क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के गले में जो सांप आभूषण बनकर लिपटा रहता है, वो पौराणिक काल में अत्यंत ही विषैला सर्प माना जाता था। ये कोई सामान्य सर्प नहीं है, बल्कि नागों के राजा नागराज वासुकी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव ने अपने गले में इतने जहरीले सांप को स्थान क्यों दिया? इसके पीछे एक ऐसी दिव्य कथा है जिसमें नागराज वासुकी के उस महा-त्याग का वर्णन मिलता है जो उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए किया था। जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपने गले में धारण किया। चलिए नाग पंचमी पर जानते हैं नागराज वासुकी के त्याग और भगवान शिव की करुणा की दिव्य कथा।
वासुकी कैसे बने शिव के गले का आभूषण?
पौराणिक कथा अनुसार, ऋषि कश्यप और माता कद्रू से नाग वंश की उत्पत्ति हुई। माता कद्रू ने कई नागों को जन्म दिया। जिसमें से 12 नाग अत्यंत ही जहरीले और बलवान थे। उन्हीं में से एक थे वासुकी। शिव पुराण के अनुसार जब देवताओं और दानवों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया तो उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया। लेकिन सभी के सामने सबसे बड़ी समस्या ये थी कि इस विशाल पर्वत को घुमाने के लिए मजबूत रस्सी कहां से आएगी क्योंकि कोई भी साधारण रस्सी इस पर्वत का भार सहन नहीं कर सकती थी।
सृष्टि के कल्याण के लिए नागराज वासुकी का महा त्याग
तभी सृष्टि के कल्याण के लिए नागराज वासुकी आगे आए और उन्होंने स्वयं को रस्सी बनाने का सुझाव दिया। सभी इस बात पर राजी हो गए। इसके बाद मंदराचल पर्वत के चारों ओर वासुकी नाग को लपेटा गया। एक तरफ से दैत्यों ने उनकी पूंछ पकड़ी तो दूसरी तरफ से देवताओं ने उनका मुख। इसके बाद समुद्र मंथन शुरू किया गया और मंथन के दौरान वासुकी जी के शरीर पर अत्यधिक घर्षण (रगड़) होने लगा। जिससे उनका पूरा शरीर छिल गया और उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी। इस दौरान उनके मुख से जहरीली फुंकारें निकलने लगीं। इतनी भयंकर पीड़ा के बावजूद भी वासुकी पीछे नहीं हटे और सृष्टि के कल्याण के लिए वो दर्द सहते रहे। वासुकी के इस समर्पण को देख भगवान शिव उन पर बहुत प्रसन्न हुए।
ऐसे बने शिव के गले का आभूषण
जब समुद्र मंथन से कालकूट नामक विष निकला, तो उसकी ज्वाला से पूरा ब्रह्मांड जलने लगा। तब संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान किया और उसे अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे महादेव 'नीलकंठ' कहलाए। विष की भयंकर गर्मी से महादेव का कंठ जलने लगा। तब नागराज वासुकी ने अपनी पीड़ा की परवाह न करते हुए महादेव के गले में लिपटकर उस विष को पीना चाहा। जिससे शिवजी के कंठ की ज्वाला और जलन कुछ कम हो सके। वासुकी के इस निःस्वार्थ भाव, सहनशक्ति और परम भक्ति को देखकर भगवान शिव का हृदय करुणा से भर गया और उन्होंने नागराज वासुकी को सर्वोच्च स्थान देते हुए अपने गले में धारण कर लिया। कहते हैं तभी से नागराज वासुकी भगवान शिव के गले का पसंदीदा आभूषण बन गए। शास्त्रों में एक प्रसंग ये भी मिलता है कि कालांतर में एक समय वासुकी ने महादेव के धनुष की डोरी की भूमिका निभाई थी।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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