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Garud Puran Niyam: छोटे बच्चों का दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता? गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका कारण

Garud Puran Niyam: हिंदू धर्म में छोटे बच्चों का दाह संस्कार करने की परंपरा नहीं है। किसी छोटे बच्चे की मौत होने पर उसका अंतिम संस्कार दफनाकर किया जाता है। गरुड़ पुराण में बचाया गया है इसका कारण। जानिए क्या कहता है शास्त्र।

Garud Puran Child Death Ritual- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV छोटे बच्चों का दाह संस्कार क्यों नहीं होता

Garud Puran Child Death Ritual: सनातन धर्म में गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक कुल 16 प्रमुख संस्कार माने गए हैं, जिन्हें षोडश संस्कार भी कहा जाता है। मृत्यु के बाद शव का दाह संस्कार करने का विधान है। अंतिम संस्कार का उतना ही महत्व होता है, जितना की अन्य 15 संस्कारों का। लेकिन आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में छोटे बच्चे की मृत्यु होने के बाद उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता है। ऐसा क्यों आइए जानते है...

गरुड़ पुराण में हैं जीवन और मृत्यु के पीछे के गहरे रहस्य

हिंदू धर्म में अग्नि को बेहद पवित्र माना गया है, जो पंचतत्वों में से एक है। मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अग्नि ही शरीर को पंचतत्वों में मिलाकर आत्मा को उसके सभी शारीरिक बंधनों से मुक्त करती है। वहीं, बात जब छोटे बच्चों की आती है तो यह परंपरा अलग रूप ले लेती है। जो केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि भावनात्मक पहलुओं से भी संबंध रखती है। जीवन और मृत्यु के पीछे के गहरे रहस्य छिपे हैं, जिसके बारे में गरुड़ पुराण में विस्तार से बताया गया है। 

छोटे बच्चों का क्यों नहीं होता अग्नि संस्कार

हिंदू धर्म में जलाने के बजाय दफनाकर बच्चों का अंतिम संस्कार करने के पीछे का कारण भी गरुड़ पुराण में मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार,  गर्भ में पल रहे शिशु या फिर 5 साल से कम उम्र के बच्चे की अगर मृत्यु हो जाती है, तो उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता। इसके पीछे वजह बताई गई है कि इस आयु तक बालकों में 'मैं' और 'मेरा' की भावना विकसित नहीं हुई होती है। इतनी छोटी उम्र में वे संसार की मोह-माया से अछूते रहते हैं।  साथ ही सभी प्रकार के पाप और पुण्य के बंधन से मुक्त होते हैं। 

इस अवस्था में आत्मा को शरीर से कोई लगाव नहीं होता, जिससे वह आसानी से शरीर त्याग देती है। ऐसे में शव के अग्नि संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। इसलिए शिशु या छोटे बच्चे के शव को या तो दफनाया दिया जाता है या फिर नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।

कपाल क्रिया नहीं अनिवार्य

वहीं, छोटे बच्चों का शरीर बहुत ही कोमल होता है। ब्रह्मरंध्र यह मनुष्य के सिर का ऊपरी हिस्सा होता है, जिससे प्राण निकालने के लिए कपाल क्रिया की जाती है। वहीं, किसी बच्चे की मृत्यु होने पर यह हिस्सा पूरी तरह बंद नहीं होता है, जिससे प्राण आसानी से बाहर निकल जाते हैं और इस प्रक्रिया की भी जरूरत नहीं पड़ती

एक वजह यह भी बताई जाती है कि छोटे बच्चे की मृत्यु परिवार के लिए अत्यंत ही दुखद घटना होती है। ऐसे में दफनाने की प्रक्रिया बहुत शांत होती है। साथ ही बच्चे के अंतिम विदाई यह परंपरा उस परिवार को यह महसूस कराती है कि उनका बच्चा धरती माता की गोद में सुरक्षित है और चैन की नींद सोया है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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