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Hindu Panchang Tithi: कितने प्रकार की होती हैं तिथियां? जानिए किस तिथि में कौन से काम होते हैं फलित और कौन से अशुभ

Hindu Panchang Tithi: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त तय करने में तिथियों की अहम भूमिका होती है। हिंदू पंचांग में चंद्रमा की गति के आधार पर तिथियां निर्धारण होती हैं और हर तिथि का अपना अलग प्रभाव माना गया है। जानें तिथियां कितने प्रकार की होती हैं।

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Image Source : INDIA TV कितने प्रकार की होती हैं तिथियां?

Hindu Panchang Tithi: हिंदू पंचांग में एक महीने में कुल 30 तिथियां होती हैं, जिन्हें शुक्ल और कृष्ण पक्ष में बांटा गया है। प्रत्येक तिथि कुछ विशेष कार्यों के लिए शुभ मानी जाती है, जबकि कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। आइए जानते हैं हिंदू पंचांग की तिथियों के प्रकार और उनसे जुड़े शुभ-अशुभ कार्यों के बारे में।

कितने प्रकार की होती हैं तिथियां

हिंदू पंचांग की गणना चंद्रमा की चाल के आधार पर की जाती है। हर माह में 15 तिथियां शुक्ल पक्ष और 15 तिथियां कृष्ण पक्ष की होती हैं, जिन्हें धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर दैनिक जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों शुभ-अशुभ परिणामों का आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, तिथियों को मुख्य रूप से 5 श्रेणियों नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा  में बांटा गया है। यही क्रम पूरे महीने चलता रहता है।

नंदा तिथि: नए कार्यों की शुरुआत

प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी को नंदा तिथि कहा जाता है। यह तिथि नए काम की शुरुआत, बिजनेस या दुकान खोलने, भवन निर्माण शुरू करने और आर्थिक योजनाओं के लिए शुभ मानी गई है। मान्यता है कि इस दिन शुरू किए गए कार्यों में स्थिरता और उन्नति मिलती है।

भद्रा तिथि: खरीदारी का विशेष महत्व

द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियां भद्रा तिथि कहलाती हैं। इन तिथियों में वाहन, भूमि, पशुधन, अनाज, सोना-चांदी या अन्य उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इस दिन की गई खरीदारी में लाभ के योग बनते हैं।

जया तिथि: विजय का संकेत

'जया' यानी जीत, इस तिथि के अंतर्गत तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी आती हैं। यह तिथि प्रतियोगिता, कानूनी मामलों, विवादों का निपटारा, शत्रुओं पर विजय और साहसिक कार्यों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। मुश्किल काम करने या महत्वपूर्ण फैसला लेने के लिए भी यह तिथि शुभ मानी जाती है।

रिक्ता तिथि: शुभ कार्यों से करें परहेज

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को रिक्ता तिथि कहा जाता है, जिसका अर्थ है खाली। इस तिथि में विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय की शुरुआत आदि कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि इस दौरान शुरू किए गए कार्य अपेक्षित सफलता नहीं दे पाते। हालांकि रोग उपचार, ऑपरेशन जैसे कार्यों के लिए यह तिथि उपयुक्त बताई है।

पूर्णा तिथि: शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ

पूर्णा तिथियां पूर्णता और सफलता का प्रतीक। हर महीने आने वाली पंचमी, दशमी और पूर्णिमा इसी के तहत आती हैं। इन तिथियों में धार्मिक अनुष्ठान और अन्य मांगलिक कार्य करना बेहद शुभ माना जाता है। ये तिथियां अच्छे परिणाम देने वाली मानी गई हैं।

क्या होती हैं शून्य तिथियां?

इन 5 मुख्य तिथियों के अलावा कुछ तिथियों को शून्य तिथि कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में इन तिथियों पर शुभ कार्य शुरू करने से बचने की सलाह दी गई है। कहते है कि इन तिथियों में शुरू किए गए शुभ कार्य अपेक्षित परिणाम नहीं देते। 

इन महीनों में आती हैं शून्य तिथियां

चैत्र में अष्टमी और नवमी, वैशाख में द्वादशी, ज्येष्ठ में त्रयोदशी और चतुर्दशी, आषाढ़ में षष्ठी और सप्तमी, श्रावण में द्वितीया और तृतीया, आश्विन में दशमी और एकादशी, कार्तिक में पंचमी और चतुर्दशी, मार्गशीर्ष में सप्तमी और अष्टमी, पौष में चतुर्थी और पंचमी, माघ में पंचमी और षष्ठी, फाल्गुन में चतुर्थी और तृतीया को शून्य तिथि कहा जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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