पितृपक्ष में पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। ज्योतिष शास्त्र में पितृदोष को पूर्वजों से जुड़े कर्मों और कुंडली में ग्रहों की कुछ विशेष स्थितियों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इसका प्रभाव परिवार में आर्थिक परेशानी, कलह, विवाह और संतान से जुड़ी बाधाओं के रूप में दिखाई दे सकता है। इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। ऐसे में आइए जानते हैं पितृदोष कब लगता है, इसके कौन-कौन से संकेत बताए गए हैं और इससे जुड़े उपाय क्या हैं।
कब लगता है पितृदोष?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब पूर्वजों का अंतिम संस्कार, श्राद्ध या तर्पण उचित तरीके से नहीं हो पाता, तब पितृदोष की स्थिति मानी जाती है। वहीं, ज्योतिष शास्त्र में कुंडली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि की युति या नवम भाव में राहु को पितृदोष से जोड़ा गया है।
संतान और विवाह में बाधा
पितृदोष के संकेतों में संतान सुख में रुकावट को प्रमुख माना जाता है। संतान प्राप्ति में देरी, गर्भपात या संतान से जुड़ी परेशानियों को इससे जोड़ा जाता है। इसी तरह विवाह में बार-बार अड़चन आना, रिश्ता तय होने में देरी या शादी के बाद दांपत्य जीवन में परेशानी को भी पितृदोष का संकेत माना जाता है।
आर्थिक संकट और कलह
मेहनत के बावजूद आर्थिक परेशानी बने रहना, व्यापार में लगातार नुकसान होना या कर्ज बढ़ना भी पितृदोष के संकेत बताए हैं। परिवार में छोटी-छोटी बातों पर विवाद, भाई-बहनों के बीच जमीन-जायदाद को लेकर झगड़े और घर में लगातार अशांति को भी इससे जोड़कर देखा जाता है।
सेहत से जुड़े संकेत
परिवार के किसी सदस्य का बार-बार बीमार पड़ना या इलाज के बाद भी स्वास्थ्य समस्या बनी रहना। इसके अलावा सपने में बार-बार पूर्वजों का दिखाई देना, उन्हें असंतुष्ट देखना या डरावने सपने आना भी इसके संकेत बताए गए हैं। खाना खाते समय बार-बार बाल निकलना और घर में अचानक पीपल का पौधा उगना भी पितृदोष से संबंधित माना जाता है।
पितृदोष के उपाय
- पितृपक्ष के साथ हर अमावस्या पर पितरों के निमित्त तर्पण करने की मान्यता है।
- पितृपक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करें।
- पूर्वजों की मृत्यु तिथि पता न हो तो पितृपक्ष में सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध-दान करने की मान्यता है।
- पितृपक्ष में कौवा, गाय, कुत्ता, चींटी और मछली को चावल के पिंड या रोटी खिलाएं।
- अमावस्या और पितृपक्ष में पीपल के पेड़ पर जल, दूध और काला तिल अर्पित करनेें।
- सर्वपितृ अमावस्या से अगली अमावस्या तक सूर्यास्त के समय पीपल के नीचे शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- तांबे के पात्र में जल, लाल फूल और लाल चंदन डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें और 'ॐ सूर्याय नमः' का जाप करें।
- दुर्गा सप्तशती या सुंदरकांड का पाठ करने के साथ शिव मंदिर में 'ॐ नमः शिवाय' या 'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्' का जाप करने की मान्यता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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