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छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है? जानिए सूर्यदेव और देवी प्रत्यूषा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

Dubate Surya ko Arghya: छठ पूजा में तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। यह समय जीवन में अंधकार को समाप्त कर नई ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है। इस पूजा के दौरान सूर्यदेव के साथ उनकी पत्नी देवी प्रत्यूषा की भी आराधना की जाती है, जो सांध्यकाल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।

Arghya offered at sunset on chhath- India TV Hindi
Image Source : UNSPLASH डूबते सूर्य की पूजा

Why is Arghya offered at sunset During Chhath Puja: छठ पूजा हिंदू धर्म का बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है, जो सूर्य देवता और छठी मैया को समर्पित है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। चार दिवसीस इस पर्व की शुरुआत नहाए-खाए से होती है, जो चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य देने के साथ ही पूर होता है।

छठ पूजा का तीसरा दिन सबसे अहम माना जाता है, क्योंकि इसी दिन  व्रती डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस परंपरा के पीछे गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व छिपा है। चलिए जानते हैं कि पूरी दुनिया उगते सूरज को नमस्कार करती हैं, लेकिन छठ पर्व में क्यों तीसरे दिन डूबते सूरज को जल अर्पित किया जाता है। 

सूर्य देव की पूजा का महत्व

हिंदू धर्म में सूर्य देवता को जीवन का आधार और शक्ति का स्रोत माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य नवग्रहों में एकमात्र प्रत्यक्ष देवता हैं, जिन्हें देखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य की उपासना से शरीर में ऊर्जा, मन में स्थिरता और जीवन में समृद्धि आती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार,जो व्यक्ति सूर्य की आराधना करता है, उसे जीवन भर अच्छी सेहत, सफलता और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का कारण

छठ पूजा के तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन दर्शन से जुड़ा प्रतीक है। डूबता सूर्य यह दर्शाता है कि हर कठिनाई या अंधकार का अंत होता है और नया सवेरा जरूर आता है। डूबते सूरज को प्रणाम करना हमें इस समय की अहमियत समझाता है। इस अर्घ्य के माध्यम से व्रती अपनी नकारात्मकता को समाप्त कर नवजीवन की शुरुआत का संकल्प लेते हैं।

देवी प्रत्यूषा की पूजा का महत्व

छठ पर्व के तीसरे दिन यानी कि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर सूर्यास्त के दौरान अर्घ्य देने के साथ सूर्यदेव की पत्नी प्रत्यूषा की भी पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवी प्रत्यूषा का संबंध 'सांध्यकाल'से है, जब दिन समाप्त होकर रात्रि का आगमन होता है। 

पौराणिक मान्यता है कि प्रत्यूषा सूर्य की दूसरी पत्नी हैं और उनका नाम 'प्रत्यूष' से लिया गया है, जिसका अर्थ 'संध्य' या 'सूर्यास्त का समय' होता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जब सूर्य अपनी पत्नी संज्ञा से अलग हुए, तो उनका विस्तार प्रत्यूषा और छाया के रूप में हुआ। इस तह प्रत्यूषा और छाया दोनों ही संज्ञा के दो अलग-अलग रूप माने गए।

कहा जाता है कि सूर्य अस्त होने पर प्रत्युषा का प्रभाव बढ़ता है। इस समय की गई पूजा सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करती है। वहीं, यह पूजा धरती के सभी प्राणियों को ऊर्जा प्रदान करने और सूर्य की शक्ति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम मानी जाती है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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