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मंगला गौरी व्रत की शुरुआत के बाद कितने साल निभाएं ये परंपरा, जानें इसकी अवधि को लेकर क्या है धार्मिक मान्यता

मंगला गौरी व्रत सावन माह के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाता है। यह व्रत मनचाहे वर, अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख की कामना से किया जाता है। इस व्रत को एक अवधि तक ही रखे जाने की मान्यता है। जानिए मंगला गौरी व्रत कितने वर्षों तक रखने की परंपरा है।

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Image Source : PINTEREST मंगला गौरी व्रत की अवधि

सावन के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मां पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप को समर्पित इस व्रत में महिलाएं पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। लेकिन इस व्रत को लेकर अक्सर सवाल रहता है कि इस व्रत की शुरुआत के बाद कब तक ये परंपरा निभाएं? तो चलिए जानते हैं कि मंगला गौरी व्रत कितने साल तक करना चाहिए। 

कितने साल रखें व्रत?

विवाह के बाद महिलाएं लगातार 5 वर्षों तक सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखती हैं। पांचवें साल सावन के अंतिम मंगलवार को पूजा और हवन के साथ व्रत का उद्यापन करने की परंपरा है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में व्रत की अवधि को लेकर कुछ अंतर देखने को मिलता है। कुछ परिवारों में महिलाएं 7 वर्षों तक भी यह व्रत करती हैं। 

अविवाहित कन्याएं भी रख सकती हैं

अविवाहित लड़कियां भी अच्छे वर और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से मंगला गौरी व्रत कर सकती हैं। वे अपनी श्रद्धा के अनुसार इस व्रत की अवधि का संकल्प रख सकती हैं। वहीं, कुछ परंपराओं में विवाह होने तक इसे करने का उल्लेख मिलता है।

2026 में आखिरी मंगला गौरी व्रत

इस साल 25 अगस्त 2026, मंगलवार को मंगला गौरी व्रत का चौथा और अंतिम व्रत रखा जाएगा। इस दिन मां गौरी और भगवान शिव की आराधना कर दांपत्य जीवन में सुख-शांति और प्रेम बना रहने की कामना की जाती है।

ऐसे करें पूजा

व्रत वाले दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल पर चौकी रखकर लाल और सफेद कपड़ा बिछाएं। सफेद कपड़े पर चावल से नवग्रह और लाल कपड़े पर गेहूं से सोलह माताओं की आकृति बनाएं। इसके बाद गणेश जी की स्थापना करें और दूसरी ओर जल से भरा कलश रखें। आटे से बने चौमुखी दीपक में चार बत्तियां जलाएं।

सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें। उन्हें जल, रोली, मौली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, फूल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, फल, मेवे और दक्षिणा अर्पित करें। इसके बाद कलश, नवग्रह और सोलह माताओं का पूजन करें। फिर माता मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध और दही से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएं। माता को रोली, चंदन, सिंदूर, मेहंदी, काजल और सोलह शृंगार की सामग्री अर्पित करें। फूल माला, फल, मेवे और सुपारी भी चढ़ाएं।

अब मंगला गौरी व्रत की कथा सुनें और आरती करें। विवाहित महिलाएं अपनी सास और ननद को 16 लड्डू देने की परंपरा निभाती हैं। ब्राह्मण को भी प्रसाद और पूजन सामग्री देने का विधान है। 
अंतिम व्रत के दूसरे दिन यानी बुधवार को देवी मंगला गौरी की प्रतिमा पूरे विधि-विधान और नियमों के साथ नदी में विसर्जित कर दी जाती है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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