकारी का इतिहास

मीनाकारी कला का इतिहास मंदिरों के आभूषणों और शाही दरबारों से जुड़ा रहा है। आज यह कला वैश्विक मंचों पर भी अपनी पहचान बना रही है और अपनी रंगीन खूबसूरती के लिए सराही जा रही है। यह सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत है, जो कारीगरों के हाथों और उनकी कहानियों में जीवित रहती है। जयपुर, जिसे गुलाबी नगरी कहा जाता है, में हर हाथ से बनी वस्तु अतीत और भविष्य को जोड़ने वाली एक कड़ी बन जाती है। परंपरा और आधुनिकता के मेल से जयपुर की मीनाकारी यह साबित करती है कि जब रंग और कारीगरी मिलते हैं, तो इतिहास सिर्फ जीवित नहीं रहता, बल्कि और भी चमक उठता है।