सनातन धर्म में मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों का विशेष महत्व है। इनमें नारायण बलि एक ऐसा अनुष्ठान है, जिसका वर्णन धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। खासतौर पर असामयिक या असामान्य मृत्यु के मामलों में इस विधि का उल्लेख मिलता है। इस आर्टिकल के जरिए जानेंगे कि आखिर नारायण बलि पूजा क्या है और यह विशेष धार्मिक अनुष्ठान क्यों किया जाता है?
क्या है नारायण बलि पूजा?
नारायण बलि पूजा को सामान्य श्राद्ध से अलग विधि के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि विशेष परिस्थितियों में हुई मृत्यु के बाद इस अनुष्ठान के जरिए मृतक के लिए शांति और सद्गति की कामना की जाती है
कब की जाती है नारायण बलि पूजा?
गरुड़ पुराण के अनुसार, नारायण बलि का संबंध असामयिक या असामान्य मृत्यु से जुड़े कर्मकांड से है। इसमें दुर्घटना, आत्महत्या, सर्पदंश, जानवर के हमले, बिजली गिरने, अचानक बीमारी या अन्य अप्राकृतिक कारणों से हुई मृत्यु जैसी परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है।
संकल्प से शुरुआत
नारायण बलि अनुष्ठान की प्रक्रिया पवित्र स्नान और संकल्प से शुरू होती है। इसके लिए गोदावरी, गंगा जैसी पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। इसके बाद दिवंगत पूर्वज की शांति और मुक्ति की कामना से संकल्प लिया जाता है, जिसमें अनुष्ठान करने का उद्देश्य स्पष्ट किया जाता है। इसके बाद विधि अनुसार देवताओं का आह्वान किया जाता है।
कलश स्थापना और वैदिक मंत्रोच्चार
इसके बाद पांच कलश स्थापित किए जाते हैं। ये कलश ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और सवित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। पुरोहित वैदिक मंत्रों के साथ इन देवताओं का आह्वान करते हैं और अनुष्ठान को विधि-विधान से आगे बढ़ाते हैं।
गेहूं के आटे से बनाया जाता है पुतला
चूंकि दिवंगत व्यक्ति का भौतिक शरीर पहले ही नष्ट हो चुका होता है, इसलिए गेहूं के आटे से एक प्रतीकात्मक शरीर तैयार किया जाता है। इस पुतले को मृतक का प्रतीक माना जाता है और आगे की अंत्येष्टि संबंधी प्रक्रिया इसी के माध्यम से पूरी की जाती है।
दस पिंड किए जाते हैं अर्पित
पहले दिन दश पिंड प्रधान की विधि होती है। इसमें चावल या गेहूं से बने दस पिंड प्रतीकात्मक शरीर को अर्पित किए जाते हैं। इन पिंडों का संबंध मृतक के लिए आध्यात्मिक शरीर की पूर्ति और उसकी अधूरी इच्छाओं से जोड़ा जाता है।
प्रतीकात्मक अंत्येष्टि
इसके बाद गेहूं के आटे से बने पुतले की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि की जाती है। इसे दूसरे अंतिम संस्कार के रूप में देखा जाता है। इसके पीछे मृत्यु के समय अधूरे रह गए या ठीक से न हो पाए अंतिम संस्कार संबंधी कर्मों को पूरा करने का भाव जुड़ा है।
श्राद्ध और तर्पण
नारायण बलि की प्रक्रिया के दूसरे दिन सपिण्डीकरण श्राद्ध किया जाता है। इस दौरान पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है। काले तिल, शहद और फूल मिले जल को अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
दान और भोजन
समापन पर ब्राह्मण भोजन और सामर्थ्य अनुसार दान करने की परंपरा बताई गई है। दान और भोजन को मृतक की शांति के लिए किए जाने वाले कर्मों का अहम हिस्सा माना गया है। इस तरह नारायण बलि कई चरणों में संपन्न होने वाला विशेष धार्मिक अनुष्ठान है।
नारायण बलि की विधि, समय और पात्रता अलग-अलग संप्रदायों, क्षेत्रों और परंपराओं में अलग हो सकती है। इसलिए इसे स्वयं करने के बजाय किसी योग्य आचार्य या पुरोहित से सलाह लेना उचित माना जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
ये भी पढ़ें: पितृपक्ष में क्या खरीदना शुभ और किन चीजों से करें परहेज? जानें श्राद्धपक्ष में खरीदारी के ये खास नियम