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संतान सुख की कामना रखने वाले जरूर करें गोवत्स द्वादशी का व्रत, जानें धार्मिक महत्व और गाय-बछड़े की पूजा विधि

गोवत्स द्वादशी पर गाय-बछड़े की पूजा से विशेष पुण्य मिलता है। इसे बच्छ दुआ और बछ बारस भी कहा जाता है। जानिए इस व्रत का धार्मिक महत्व क्या है। इसके साथ ही भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए पूजन विधि और मंत्र भी जानिए।

Govatsa Dwadashi Puja Vidhi- India TV Hindi
Image Source : MAGNIFIC गोवत्स द्वादशी पर क्यों की जाती है गाय-बछड़े की पूजा

सनातन धर्म में गोवत्स द्वादशी का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि विधि-विधान से गौ माता और उनके बछड़े का पूजन करने तथा व्रत रखने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। विशेष रूप से संतान सुख की कामना रखने वाले लोगों के लिए यह व्रत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए भी पूजा-अर्चना की जाती है। आइए जानते हैं गोवत्स द्वादशी का धार्मिक महत्व और गाय-बछड़े की पूजा करने की सही विधि। यहां पढ़िए 5 नवंबर 2026 का पंचांग।  

कब मनाई जाती है गोवत्स द्वादशी?

कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इसे बच्छ दुआ, बछ बारस और वसु द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, मतांतर के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की द्वादशी को भी गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से गौ माता तथा बछड़े का पूजन करने से व्यक्ति को हर तरह के सुख की प्राप्ति होती है।

संतान सुख की कामना रखने वालों के लिए खास दिन

गोवत्स द्वादशी का व्रत विशेष रूप से संतान सुख की कामना रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने पहली बार कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गौ माता के दर्शन किए थे और विधि-विधान से उनका पूजन किया था। मान्यता है कि गोवत्स द्वादशी पर व्रत रखने और गाय-बछड़े की पूजा करने में समृद्धि आती है और देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है, विशेषकर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

कैसे करें गाय-बछड़े की पूजा?

गोवत्स द्वादशी के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद गाय और बछड़े को साफ पानी से स्नान कराएं। फिर कपड़े से पोंछकर दोनों को नए वस्त्र ओढ़ाएं और गले में फूलों की माला पहनाएं। इसके बाद उनके माथे पर सिंदूर या चंदन का तिलक लगाएं और सींगों पर गेरू लगाएं।

अर्घ्य मंत्र

पूजा के दौरान एक पात्र में जल, अक्षत, थोड़ी सी गंध, तिल और फूल डालें। इसके बाद मंत्र का उच्चारण करते हुए गाय और बछड़े के अगले पैरों में जल चढ़ाएं।

मंत्र है: क्षीरोदार्णव सम्भूते सुरासुर नमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर् गृहाणार्घ्य नमो नमः॥

अर्थ: हे देव स्वरूपिणी माता! आप क्षीर सागर से उत्पन्न हुई हैं और देवताओं तथा असुरों द्वारा भी नमस्कार की गई हैं। आपको बार-बार प्रणाम है। मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें।

भोग और आरती करें

अर्घ्य अर्पित करने के बाद गौ माता और बछड़े को भोग लगाएं। फिर घी के दीपक से दोनों की आरती करें और उनका आशीर्वाद लें। इस दौरान अपने परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। इस प्रकार विधि-विधान से पूजा करने के बाद व्रत रखें। शाम को फलाहार करके व्रत का पारण किया जाता है। कुछ लोग फलाहार करते हुए यह व्रत तीन दिनों तक भी रखते हैं।

इन बातों का रखें ध्यान

गोवत्स द्वादशी के दिन गाय के दूध से बनी चीजों का सेवन वर्जित माना जाता है। इसलिए इस दिन व्रत रखने वाले लोगों को इस नियम का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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