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Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत का पाना चाहते हैं पूरा फल, तो पूजा के समय जरूर पढ़ें ये कथा

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: आज 6 मार्च को संकष्टी गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है। चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन गणेश जी का व्रत रखना, पूजा और कथा पाठ करना शुभ होता है। पढ़िए भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी तिथि गणेश भगवान को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणपति की पूजा करने और व्रत कथा सुनने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत, पूजन और कथा का पाठ करने से बप्पा प्रसन्न होते हैं। इससे जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। यहां पढ़िए संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण कथा। 

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Bhalchandra Sankashti Chaturthi Vrat Katha in Hindi)

पुराणों में वर्णन मिलता है कि एक समय सभी देवता किसी बड़े संकट में फंस गए। परेशान होकर वे भगवान शिव के पास सहायता मांगने के लिए पहुंचे। उस समय भगवान शिव, माता पार्वती और उनके दोनों पुत्र भगवान कार्तिकेय और श्री गणेश साथ में विराजमान थे। देवताओं ने अपनी समस्या भगवान शिव को बताई और उनसे संकट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों की ओर देखा और उनसे पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं की इस परेशानी को दूर कर सकता है। यह सुनते ही भगवान कार्तिकेय और गणेश जी दोनों ने एक साथ कहा कि वे इस कार्य को करने में सक्षम हैं। अब शिव जी और मां पार्वती के सामने यह समस्या आ गई कि इस जिम्मेदारी के लिए किसे चुना जाए। तब उन्होंने एक उपाय सोचा और दोनों पुत्रों से कहा कि तुम दोनों में से जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, वही देवताओं की सहायता के लिए जाएगा।

भगवान शिव की यह बात सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। दूसरी ओर गणेश जी सोच में पड़ गए कि उनका वाहन तो छोटा सा मूषक है, ऐसे में वे पृथ्वी का चक्कर इतनी जल्दी कैसे लगा पाएंगे। कुछ देर विचार करने के बाद गणेश जी ने एक बुद्धिमानी भरा उपाय निकाला। वे उठे और अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की। परिक्रमा पूरी करने के बाद वे फिर अपने स्थान पर आकर बैठ गए और कार्तिकेय के लौटने का इंतजार करने लगे।

जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करके लौटे तो उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले से ही वहां मौजूद हैं। तब भगवान शिव ने समझाया कि माता-पिता ही संपूर्ण जगत के समान होते हैं, इसलिए उनकी परिक्रमा करना पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के बराबर माना जाता है। इस प्रकार गणेश जी की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें देवताओं के संकट दूर करने का कार्य सौंपा। तभी से भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और संकटों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन इस कथा का पाठ करने या सुनने से भक्तों के जीवन के सभी संकट दूर होने की मान्यता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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