सनातन धर्म में पूजा को केवल दीपक जलाने, फूल अर्पित करने या आरती करने की प्रक्रिया नहीं माना गया है। पूजा में श्रद्धा, मंत्र, ध्यान और भगवान के प्रति समर्पण का भी विशेष महत्व है। इसी वजह से पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना करने की परंपरा बताई गई है। माना जाता है कि इससे पूजा के दौरान हुई जाने-अनजाने की भूल के लिए भगवान से विनम्रता के साथ क्षमा मांगी जाती है।
पूजा के बाद अत में क्षमायाचना क्यों जरूरी?
कई बार पूजा करते समय व्यक्ति से मंत्रों के उच्चारण, विधि या किसी सामग्री के इस्तेमाल में अनजाने में गलती हो जाती है। ऐसे में पूजा समाप्त करने से पहले भगवान के सामने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगने की परंपरा है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, यह भाव पूजा को पूर्णता देने वाला माना जाता है।
क्षमायाचना मंत्र
पूजा के अंत में हाथ जोड़कर यह क्षमायाचना मंत्र पढ़ा जाता है-
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
मंत्र का सरल अर्थ
इस मंत्र में भक्त भगवान से कहता है कि उसे पूजा के सही तरीके, आवाहन और विसर्जन की पूरी जानकारी नहीं है। मंत्र, विधि या भक्ति में जो भी कमी रह गई हो, उसके लिए वह क्षमा मांगता है। साथ ही प्रार्थना करता है कि अपनी श्रद्धा से की गई पूजा को भगवान स्वीकार करें और उसकी कमियों को पूरा करें।
ऐसे मांगें ईश्वर से क्षमा
आरती या मुख्य पूजा पूरी होने के बाद हाथ में थोड़े अक्षत और फूल लें। शांत मन से भगवान का ध्यान करें और अपनी जाने-अनजाने हुई भूल-चूक को स्वीकार करते हुए क्षमायाचना मंत्र का पाठ करें। इसके बाद फूल और अक्षत भगवान के चरणों में अर्पित करके श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
भाव को माना गया है जरूरी
धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान के सामने सच्चे भाव और विनम्रता का विशेष महत्व है। क्षमा प्रार्थना केवल एक मंत्र का उच्चारण नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार करने और अहंकार छोड़ने का भाव भी है। इसलिए पूजा के अंत में कुछ क्षण निकालकर भगवान से क्षमा मांगना एक सरल और महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा मानी जाती है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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