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इस शक्तिपीठ में मूर्ति नहीं श्रीयंत्र की होती है पूजा, चमत्कारिक मंदिर में आज भी रात को अप्सराएं करती हैं नृत्य

उत्तराखंड में स्थित माता के कई शक्तिपीठों में से एक है चंद्रकूट पर्वत पर स्थित चंद्रबदनी शक्ति पीठ। माना जाता है कि इस मंदिर में माता का धड़ गिरा था। इस मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में आज हम आपको अपने इस लेख में जानकारी देंगे।

Chandrabadni Mandir- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV चंद्रबदनी मंदिर

माता दुर्गा के शक्तिपीठों में से एक है चंद्रबदनी शक्तिपीठ। माना जाता है कि उत्तराखंड में चंद्रकूट पर्वत पर माता सती के बदन (धड़) का एक हिस्सा गिरा था। जहां पर माता के शरीर का यह हिस्सा गिरा उस स्थान पर चंद्रबदनी शक्तिपीठ की स्थापना की गई। समुद्रतल से लगभग 2277 मीटर ऊपर स्थिति माता के चंद्रबदनी मंदिर में पूरे वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इस मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और इतिहास के बारे में आइए जानते हैं। 

चंद्रबदनी मंदिर के स्थापना के पीछे की कहानी 

स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, सती ने अपने पिता दक्ष के द्वारा शिव जी का तिरस्कार किए जाने की वजह से यज्ञ की अग्नि में दाह संस्कार कर लिया था। जिसके बाद शिव जी ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया था और सती का जला हुआ शरीर लेकर वो आकाश में विचरण करने लगे। शिव जी के मोह को तोड़ने के लिए विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। माता सती के शरीर के यह टुकड़े जहां-जहां गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। वहीं जहां माता सती का कटि भाग (कमर का हिस्सा) गिरा वहां चंद्रबदनी मंदिर स्थापित हुआ। 

मूर्ति नहीं श्रीयंत्र की होती है पूजा 

चंद्रबदनी मंदिर में माता की मूर्ति नहीं बल्कि श्रीयंत्र की पूजा की जाती है। यह श्रीयंत्र मंदिर के गर्भगृह में स्थित है। माना जाता है कि इस श्रीयंत्र की पूजा मंदिर के पूजारी आंखों पर पट्टी बांधकर करते हैं, क्योंकि इसका तेज बहुत अधिक है। लोक मान्यताओं के अनुसार यहां देवी की मूर्ति है लेकिन उसे देखना वर्जित है। माना जाता है कि जो भी देवी की मूर्ति को यहां देखने की चेष्टा करता है वो अंधा हो जाता है। इस मंदिर के पूजारी मुख्य रूप से भट्ट और सेमल्टी ब्राह्मण होते हैं। 

चंद्रबदनी मंदिर में होते हैं चमत्कार

माता के इस मंदिर में जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ आता है उसकी मुरादें माता चंद्रबदनी पूरा करती हैं। इस मंदिर में स्थानीय वाद्ययंत्रों (ढोल-दमाऊ) से देवी-देवताओं का आवाहन भी किया जाता है। इसके साथ ही रात्रि के समय यहां अप्सराओं और गंधर्वों के होने की बात भी कही जाती है। स्थानीय लोग मानते हैं कि अप्सराएं और गंधर्व रात्रि के समय यहां नृत्य करते हैं। माता रानी यहां देव डोली में अवतरित होती हैं और भक्तों के कष्ट को हर देती हैं। इस मंदिर में निराहार रहकर जो संत साधना करते हैं उन्हें सिद्धियों की प्राप्ति होती है। 

नवरात्रि में होता है विशेष आयोजन

चंद्रबदनी मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों में माता को प्रसन्न करने के लिए विशेष आयोजन किए जाते हैं। इस दौरान भक्तों की संख्या भी मंदिर में अधिक होती है। माता के प्रत्येक रूप की यहां विधि-विधान से पूजा की जाती है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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