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Guru Pradosh Vrat Katha: आज है गुरु प्रदोष व्रत, इस चमत्कारी कथा को पढ़ने से खुश होंगे महादेव, हर मुराद होगी पूरी!

Guru Pradosh Katha: 28 मई को अधिक मास का पहला प्रदोष व्रत है। चूंकि ये व्रत गुरुवार को पड़ा है तो ऐसे में ये गुरु प्रदोष व्रत कहलाएगा। यहां आप जानेंगे गुरु प्रदोष व्रत की पावन कथा।

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Image Source : INDIA TV अधिक मास की कथा

Guruwar Pradosh Katha: सनातन धर्म में प्रदोष व्रत की बड़ी महिमा बताई जाती है। ये व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को पड़ता है। 28 मई को गुरु प्रदोष व्रत है। मान्यता अनुसार गुरु प्रदोष व्रत रखने से भक्तों को भगवान शिव के साथ-साथ अपने पूर्वजों की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत में प्रदोष काल के समय भगवान शिव की विधि विधान पूजा की जाती है और फिर व्रत कथा सुनी जाती है। यहां हम आपको बताएंगे गुरुवार के दिन प्रदोष की कौन सी कथा सुनना या पढ़ना बेहद शुभ माना जाता है।

गुरु प्रदोष व्रत कथा

गुरु प्रदोष व्रत की कथा अनुसार एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में भयंकर युद्ध छिड़ गया था। जिसमें देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर डाला था। यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हो गया और वह खुद युद्ध करने के लिए चला गया। आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण सभी देवताओं को भयभीत कर दिया। जिसके बाद देवता गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे। बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हे वृत्रासुर के बारे में बताता हूं। वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने घोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया।

पिछले जन्म में वह चित्ररथ नाम का राजा था और एक बार वह अपने भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत चला गया। वहां शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख उसने उपहास कहा- हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत हो जाते हैं। किन्तु देवलोक में पहले ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि कोई स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे। चित्ररथ के यह वचन सुन माता पार्वती क्रोधित हो गईं और बोलीं अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महादेव साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है। अतएव मैं तुझे अब ऐसी शिक्षा दूंगी कि फिर तू कभी किसी संत का उपहास करने की नहीं सोचेगा। अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे ये शाप देती हूं।

माता के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से वृत्रासुर के रूप में उत्पन्न हुआ। गुरुदेव आगे बोले- वृत्तासुर बाल्यकाल से ही भगवान शिव का बड़ा भक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर भगवान शिव को प्रसन्न करो। देवराज ने बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली। बोलो उमापति शंकर भगवान की जय। हर हर महादेव !

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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